खेतों की मेड़ों से चीन की जेल तक : एक भारतीय सूबेदार के साहस, कैद और स्मृतियों की मार्मिक दास्तान
विजय विनीत
कुछ आत्मकथाएं केवल किसी एक आदमी की कहानी नहीं होतीं, बल्कि पूरे दौर की गवाही बन जाती हैं। शिवकुमार सिंह की आत्मकथा “सूबेदार” प्रतापगढ़ से चीन की जेल तक, एक ऐसी ही दस्तावेज़ी दास्तान है जहां एक गांव का लड़का खेत की मेड़ों से चलकर हिंदुस्तानी फौज की वर्दी तक पहुंचता है और फिर 1962 के भारत-चीन युद्ध की आग, कैद और वापसी की तकलीफ़ों से गुज़रता है।
“सूबेदार” अपने शुरुआती अध्याय में ही पाठक को पकड़ लेती है। इसमें कोई साहित्यिक बनावट का दिखावा नहीं है, न भाषा को सजाने-संवारने की कोशिश। यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है। यह सीधे दिल से निकली हुई बात है। बिना लाग-लपेट, बिना बनावट। एक फौजी की आवाज़, जो आने वाली नस्लों को बैठाकर अपनी कहानी सुना रहा हो।
शिवकुमार सिंह शुरुआत में ही बताते हैं कि वे भारतीय सेना की तोपख़ाना रेजिमेंट में सूबेदार रहे। उम्र के आख़िरी पड़ाव पर खड़े होकर वे अपनी यादों को समेटना चाहते हैं, क्योंकि “याददाश्त कमज़ोर हो रही है।” यह स्वीकारोक्ति ही किताब को इंसान बना देती है। यहां कोई ‘हीरो’ बनने की कोशिश नहीं, बल्कि एक सच्चा आदमी अपनी ज़िंदगी का हिसाब बयान कर रहा है।
आत्मकथा का शुरुआती हिस्सा प्रतापगढ़ के उस देहाती जीवन की तस्वीर पेश करता है जिसे आज की पीढ़ी शायद सिर्फ़ किस्सों में सुनती है। लेखक बताते हैं कि उनका जन्म 1940-41 के आसपास प्रतापगढ़ ज़िले के एक गांव में हुआ। जन्मतिथि तक पक्की नहीं-सरकारी कागज़ों में जो दर्ज हो गया, वही सच बन गया। यह एक पूरे दौर की सच्चाई थी।
गांव का जीवन, गरीबी, स्कूल की दूरी, खेतों की मेड़ों से पैदल पढ़ने जाना-इन बातों में एक अजीब सी गर्माहट है। वह बताते हैं कि उनके पास पहनने के लिए सिर्फ एक जोड़ी कपड़े थे जिन्हें धो-धोकर पहनते थे। यह महज़ गरीबी का बयान नहीं; यह उस पीढ़ी की इज़्ज़तदार मुफ़लिसी का चेहरा बन जाता है।
“सूबेदार” में उस समय की तालीम का भी दिलचस्प ज़िक्र है, जहां मास्टरों की सख़्ती, गांव के स्कूलों का अनुशासन, बच्चों का सुबह से शाम तक पढ़ना-इन सबके बीच शिवकुमार सिंह की पढ़ने की ललक साफ़ दिखाई देती है। यहां लेखक कहीं भावुक होकर रोते नहीं; वे बस बयान करते चलते हैं और वही सादगी असर पैदा करती है।
शिवकुमार सिंह के पिता छोटे किसान और मशहूर पहलवान थे। गांव का सामाजिक ढांचा, मेल-जोल, जातीय और आर्थिक रिश्ते, बनियों की दुकानें, बाज़ार का फैलाव-ये विवरण किताब को संस्मरण नहीं रहने देते; यह ग्रामीण उत्तर भारत का सामाजिक इतिहास बन जाती है।
एक नौजवान का हिंदुस्तान
