बनारसी साड़ी असली है या नकली, अब क्यूआर कोड बताएगा !

बनारसी साड़ी असली है या नकली, अब क्यूआर कोड बताएगा !

बनारसी साड़ियों में नत्थी होगा क्यूआर कोड, मोबाइल से स्कैन करते ही मिलेगी उत्पाद की प्रामाणिक जानकारी

विजय विनीत

वाराणसी। बनारसी साड़ी की पहचान अब केवल उसकी बुनाई, डिजाइन, रंग और कारीगरी से ही नहीं होगी, बल्कि उसकी प्रामाणिकता की डिजिटल पहचान भी संभव हो सकेगी। बनारस की प्रसिद्ध हथकरघा साड़ियों को नकली और पावरलूम उत्पादों से अलग पहचान दिलाने के लिए साड़ी के कपड़े में ही क्यूआर कोड और प्रमाणिकता से जुड़े लोगो बुनने की तकनीक विकसित की जा रही है। मोबाइल फोन से इस क्यूआर कोड को स्कैन करते ही ग्राहक साड़ी के निर्माण, निर्माता और उत्पाद से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल कर सकेगा।

बनारसी साड़ी और हथकरघा उद्योग के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाजार में लंबे समय से असली हथकरघा साड़ी और मशीन से तैयार पावरलूम साड़ी के बीच अंतर करना ग्राहकों के लिए चुनौती बना हुआ है। कई बार ग्राहक अधिक कीमत चुकाकर ऐसी साड़ी खरीद लेते हैं, जिसे हथकरघा उत्पाद बताकर बेचा जाता है, जबकि वह वास्तव में पावरलूम पर तैयार की गई होती है। इसी समस्या का तकनीकी समाधान तलाशने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बीएचयू (आईआईटी-बीएचयू) के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के औद्योगिक प्रबंधन से जुड़ी शोध टीम ने भी काम किया है।

साड़ी में ही होगी डिजिटल पहचान

हथकरघा उद्योग में साड़ियों पर क्यूआर कोड और प्रमाणिकता से जुड़े लोगो के इस्तेमाल के जरिए ग्राहकों का विश्वास बढ़ाने की संभावनाओं पर कई साल पहले आईआईटी-बीएचयू और अंगिका सहकारी समिति के सहयोग से शोध किया गया था। इसका उद्देश्य आधुनिक डिजिटल तकनीक को पारंपरिक हथकरघा बुनाई से जोड़ना था, ताकि इसका लाभ कारीगरों के साथ-साथ ग्राहकों को भी मिल सके। सहकार भारती के सहयोग से अब इस योजना को पहचान मिलनी शुरू हुई है।

नई व्यवस्था में ग्राहक अपने मोबाइल फोन से साड़ी में बुने क्यूआर कोड को स्कैन कर सकेगा। इसके बाद डिजिटल माध्यम से उस साड़ी से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है। इसमें निर्माता का विवरण, निर्माण का स्थान, निर्माण की तारीख और उत्पाद की प्रमाणिकता से जुड़ी अन्य जानकारियां शामिल की जा सकती हैं। बुनकरों का कोई व्योरा टैग में नहीं होगा।

साड़ी कारोबारी श्याम सुंदर जायसवाल के साथ पत्रकार विजय विनीत

इस व्यवस्था के लागू होने पर ग्राहक केवल दुकानदार या विक्रेता के दावे पर निर्भर नहीं रहेगा। वह स्वयं साड़ी की पहचान और उसके निर्माण से जुड़ी जानकारी डिजिटल माध्यम से देख सकेगा। यह सुविधा उन ग्राहकों के लिए भी उपयोगी होगी, जिन्हें हथकरघा, पावरलूम, हैंडलूम मार्क, सिल्क मार्क और जीआई मार्क के बीच अंतर की पूरी जानकारी नहीं होती। डिजिटल सत्यापन की सुविधा से ग्राहक को साड़ी खरीदते समय अधिक भरोसा मिल सकता है।

