नीलकंठ की ख़ामोशी में बसता बनारस : शिवांगी के रंगों में उतरी बाबा विश्वनाथ की रूह
@विजय विनीत
बनारस को शब्दों में बांधना हमेशा मुश्किल रहा है, लेकिन जब यही बनारस रंगों में उतर आए, तो वह सिर्फ़ एक चित्र नहीं रह जाता-वह एक अनुभव बन जाता है। ख्यातिलब्ध चित्रकार शिवांगी राज द्वारा रचित यह शिव-चित्र उसी अनुभव की मिसाल है, जिसमें बाबा विश्वनाथ का स्वरूप बनारस की आत्मा से घुल-मिल जाता है। यह चित्र बाबा का है, लेकिन मंदिर की परिधि में क़ैद नहीं। यहां शिव वह हैं, जो घाटों की सीढ़ियों पर बैठे दिखते हैं, गली के मोड़ पर पान की दुकान के पास ठहरते हैं और गंगा की लहरों के साथ सांस लेते हैं। नीले रंग की गहराई में रचा-बसा यह नीलकंठ स्वरूप शांति, स्वीकार और ठहराव का प्रतीक बनकर सामने आता है।
चित्र में बाबा की बंद आंखें किसी तपस्या की नहीं, बल्कि भीतर उतरने की यात्रा का संकेत देती हैं। माथे पर टिका अर्धचंद्र बनारस की रातों-सा है-आधा उजाला, आधा रहस्य। जटाओं की लहरों में गंगा की नमी है और गले में रुद्राक्ष-माला मानो शहर के साधु, नाविक और आम आदमी की साझा धड़कन को गिन रही हो। एक ओर खड़ा त्रिशूल आक्रोश का नहीं, बल्कि संतुलन और साक्षी भाव का प्रतीक लगता है-वैसा ही भाव, जैसा बनारस मृत्यु को लेकर रखता है।

इस चित्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यह है कि इसमें बनारसी जीवन-शैली सहज रूप से शामिल है। शिवांगी राय ने बाबा विश्वनाथ को किसी दूरस्थ देवता की तरह नहीं, बल्कि बनारस के हमसफ़र के रूप में चित्रित किया है। यही कारण है कि इस शिव में बनारसी पान की तहज़ीब भी दिखाई देती है। पान की तरह ही यह चित्र भी जीवन को धीरे-धीरे समझने का संदेश देता है-थोड़ा ठहरकर, थोड़ा स्वाद लेकर।
चित्रकार शिवांगी राज की कला-दृष्टि इस रचना में स्पष्ट झलकती है। नीले और सुनहरे रंगों का संतुलन बनारस की आत्मा को दर्शाता है जहां धुआं भी पवित्र है और सन्नाटा भी बोलता है। उनका यह चित्र केवल धार्मिक भाव नहीं रचता, बल्कि बनारस की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को भी सामने लाता है।

इस चित्र का मूल भाव (थीम) शिव और शहर के बीच की दूरी को मिटाना है। यहां बाबा विश्वनाथ सिर्फ़ पूज्य नहीं, बल्कि बनारस की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। यह चित्र बताता है कि बनारस में धर्म कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक प्रवाह है।
कुल मिलाकर यह रचना रंगों में लिखा गया एक मौन आख्यान है, जिसमें शिवांगी राज ने बाबा विश्वनाथ के माध्यम से बनारस की रूह को पकड़ने की कोशिश की है और काफी हद तक उसमें सफल भी हुई हैं। यह चित्र देखने वाले को ठहरने, सोचने और महसूस करने पर मजबूर करता है।