आत्मकथा का अगला बड़ा पड़ाव है-फौज में भर्ती होने की बेचैनी। यह बेचैनी हर उस गांव के युवकों की है जहां फौज की नौकरी सिर्फ़ रोज़गार नहीं थी; वह इज़्ज़त, रुतबा और घर की तक़दीर बदलने का रास्ता थी। लेखक बताते हैं कि गांव के कई लोग बाहर शहरों में काम करने जाते थे-कलकत्ता, बंबई, इलाहाबाद, कानपुर। ऐसे माहौल में फौज एक अलग ही आकर्षण रखती थी।
भर्ती की प्रक्रिया का जो विवरण किताब में आता है, वह बेहद जीवंत है। मेडिकल टेस्ट, दौड़, ट्रेनिंग, दस्तावेज़, बार-बार लौटाया जाना, उम्मीद और मायूसी-सब कुछ इतनी सहजता से लिखा गया है कि पाठक खुद को उस लाइन में खड़ा महसूस करता है जहां नौजवान लड़के सीना तानकर भर्ती अफ़सरों के सामने खड़े हैं।
सेना में भर्ती के बाद ट्रेनिंग के दौरान सुबह की परेड, हथियारों की ट्रेनिंग, अनुशासन, अंग्रेज़ी कमांड, सज़ा, दौड़, भूख, थकान-इन सबका बयान बड़ा असरदार है। शिवकुमार सिंह बड़ी दिलचस्पी से बताते हैं कि किस तरह उन्हें “लेफ्ट-राइट” से लेकर रायफ़ल खोलना-बंद करना, ग्रेनेड चलाना और युद्धक अभ्यास सिखाया गया। यह हिस्सा सिर्फ़ सैन्य जीवन का विवरण नहीं, बल्कि मानसिक परिवर्तन की कहानी है। गांव का भोला लड़का अब “जवान” बन रहा है।
पुस्तक में लेखक की भाषा में हल्की-हल्की फौजी ठसक दिखाई देती है। “ऑर्डर”, “विथड्रॉअल”, “लाइन फ़ॉर्मेशन”, “ओ.पी.” जैसे शब्द कहानी को वास्तविकता देते हैं। कहीं-कहीं देसी हिंदी और फौजी अंग्रेज़ी का मिश्रण एक खास लहजा पैदा करता है जो किताब की पहचान बन सकता है। लेखक बताते हैं कि ट्रेनिंग सिर्फ़ हथियार चलाना नहीं थी; वह इंसान को तोड़कर नया आदमी बनाने की प्रक्रिया थी। यही वजह है कि आगे युद्ध और कैद की भयावह स्थितियों में भी वे टूटते नहीं।

इतिहास के भीतर की आवाज़
आत्मकथा का सबसे मार्मिक और शक्तिशाली हिस्सा वह है जहां भारत-चीन युद्ध की शुरुआत होती है। यहां किताब अचानक व्यक्तिगत संस्मरण से उठकर राष्ट्रीय त्रासदी का दस्तावेज़ बन जाती है। लेखक बताते हैं कि किस तरह उनकी यूनिट को सीमावर्ती इलाक़ों में भेजा गया। पहाड़, बर्फ़, दुर्गम रास्ते, रसद की कमी, ऊंचाई पर तोपें चढ़ाना-इन सबका वर्णन काफी मार्मिक है। कहीं कोई अतिनाटकीयता नहीं; लेकिन हर पंक्ति के पीछे ख़तरे की ठंडी आहट मौजूद रहती है।
विशेष रूप से वह दृश्य बेहद प्रभावशाली है जहां सेना को पीछे हटने का आदेश मिलता है। अंग्रेज़ी में आया आदेश, “Heavy opposition from front area, withdrawal to rear position” किताब में जैसे किसी टूटते हुए मनोबल की आवाज़ बनकर दर्ज होता है। लेखक बताते हैं कि भारतीय सेना के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे। कई ड्राइवर गाड़ियां छोड़कर भाग गए। गोला-बारूद, रसद और संपर्क व्यवस्था टूटती गई। मगर जवान मोर्चे पर डटे रहे। यह बयान युद्ध की असलियत को बिना किसी राष्ट्रवादी शोर-शराबे के सामने रखता है।