बनारसी साड़ी की लंबाई सामान्यतः करीब 6.50 मीटर होती है, जिसमें लगभग एक मीटर कपड़ा ब्लाउज के लिए शामिल रहता है। इसी हिस्से में क्यूआर कोड के साथ प्रमाणिकता से जुड़े अन्य लोगो को टैग किया जा रहा है। इस व्यवस्था से साड़ी के मुख्य डिजाइन और पारंपरिक सौंदर्य को प्रभावित किए बिना उसकी डिजिटल पहचान मिल जाया करेगी। क्यूआर कोड से साड़ी की मुख्य डिजाइन पर कोई अनावश्यक असर नहीं पड़ेगा। साथ ही साड़ी की पारंपरिक बुनाई और रूप-रंग को भी बरकरार रखा जा सकेगा।

बनारसी साड़ी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक असली हथकरघा उत्पाद की पहचान और उसके नाम पर बिकने वाले मशीन निर्मित उत्पादों का बाजार है। ऐसी स्थिति में साड़ी के भीतर ही डिजिटल पहचान उपलब्ध होने से ग्राहकों को उत्पाद की प्रमाणिकता जांचने का एक अतिरिक्त माध्यम मिल सकता है।

तकनीक के व्यावहारिक रूप से लागू होने पर इसका लाभ बुनकरों को भी मिल सकता है। उन्हें काम मिलेगाग और हथकरघा उद्योग को पंख लगेंगे। असली हथकरघा उत्पाद की पहचान स्पष्ट होने से पारंपरिक कारीगरी को उचित मूल्य दिलाने और ग्राहकों के बीच भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

बनारसी साड़ी अपनी पारंपरिक बुनाई और विशिष्ट कारीगरी के कारण देश-दुनिया में अलग पहचान रखती है। ऐसे में उसकी डिजिटल पहचान की यह पहल परंपरा और तकनीक के मेल का उदाहरण बन सकती है। आने वाले समय में यदि यह व्यवस्था व्यापक स्तर पर लागू होती है तो मोबाइल से एक छोटा-सा क्यूआर कोड स्कैन करके ग्राहक यह जान सकेगा कि उसके हाथ में मौजूद बनारसी साड़ी की पहचान और प्रमाणिकता क्या है?

नकली हैंडलूम मार्क पर लग सकता है अंकुश

बनारसी साड़ी के कारोबार में प्रामाणिकता लंबे समय से बड़ी चुनौती रही है। ग्राहक अक्सर यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें बेची जा रही साड़ी वास्तव में हथकरघे पर बुनी गई है या पावरलूम पर तैयार की गई है। दूसरी ओर, हैंडलूम मार्क, सिल्क मार्क और जीआई पहचान को लेकर भी सीमित ग्राहकों को ही पर्याप्त जानकारी होती है। यही वजह है कि बाजार में भ्रम की स्थिति बनी रहती है और कई बार ग्राहक असली हथकरघा उत्पाद के नाम पर मशीन से तैयार साड़ी खरीद लेते हैं।

बड़ी संख्या में ग्राहक हथकरघा और पावरलूम से तैयार साड़ियों के बीच अंतर नहीं कर पाते। इसी तरह कई ग्राहकों को यह भी स्पष्ट जानकारी नहीं होती कि हैंडलूम मार्क और जीआई मार्क की वास्तविक पहचान क्या है और उन्हें किस तरह सत्यापित किया जा सकता है। ऐसे में साड़ी में ही प्रमाणिकता के संकेत और डिजिटल जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था ग्राहकों के भरोसे को मजबूत कर सकती है।

ग्राहकों के सामने यह चुनौती भी रहती है कि विक्रेता द्वारा दिया गया हैंडलूम मार्क वास्तविक है या उसके स्थान पर कोई डुप्लीकेट अथवा गलत पहचान चिह्न लगाया गया है। यदि प्रमाणिकता से जुड़ी जानकारी सीधे साड़ी में बुने क्यूआर कोड के माध्यम से उपलब्ध हो जाए तो ग्राहक के लिए उत्पाद की पहचान करना कहीं आसान हो सकता है।

नई पहल से बदल सकता है साड़ी कारोबार

आईआईटी-बीएचयू के प्रो. प्रभाष भारद्वाज का कहना है कि वाराणसी के हथकरघा उद्योग को समय के साथ आधुनिक तकनीक और नए दृष्टिकोण से जोड़ने की जरूरत है। उनके अनुसार, इस क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी आधारित अनुप्रयोगों की व्यापक संभावनाएं हैं। पारंपरिक हथकरघा उद्योग को डिजिटल तकनीक से जोड़कर न केवल उत्पाद की पहचान को मजबूत किया जा सकता है, बल्कि बाजार में उसकी विश्वसनीयता भी बढ़ाई जा सकती है। क्यूआर कोड इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

