रंगों में इबादत, रेखाओं में रूहानियत…

रंगों में इबादत, रेखाओं में रूहानियत…

संकट मोचन आर्ट गैलरी : जहां हनुमान की अटूट भक्ति, अद्भुत शक्ति और श्रीराम दरबार की दिव्यता रंगों में ढलकर एक ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति रचती है जो कला को केवल दृश्य नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों तक उतर जाने वाली इबादत बना देती है…!

@ विजय विनीत

वाराणसी की फ़िज़ाओं में जब संकटमोचन संगीत समारोह की मधुर स्वर-लहरियां गूंजती हैं तो पूरा वातावरण जैसे एक रूहानी नूर से भर उठता है। यह केवल संगीत का आयोजन नहीं, बल्कि साधना, संस्कृति और आस्था का जीवंत उत्सव है। ऐसा उत्सव जहाँ हर सुर इबादत बन जाता है और हर श्रोता उस इबादत का हिस्सा।

इसी पावन अवसर पर आयोजित संकट मोचन मंदिर परिसर में लगी कला प्रदर्शनी इस बार भी एक अलग ही जज़्बा लेकर सामने आई है। एक ऐसा संगम, जहां श्रद्धा, भक्ति और सृजनात्मकता एक साथ बहती हुई नजर आईं। यह प्रदर्शनी केवल चित्रों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और पौराणिक प्रसंगों की एक जीवंत व्याख्या है जो दर्शकों को सहज ही एक आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ देती है।

यह कला दीर्घा अपने आप में अनूठी है। एक खुला विस्तार, जहां हर ओर रंग हैं, हर फ्रेम में एहसास है और हर कृति में भक्ति की गहराई समाई हुई है। पूरी दीर्घा विशेष रूप से हनुमान के चित्रों से सजी हुई है जो इसे एक विशिष्ट पहचान देती है। यहां हनुमान केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि भक्ति और शक्ति के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में उभरते हैं।

चित्रों में हनुमान जी के विविध स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किए गए हैं। कहीं वे प्रभु भक्ति में लीन, विनम्र और समर्पित दिखाई देते हैं तो आंखों में अटूट श्रद्धा और चेहरे पर शांत तेज। तो कहीं वे शक्ति, पराक्रम और साहस के प्रतीक के रूप में प्रकट होते हैं-विराट रूप में, संजीवनी पर्वत उठाए या लंका दहन करते हुए। इन चित्रों को देखते हुए यह सहज ही अनुभव होता है कि हनुमान केवल शक्ति नहीं, बल्कि संयमित शक्ति हैं; केवल भक्त नहीं, बल्कि भक्ति की पराकाष्ठा हैं।

संकट मोचन संगीत समारोह की आर्ट गैलरी की कला कृतियों में विशेष आकर्षण उन चित्रों का है जिनमें हनुमान जी के साथ राम, सीता और लक्ष्मण का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया गया है। इन चित्रों में संबंधों की एक गहरी संवेदना दिखाई देती है-भक्ति और भगवान का, सेवा और समर्पण का। कहीं हनुमान के साथ राम के सामने खड़े हैं तो कहीं वे माता सीता के चरणों में विनीत भाव से झुके हैं। ये दृश्य केवल चित्र नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक संवाद प्रतीत होते हैं।

प्रदर्शनी में अन्य पौराणिक प्रसंगों और देवताओं का भी सुंदर समावेश देखने को मिला। विशेष रूप से बाल कृष्ण की मोहक, चंचल और मासूम छवियां दर्शकों के मन को सहज ही छू लेती हैं। उनकी बाल लीलाओं को जिस कोमलता और रंग-संयोजन के साथ प्रस्तुत किया गया है वह भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है। इन चित्रों के माध्यम से कलाकारों ने भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को बड़े ही संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त किया है।