शिवकुमार सिंह युद्ध को फ़िल्मी बहादुरी की तरह नहीं दिखाते। वह डर, अफ़रा-तफ़री, आदेशों की उलझन और मौत की नज़दीकी सब कुछ बयान करते हैं। यही सच्चाई पाठक को भीतर तक हिला देती है। किताब का शायद सबसे भावनात्मक हिस्सा वह है जब सैनिकों को अपनी तोपें और हथियार नष्ट करने का आदेश मिलता है ताकि वे दुश्मन के हाथ न लगें।
लेखक लिखते हैं कि जवान रो पड़े। उन्होंने कसम खाई थी कि हथियार नहीं छोड़ेंगे। यह दृश्य सिर्फ़ सैन्य पराजय का नहीं, बल्कि सैनिक आत्मा के टूटने का दृश्य है। यहां लेखक की भाषा बेहद असरदार हो जाती है। कोई साहित्यिक अलंकार नहीं, सिर्फ़ एक सिपाही का दर्द और वही दिल चीर देता है।
कैद, भूख और भागने की दास्तान
इसके बाद आत्मकथा एक नए मोड़ पर पहुंचती है-चीन के जेल में कैद। यह हिस्सा किसी युद्ध उपन्यास से कम नहीं लगता। घायल सैनिक, बर्फ़ में भागना, लाशों के बीच छिपना, चीनी फौज की गोलियाँ, साथियों का बिछुड़ना-इन घटनाओं का विवरण बेहद सिनेमाई होते हुए भी वास्तविक बना रहता है।
लेखक के शरीर में गोली लगती है, वे बेहोश होते हैं, फिर चीनी अस्पताल और कैद शिविरों में पहुंचते हैं। वहां का वर्णन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंदी में भारतीय युद्धबंदियों के अनुभवों पर बहुत कम सामग्री उपलब्ध है। चीनी जेल का वातावरण, निगरानी, राजनीतिक प्रचार, खाने-पीने की दिक़्कतें, कैदियों की मानसिक हालत-ये सब विवरण इतिहास के लिए भी मूल्यवान हैं।
लेखक बताते हैं कि किस तरह कैदियों को बार-बार चीन की ताक़त और भारत की कमज़ोरी का पाठ पढ़ाया जाता था। यह सिर्फ़ युद्ध नहीं था; मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी थी।
“सूबेदार” की सबसे बड़ी खूबी इसकी भाषा है। यहाx साहित्यिक चमक कम है, लेकिन जीवन की गर्मी बहुत ज़्यादा है। भाषा में गांव की मिट्टी है, फौजी बैरक की सख़्ती है और बुज़ुर्ग की अपनाई हुई बातचीत भी। कई जगह ऐसा लगता है जैसे कोई दादा चारपाई पर बैठा किस्सा सुना रहा हो, “हम लोग”, “हमरी यूनिट”, “साहब बोले”, “गोली चलने लगी।”
“प्रतापगढ़ से चीन की जेल तक” की शुरुआती कड़ियां पढ़ते हुए महसूस होता है कि यह किताब सिर्फ़ एक सैनिक की कहानी नहीं है। यह आज़ादी के बाद वाले हिंदुस्तान की कहानी भी है, जहां गांव का लड़का खेत से उठकर सीमा तक पहुंचता है; जहां देशभक्ति नारे नहीं, बल्कि भूख, ठंड और जान देने की तैयारी थी। यह किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कोई बनावटी वीरता नहीं। यहां सैनिक डरता भी है, रोता भी है, घायल भी होता है, लेकिन फिर उठ खड़ा होता है। यही असली बहादुरी है।
युद्ध और कैद ने क्या बदला?