आज का ग्राहक केवल उत्पाद की कीमत और डिजाइन नहीं देखता, बल्कि उसकी उत्पत्ति, गुणवत्ता, निर्माण प्रक्रिया और प्रमाणिकता के बारे में भी जानना चाहता है। बनारसी साड़ी जैसे पारंपरिक और अपेक्षाकृत महंगे उत्पाद के साथ यदि उसकी डिजिटल पहचान और निर्माण से जुड़ी जानकारी उपलब्ध हो तो इससे ग्राहक का भरोसा बढ़ सकता है और उत्पाद की बाजार-प्रतिष्ठा भी मजबूत हो सकती है।

इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्यूआर कोड के माध्यम से निर्माता और उत्पादन इकाई से जुड़ी जानकारी भी उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे ग्राहक को यह जानने में मदद मिल सकती है कि साड़ी कहां तैयार की गई है?

भविष्य में डिजिटल रिकॉर्ड में बुनकर का विवरण, निर्माण स्थल, निर्माण की तारीख, साड़ी की श्रेणी, इस्तेमाल किए गए धागे और अन्य प्रमाणिक जानकारियां शामिल की जा सकती हैं। इससे उत्पाद और उसके निर्माता अथवा विक्रेता के बीच सीधा संबंध स्थापित करने में मदद मिलेगी। यानी ग्राहक को केवल साड़ी का विवरण ही नहीं, बल्कि निर्माण प्रक्रिया की जानकारी भी मिल सकेगी।

यदि यह व्यवस्था व्यापक स्तर पर लागू होती है तो बनारसी साड़ी के कारोबार में ट्रेसबिलिटी, यानी उत्पाद की पहचान और उसकी पूरी यात्रा को दर्ज करने की व्यवस्था भी मजबूत हो सकती है। ग्राहक साड़ी खरीदते समय यह जान सकेगा कि वह किस प्रकार का उत्पाद खरीद रहा है और उसकी प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?

स्थानीय से विदेशी बाजार तक फायदा

बनारसी साड़ी की मांग देश के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी है। विदेशी ग्राहकों के सामने कई बार उत्पाद की प्रमाणिकता और उसके निर्माण से जुड़ी जानकारी हासिल करना चुनौतीपूर्ण होता है। डिजिटल क्यूआर कोड इस दूरी को कम करने में मदद कर सकता है।

यदि क्यूआर कोड से जुड़ी जानकारी किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराई जाती है तो भविष्य में ग्राहक अपनी भाषा में भी साड़ी के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। इससे बनारसी साड़ी की ब्रांड पहचान मजबूत करने और उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक विश्वसनीय उत्पाद के रूप में स्थापित करने में मदद मिल सकती है।

अंगिका सहकारी समिति, वाराणसी के अध्यक्ष अमरेश कुशवाहा और डिजाइनर अंगिका ने साड़ियों में इस क्यूआर कोड तकनीक के इस्तेमाल की पहल शुरू की है। उनका कहना है कि जीआई और हथकरघा चिह्नों के समुचित उपयोग तथा उनकी पहचान के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होने के कारण ग्राहक अक्सर हथकरघे पर बुनी साड़ी और पावरलूम पर तैयार साड़ी के बीच अंतर नहीं कर पाता।

इसी समस्या को देखते हुए साड़ियों में क्यूआर कोड और जीआई लोगो को इनबिल्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। क्यूआर कोड लोगो वाली साड़ियां अंगिका साड़ी के लल्लापुरा स्थित शो-रूम में बिकनी शुरू हो गई है। यूपिका के चेयरमैन अमरेश कुशवाहा का मानना है कि क्यूआर कोड तकनीक स्थानीय ग्राहकों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले खरीदारों को भी हथकरघा और पावरलूम उत्पादों के बीच अंतर समझने में मदद कर सकती है।