यदि कला शैली की दृष्टि से देखें तो यह प्रदर्शनी और भी प्रभावशाली बन जाती है। कलाकारों ने पारंपरिक भारतीय कला शैलियों-जैसे लघुचित्र शैली, लोक कला और मंदिर कला को आधार बनाते हुए उसमें आधुनिकता का सूक्ष्म स्पर्श भी जोड़ा है। यही कारण है कि ये कृतियां एक साथ पारंपरिक भी लगती हैं और समकालीन भी।

रंगों का संयोजन विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। गहरे केसरिया, लाल, नीले और सुनहरे रंगों का प्रयोग चित्रों में एक दिव्य आभा उत्पन्न करता है। केसरिया रंग भक्ति और त्याग का प्रतीक बनकर उभरता है। लाल ऊर्जा और शक्ति को दर्शाता है। नीला शांति और विस्तार का भाव देता है, जबकि सुनहरा रंग दिव्यता और आध्यात्मिक तेज को प्रकट करता है।

सूक्ष्म रेखांकन कलाकारों की साधना को दर्शाता है। हर रेखा सधी हुई, हर आकृति संतुलित और हर भाव स्पष्ट रूप से व्यक्त-यह सब मिलकर यह प्रमाणित करता है कि इन कृतियों के पीछे केवल कौशल ही नहीं, बल्कि गहरी साधना और समर्पण भी है।

प्रदर्शनी की साज-सज्जा भी उतनी ही प्रभावशाली है जितनी कि कृतियां स्वयं। एक लंबी दीवार पर क्रमबद्ध रूप से सजी ये कलाकृतियां दर्शकों को एक निरंतर कला-यात्रा पर ले जाती हैं। ऐसा लगता है मानो आप एक कथा के साथ-साथ चल रहे हों। एक चित्र से दूसरे चित्र तक, एक भाव से दूसरे भाव तक।

विशेष प्रकाश व्यवस्था ने इस अनुभव को और भी समृद्ध बना दिया। रोशनी इस तरह से डाली गई थी कि हर चित्र के रंग और बारीकियां उभरकर सामने आएं। रात के समय यह दृश्य और भी मनमोहक हो उठता है मानो चित्र स्वयं प्रकाशमान हो गए हों और अपनी कथा कह रहे हों।

इस दीर्घा में प्रवेश करते ही जो अनुभव होता है कि वह केवल दृश्य आनंद तक सीमित नहीं रहता। यह मन के भीतर उतरता है, सोच को प्रभावित करता है और आत्मा को स्पर्श करता है। यह वही क्षण होता है जब कला, भक्ति और अनुभूति एक हो जाते हैं।

इस पूरे अनुभव को और भी आत्मीय बना दिया जानी-मानी चित्रकार एवं मेरी बहन पूनम राय की उपस्थिति ने। उनके आग्रह पर हमने अपने साथियों और शुभचिंतकों के साथ एक समूह चित्र खिंचवाया। वह क्षण केवल एक औपचारिकता नहीं था, बल्कि इस पूरे अनुभव को सहेजने का एक माध्यम था। एक ऐसा पल, जिसमें कला भी थी, अपनापन भी और भक्ति का सुकून भी।

यह प्रदर्शनी केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक चेतना को भी जागृत करती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु, कला प्रेमी और युवा यहां आकर न केवल चित्रों को देख रहे हैं, बल्कि उनके माध्यम से भारतीय परंपरा, भक्ति और जीवन मूल्यों को समझने का प्रयास भी कर रहे थे।

यह कहा जा सकता है कि संकटमोचन संगीत समारोह की यह कला दीर्घा भक्ति, कला और संस्कृति का एक सशक्त संगम बनकर सामने आई है। यह केवल आंखों को आनंद देने वाली प्रदर्शनी नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाला अनुभव है। यहां हर रंग में हनुमान जी की शक्ति है। हर रेखा में उनकी भक्ति और हर चित्र में एक ऐसी रूहानियत जो देर तक दिल में बस जाती है…।

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