“प्रतापगढ़ से चीन की जेल तक” का यह अगला हिस्सा आत्मकथा को और भी गहरे मानवीय धरातल पर ले आता है। चीन की जेल से भागकर हिंदुस्तान लौटे चार जवानों की चर्चा ऊपर तक पहुंचती है। लेखक बताते हैं कि पहले फौज को भी यक़ीन नहीं था कि वे सचमुच चीनी कैद से निकलकर आए हैं। शक की निगाहें थीं, पूछताछ थी, रिकॉर्ड खंगाले जा रहे थे। यह हिस्सा बहुत अहम है, क्योंकि अक्सर युद्ध से लौटे सैनिकों को सीधे “हीरो” मान लिया जाता है, जबकि हक़ीक़त में उन्हें अपने ही सिस्टम के सामने खुद को साबित करना पड़ता है।
शिवकुमार सिंह जब बताते हैं कि बाद में उन्हें तेज़पुर लाया गया और वहां देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू उनसे मिलने आए, तो कहानी अचानक राष्ट्रीय इतिहास के एक बड़े फ्रेम में दाख़िल हो जाती है। नेहरू का उन जवानों से सवाल करना-कैसे पकड़े गए, कैसे भागे, कैसा व्यवहार हुआ, इन सबका जिक्र बेहद सादगी से आया है? नेहरू से मुलाक़ात जैसा प्रसंग भी वे किसी शेख़ी या भारीपन से नहीं लिखते। ऐसा लगता है जैसे कोई बुज़ुर्ग फौजी चौपाल में बैठा कह रहा हो, “हां, नेहरूजी आए थे… कुछ बातें पूछीं… फिर चले गए।” यही सादगी इस आत्मकथा को भरोसेमंद बनाती है।
इस हिस्से का सबसे मार्मिक अध्याय वह है जब चीन की जेल से भेजी गई चिट्ठी लगभग एक साल बाद शिवकुमार सिंह के गांव में पहुंचती है। तब तक घरवालों को यह भी नहीं मालूम था कि वे ज़िंदा हैं या नहीं? गांव में जब यह खबर फैलती है कि शिवकुमार सिंह जीवित हैं और चीन में क़ैद थे, तो पूरा माहौल जैसे सांस लेने लगता है।
लेखक बताते हैं कि उनके दोस्त ने लिखावट पहचानकर कहा, “यह शिवकुमार की ही लिखावट है।” यह छोटा सा विवरण पूरी कहानी को भावनात्मक ऊंचाई दे देता है। घर में कई दिनों तक सोहर जैसा माहौल रहता है। लोग मिलने आते हैं, कहानी सुनते हैं, चीन की जेल के बारे में पूछते हैं।
खुशी के बीच लेखक एक ऐसी त्रासदी का ज़िक्र करते हैं जो पूरे हिस्से को अंदर तक चीर देती है। उनके गायब हो जाने के सदमे में उनके पिता का मानसिक संतुलन बिगड़ चुका था। यह प्रसंग आत्मकथा का सबसे दर्दनाक और सबसे मानवीय हिस्सा बन जाता है। शिवकुमार सिंह बताते हैं कि उनके पिता उन्हें पहचान तक नहीं पाए। रात में उनके चेहरे को टटोलना, आंखों में हाथ डालकर पहचानने की कोशिश करना, कभी चेहरे को नोचना, कभी पास लेट जाना-ये दृश्य इतने जीवंत हैं कि पाठक खुद को उस कमरे में खड़ा महसूस करता है।
आत्मकथा आगे बढ़ती है तो उसकी भाषा बिल्कुल नंगी और सच्ची हो जाती है। कोई साहित्यिक सजावट नहीं, कोई आंसू खींचने की कोशिश नहीं-सिर्फ़ एक बेटे की बेबसी। वह अपने पिता को ठीक करना चाहता है, उनसे बातें करता है, लेकिन सब बेअसर। युद्ध की असली कीमत शायद यही होती है। गोलियां सिर्फ़ मोर्चे पर नहीं लगतीं; उनका असर घरों के भीतर भी बरसों तक रहता है।