साड़ी बताएगी अपनी पूरी कहानी

इस तकनीक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह हो सकती है कि साड़ी पर लगा क्यूआर कोड केवल एक पहचान संख्या तक सीमित न रहे, बल्कि वह उस साड़ी की डिजिटल पहचान और निर्माण की पूरी कहानी सामने लाए। मसलन, किसी साड़ी को तैयार करने में चार महीने लगे हैं तो यह जानकारी उसके डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज की जा सकती है।

इसी तरह साड़ी किस प्रकार के रेशम या अन्य धागे से तैयार की गई है, उसमें किस तरह की जरी का इस्तेमाल हुआ है, जरी में सोने की कितनी मात्रा है या किस प्रकार की इलेक्ट्रोप्लेटिंग की गई है, साड़ी हथकरघे पर तैयार हुई है या किसी अन्य तकनीक से उपलब्ध और सत्यापित जानकारियों को क्यूआर कोड से जोड़ा जा रहा है।

यदि साड़ी किसी विशेष डिजाइन, बुनकरी शैली या पारंपरिक कारीगरी से जुड़ी है तो उसका विवरण भी डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल किया जा सकता है। इससे ग्राहक को साड़ी के पीछे छिपी कारीगरी और उसके निर्माण की प्रक्रिया को समझने का अवसर मिलेगा।

मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन करते ही ग्राहक के सामने साड़ी से संबंधित उपलब्ध डिजिटल जानकारी खुल सकती है। इस तरह वह केवल साड़ी की बनावट देखकर या दुकानदार के दावे पर भरोसा करके खरीदारी करने के बजाय उसकी डिजिटल पहचान भी जांच सकेगा।

कारीगर और ग्राहक दोनों के लिए उम्मीद

बनारसी साड़ी केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी बुनकरी परंपरा, डिजाइन, श्रम और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। हजारों बुनकर परिवार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं। इसलिए हथकरघा उत्पाद की सही पहचान केवल ग्राहक के हित का विषय नहीं, बल्कि बुनकरों की आजीविका और उनकी कला के संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है।

यदि असली हथकरघा साड़ी और पावरलूम उत्पाद के बीच अंतर स्पष्ट रूप से सामने आता है तो पारंपरिक बुनकरों को बाजार में अपनी वास्तविक पहचान स्थापित करने में मदद मिल सकती है। ग्राहक भी यह तय कर सकेगा कि वह किस प्रकार का उत्पाद खरीद रहा है और उसके लिए चुकाई जा रही कीमत किस उत्पाद के अनुरूप है।

डिजिटल पहचान की यह व्यवस्था बुनकरों की मेहनत को सामने लाने का माध्यम भी बन सकती है। साड़ी की पहचान के साथ यदि उसके निर्माता और बुनकर की जानकारी भी उपलब्ध होती है तो ग्राहक को यह समझने में मदद मिलेगी कि एक खूबसूरत बनारसी साड़ी के पीछे कितने समय, श्रम और कौशल की भूमिका है।

बनारसी साड़ी की बदलती पहचान

बनारस की हथकरघा परंपरा अपनी जटिल बुनाई, महीन कारीगरी और विशिष्ट डिजाइन के लिए दुनिया भर में पहचानी जाती है। आधुनिक बाजार में इस परंपरा को कायम रखने के लिए केवल उत्कृष्ट बुनाई पर्याप्त नहीं है। उत्पाद की पहचान, ब्रांडिंग, प्रमाणिकता और डिजिटल जानकारी भी अब उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।

ऐसे समय में साड़ी के ताने-बाने में तकनीक को शामिल करने की कोशिश एक नए दौर की शुरुआत कर सकती है। यदि क्यूआर कोड से जुड़ी डिजिटल पहचान विश्वसनीय, पारदर्शी और व्यापक व्यवस्था के साथ लागू होती है तो ग्राहक के हाथ में मौजूद बनारसी साड़ी केवल अपनी सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रमाणिक पहचान के लिए भी जानी जाएगी।

बनारस में जरी और बनारसी साड़ियों के बड़े कारोबारी श्याम सुंदर जायसवाल कहते हैं कि वाले समय में बनारसी साड़ी को देखकर ही नहीं, बल्कि उसे मोबाइल से स्कैन करके भी जाना जा सकेगा कि वह कहां बनी है, कहां और किस प्रकार की बुनाई व सामग्री का इस्तेमाल किया गया है और उसकी प्रमाणिक पहचान क्या है?