छुट्टी खत्म होते ही लेखक को फिर फौज में लौटना पड़ता है। यह हिस्सा बहुत दिलचस्प है क्योंकि यहां एक सैनिक की मानसिकता सामने आती है। वह अभी-अभी मौत, जेल और पारिवारिक सदमे से निकला है, मगर फौजी ज़िंदगी किसी को ज्यादा देर ठहरने नहीं देती। उनकी पुरानी यूनिट लगभग खत्म हो चुकी थी। युद्ध में भारी नुकसान हुआ था। साथियों की मौत, यूनिट का बिखर जाना-इन सबके बाद उनकी नई पोस्टिंग होती है।
“सूबेदार” एक बार फिर सैन्य जीवन के रोज़मर्रा संसार में लौटती है-नई यूनिट, वायरलेस सेट, ट्रेनिंग, अलग-अलग शहर, बंगालोर की पोस्टिंग, नई तकनीक। लेखक के लिए यह शायद सामान्य ड्यूटी रही हो, लेकिन पाठकों के लिए यह एक सैनिक के “नॉर्मल” जीवन की झलक है, जहां युद्ध के बाद भी मशीन चलती रहती है।
सच बोलने का साहस
“सूबेदार” को पढ़ते हुए एक बात और साफ़ हो जाती है कि शिवकुमार सिंह अपनी कहानी को वीरगाथा बनाने की कोशिश नहीं करते। वे मानते हैं कि डर था। भागते समय जान बचाने की बेचैनी थी। गांव लौटने पर भीतर टूटन थी। पिता को खो देने जैसा दुख था। यही ईमानदारी किताब को अलग दर्जा देती है।
हिंदी में फौजी संस्मरण अक्सर या तो अत्यधिक राष्ट्रवादी जोश में चले जाते हैं, या फिर बहुत सूखे दस्तावेज़ बन जाते हैं। “प्रतापगढ़ से चीन की जेल तक” इन दोनों के बीच की राह पकड़ती है। इसमें देशभक्ति है, लेकिन शोर नहीं। इसमें दर्द है, लेकिन आत्मदया नहीं। इसमें बहादुरी है, लेकिन दिखावा नहीं।
पुस्तक में कई ऐसे अध्याय भी हैं जो इसे केवल युद्ध संस्मरण नहीं रहने देते, बल्कि एक पूरे दौर के ग्रामीण, सामाजिक और फौजी जीवन का जीवित दस्तावेज़ बना देते हैं। लेखक ने अपनी दास्तान को सिर्फ़ चीन की जेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि हिंदुस्तान के बदलते समाज, गांव की संस्कृति, रिश्तों, खेती-बाड़ी और फौजी जीवन के बाद की दुनिया को भी इसमें समेटा है।
आगे के अध्यायों में “1965 की लड़ाई : संसद और पालम हवाईअड्डा” और “1971 की लड़ाई : लोंगेवाला-सादेवाला में तोपखाने का कमाल” जैसे अध्याय यह संकेत देते हैं कि लेखक केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि तीन बड़े युद्धों के प्रत्यक्ष गवाह रहे हैं। इससे आत्मकथा का दायरा और व्यापक हो जाता है। अक्सर इतिहास युद्ध की जीत-हार तक रुक जाता है, लेकिन फौजी की जिंदगी उसके बाद भी चलती रहती है-पोस्टिंग, परिवार, अनुशासन, यादें और भीतर जमा हुआ दर्द। लेखक शायद इन्हीं परतों को आगे खोलते हैं।
“सूबेदार” में समाज का पूरा सांस्कृतिक संसार दर्ज है। “जड़ों की कहानी”, “ख़ून में पहलवानी”, “आजादी से पहले का दौर” और “परजा सिस्टम और ग्रामीण समाज” जैसे अध्याय उत्तर भारत के ग्रामीण इतिहास को समझने के लिए बेहद अहम लगते हैं। लेखक का परिवार पहलवानी की परंपरा से जुड़ा रहा, इसलिए गांव के अखाड़ों, देहाती ताक़त, मान-सम्मान और सामाजिक संरचना का ज़िक्र पुस्तक को और जीवंत बनाता है।