परंपरा और तकनीक का यह मेल बनारस के हथकरघा उद्योग को बदलते बाजार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। क्यूआर कोड के माध्यम से साड़ी की डिजिटल पहचान मजबूत होती है तो इससे ग्राहक का भरोसा बढ़ने के साथ-साथ बुनकरों की पारंपरिक कला को भी नई बाजार-व्यवस्था में पहचान मिल सकती है।

सारी जानकारी देगा क्यूआर कोड

सहकार भारती के प्रदेश प्रमुख शैलेश प्रताप सिंह इस मुहिम को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। वह कहते हैं कि अधिकांश ग्राहकों को हथकरघा और पावरलूम से तैयार साड़ियों के बीच अंतर की पर्याप्त जानकारी नहीं है। हथकरघा चिह्न और जीआई चिह्न के बारे में भी सीमित संख्या में ग्राहक ही जानते हैं।

शैलेश प्रताप सिंह के मुताबिक, बड़ी संख्या में ग्राहक इस बात से भी अनजान हैं कि विक्रेता साड़ी पर वास्तविक हैंडलूम मार्क लगा रहा है या उसके साथ किसी तरह का डुप्लीकेट हैंडलूम चिह्न दिया जा रहा है? इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए साड़ी के कपड़े में ही बनारसी टैग का लोगो और क्यूआर कोड को शामिल करने की तकनीक विकसित की गई है। इसका उद्देश्य ग्राहक को ऐसी डिजिटल जानकारी उपलब्ध कराना है, जिसके आधार पर वह यह समझ सके कि उसके हाथ में मौजूद साड़ी हथकरघे पर तैयार हुई है या पावरलूम पर।

शैलेश प्रताप सिंह ने बताया कि इस तकनीक के जरिए सबसे पहले यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि साड़ी पावरलूम पर तैयार हुई है या हथकरघे पर इसके लिए क्यूआर कोड विकसित किया गया है। क्यूआर कोड को मोबाइल फोन से स्कैन करने पर साड़ी से संबंधित उपलब्ध जानकारी सामने आ सकेगी। इसमें साड़ी के निर्माण और उसकी पहचान से जुड़े विवरण शामिल किए जा सकते हैं। इससे ग्राहक को साड़ी खरीदते समय उसकी प्रमाणिकता को समझने में मदद मिलेगी।

उन्होंने बताया कि क्यूआर कोड के साथ कई तरह के प्रमाणिकता चिह्न भी तैयार किए गए हैं। इन चिह्नों के माध्यम से साड़ी में इस्तेमाल किए गए रेशम और अन्य सामग्री से संबंधित जानकारी भी उपलब्ध कराई जा सकती है। उदाहरण के तौर पर, यदि साड़ी में सिल्क का इस्तेमाल हुआ है तो डिजिटल रिकॉर्ड में यह जानकारी दर्ज की जा सकती है कि उसमें सिल्क की मात्रा या प्रतिशत कितना है।

नकल पर कार्रवाई में भी मिल सकती है मदद

इस डिजिटल पहचान का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू साड़ी की नकल और उसकी डिजाइन की कॉपी से जुड़ा है। यदि किसी साड़ी की निर्माण प्रक्रिया, डिजाइन और पहचान का प्रमाणिक डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है तो भविष्य में उसकी नकल करने वाले उत्पादों की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई में भी मदद मिल सकती है।

शैलेश प्रताप सिंह के अनुसार, यह तकनीक ग्राहकों को असली साड़ी की पहचान कराने के साथ-साथ बनारसी हथकरघा उद्योग में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में भी उपयोगी साबित हो सकती है। उनका कहना है कि तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यही होगा कि ग्राहक केवल दुकानदार के दावे पर निर्भर नहीं रहेगा। वह क्यूआर कोड स्कैन करके साड़ी से जुड़ी जानकारी खुद हासिल कर सकेगा। इससे असली हथकरघा साड़ी और पावरलूम उत्पाद के बीच अंतर करने में आसानी होगी और ग्राहकों को प्रमाणिक उत्पाद खरीदने में मदद मिलेगी।

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