“औरतों की स्थिति”, “यादों में शादी की रस्में और पुरानी बातें”, “पहले की खेती-बाड़ी” और “कपड़े का कोटा” जैसे अध्याय उस दौर के सामाजिक जीवन की बारीक तस्वीर पेश करने की संभावना रखते हैं। यहां लेखक सिर्फ़ अपना जीवन नहीं लिख रहे, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की सामूहिक स्मृतियों को बचा रहे हैं। राशन, कपड़े का कोटा, खेती के पुराने तरीके, गांव की रस्में-ये सब आज के पाठक के लिए इतिहास की जीवित झलक बन जाते हैं।
पुस्तक में वंश-वृक्ष और पारिवारिक इतिहास को भी विस्तार से जगह दी गई है। “कोल और बघान का वंश-वृक्ष”, “कोल का वंश-वृक्ष”, “निहाल सिंह का परिवार”, “बघान का वंश-वृक्ष” और “माँ, मेरे भाई और परिवार” जैसे अध्याय यह बताते हैं कि लेखक अपनी जड़ों को कितना महत्व देते हैं। यह सिर्फ़ खानदान का ब्योरा नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज में परिवार और पहचान की अहमियत का बयान भी है।
कुछ अध्यायों के शीर्षक अपने आप में बेहद आत्मीय और देसी एहसास लिए हुए हैं-जैसे “मेरे हमजोली-मेरी गोल” और “हमारी नदी : सई”। इनसे अंदाज़ा होता है कि आगे कहानी में बचपन के दोस्त, खेल, नदी, खेत और गांव की मिट्टी फिर से लौटेगी। यही चीज़ इस आत्मकथा को सिर्फ़ फौजी दस्तावेज़ नहीं रहने देती; यह स्मृतियों का पूरा कारवां बन जाती है।
इतिहास के पीछे छिपे चेहरे
आख़िर में “गांव में उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी”, “परिवर्तन ही प्रकृति है” और “अंत में प्रार्थना” जैसे अध्याय शायद लेखक के जीवन-दर्शन और बदलते समाज पर उनके विचारों को सामने लाते हैं। “सूबेदार” केवल अतीत का रोना नहीं रोती, बल्कि बदलाव, संघर्ष और समय की चाल को भी समझने की कोशिश करती है। यह एक फौजी की आत्मकथा जरूर है, लेकिन इसके भीतर गांव का इतिहास, परिवार की स्मृतियां, देहाती संस्कृति, सामाजिक बदलाव और हिंदुस्तान की कई पीढ़ियों का सफ़र साथ-साथ चलता है।
“सूबेदार” को पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि इतिहास की किताबों में जिन युद्धों को सिर्फ़ तारीख़ों और नक्शों में पढ़ाया जाता है, उनके पीछे कितने टूटे हुए घर, बिखरे हुए पिता और अधूरी ज़िंदगियां होती हैं। 1962 का युद्ध भारत के लिए सिर्फ़ सैन्य हार नहीं था; वह लाखों परिवारों की बेचैनी और असुरक्षा का दौर भी था। लेखक की कहानी उस बड़े इतिहास को इंसानी चेहरा देती है। यहां युद्ध का रोमांच पीछे छूट जाता है और इंसान का असली दुख सामने आता है। यही इस किताब की सबसे बड़ी ताक़त है।
सूबेदार शिवकुमार सिंह की आवाज़ में कोई बनावटी साहित्यिक चमक नहीं, बल्कि एक ऐसी सच्चाई है जो पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि मुल्क की सीमाओं की रक्षा करने वाले जवान आखिर अपने भीतर कितना कुछ दबाकर जीते हैं। यह आत्मकथा हिंदी फौजी संस्मरण साहित्य में एक अहम जगह बनाने की पूरी काबिलियत रखती है।
हमलोग प्रकाशन की पुस्तक “सूबेदार’ की बेहतरीन साज-सज्जा, आकर्षक आवरण, उम्दा कागज़ और साफ़-सुथरी प्रिंटिंग पाठकीय अनुभव को बेहद सुखद बना देती है। प्रकाशन की गुणवत्ता इस पुस्तक को संग्रहणीय गरिमा प्रदान करती है।
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं-संपर्क : 07068509999)
