बनारस की कई परतें : बाहर का शहर, भीतर का जीवन

बनारस की कई परतें : बाहर का शहर, भीतर का जीवन

@विजय विनीत

सभी शहरों की वास्तविकता की कई परतें होती हैं, लेकिन बनारस के मामले में यह बात कुछ ज्यादा सच लगती है। यह शहर अनादि काल से इतिहास, आस्था, जीवन और मृत्यु की परतों को अपने भीतर समेटे हुए है। बाहर से देखने पर बनारस घाट, गंगा, चिताओं, मंदिरों, गलियों, साधुओं और आध्यात्मिकता का शहर दिखाई देता है, लेकिन इस दृश्य के पीछे एक ऐसा बनारस भी है, जिसे यहां रहने वाले लोग रोज जीते हैं।

बनारस को देखने की बाहरी नजर ने इसे कई तरह से परिभाषित किया है। यह अशोक का शहर है, जिसकी स्मृति पास के सारनाथ में खड़े स्तंभ से जुड़ती है। यह तुलसीदास का शहर है, जिन्होंने यहीं रामचरितमानस की रचना की। गालिब ने भी इसे अपनी कविता में प्रेम से याद किया। विदेशी पर्यटक यहां मोक्ष की तलाश में आते हैं। लेकिन इसी बनारस में गृहस्थ, दुकानदार, पुजारी, नाविक, टुकटुक चालक, धर्मशाला संचालक, शव ढोने वाले और शव जलाने वाले भी रहते हैं। उनके लिए यह किसी आध्यात्मिक यात्रा का पड़ाव नहीं, बल्कि जीवन और रोजी-रोटी का शहर है। यही फर्क बनारस को समझने की सबसे जरूरी कुंजी है।

जॉर्ज लुइस बोर्खेस ने अपनी कविता बनारस’ में शहर को एक स्वप्न की तरह आबाद जगह के रूप में देखा। बोर्खेस, एलन गिन्सबर्ग और ज्योफ डायर जैसे लेखकों के लेखन में बनारस अपनी एक खास आध्यात्मिक और कल्पनात्मक छवि के साथ सामने आता है। उस छवि के भीतर रहने वालों का अनुभव अलग हो सकता है। क्या जिस गली में बाहर से आया व्यक्ति मोक्ष खोजता है और उसी गली में रहने वाला व्यक्ति भी वही अनुभव करता है? क्या गंगा का पानी उसके लिए निर्वाण का प्रतीक है या जीवन और प्रदूषण की रोजमर्रा की वास्तविकता?

बनारस की इस दूसरी वास्तविकता को समझने में राधिका अयंगर की पुस्तक फायर ऑन द गंगा: लाइफ अमंग द डेड इन बनारस महत्वपूर्ण है। पुस्तक डोम समुदाय की जिंदगी के जरिए उस बनारस को सामने लाती है, जो शहर की आध्यात्मिक छवि के पीछे अक्सर दिखाई नहीं देता। डोम अंतिम संस्कार की चिताओं को जलाए रखते हैं और मृतकों की अंतिम यात्रा में अपनी भूमिका निभाते हैं। उनकी सेवाएं अनिवार्य हैं, लेकिन सामाजिक उपस्थिति को अदृश्य बनाए रखने की अपेक्षा भी उन्हीं से की जाती है।

यही बनारस की गहरी विडंबना है। मृत्यु यहां सार्वजनिक है, लेकिन मृत्यु के साथ जीवन बिताने वाले लोग अदृश्य हैं। अयंगर के डोम समुदाय के जीवन के वर्णन ने श्मशान में देखी एक पुरानी तस्वीर याद दिला दी। खुले में जलती चिता पर एक शव था। सिर पिघल रहा था और शरीर की चर्बी आग को और भड़का रही थी। उस दृश्य के साथ एक सवाल भी आया था कि जो लोग हर दिन शवों के बीच काम करते हैं, वे इन दृश्य के साथ कैसे जीते होंगे?

पिता की अस्थियां लेने के लिए विद्युत शवदाह गृह के बेहद गर्म गड्ढे में उतरने का अनुभव इस सवाल को और गहरा करता है। वह क्षण पाताल की यात्रा जैसा लगा था। जिस जीवन को तब तक जाना था, वह धुएं और राख में बदल चुका था। श्मशान पर काम करने वाले एक युवक ने राख से भरा पात्र हाथ में दिया। उसके चेहरे पर गर्मजोशी, उदासी और आत्मीयता से भरी मुस्कान थी। उसी क्षण किंग लियर की पंक्तियां याद आईं, मनुष्य को यहां आने की तरह ही यहां से जाने को भी सहना पड़ता है। परिपक्वता ही सब कुछ है।”

श्मशान का यह अनुभव बताता है कि बनारस को केवल मृत्यु के दृश्य से नहीं, बल्कि उन मनुष्यों के अनुभव से समझना होगा जो उस मृत्यु के सबसे करीब रहते हैं। जीवन की इसी निरंतरता में भोजन भी आता है। भोजन केवल पेट भरने की वस्तु नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवन का हिस्सा है। भोजन के नाम पर खड़ा किया गया संघर्ष, जैसे गोमांस खाने को लेकर विवाद, इसी बुनियादी मानवीय संबंध को तनाव में बदल देता है।

मानवशास्त्री डॉली किकोन ने फूड जर्नीज : स्टोरीज फ्रॉम द हार्ट की भूमिका में नागा संस्कृति में भोजन की केंद्रीयता को रेखांकित करते हुए लिखा है कि नागा भोजन करना किसी सम्मोहक शक्ति के साथ गाने जैसा है। शायद इसलिए अच्छा भोजन बनाते समय लोग गुनगुनाते और गाते हैं। डॉली किकोन और जोएल रॉड्रिग्स द्वारा संपादित यह पुस्तक भोजन के जरिए संस्कृति और जीवन को समझने की कोशिश करती है।

बनारस को देखने का सही रास्ता भी शायद यही है। उसे केवल उन प्रतीकों में न तलाशा जाए जिन्हें बाहर की दुनिया ने उसके लिए चुन लिया है। घाट और गंगा बनारस हैं, लेकिन उनके साथ रहने वाले लोग भी बनारस हैं। चिताएं बनारस हैं, लेकिन उन्हें जलाने वाले हाथ भी बनारस हैं। गलियां बनारस हैं, लेकिन उन गलियों में रोजी-रोटी तलाशते लोग भी बनारस हैं। बनारस की असली कहानी उसके दृश्यों में जितनी है, उससे कहीं ज्यादा उन लोगों के जीवन में है जो इन दृश्यों के भीतर रहते हैं।

सभी शहरों की वास्तविकता की कई परतें होती हैं, लेकिन बनारस के मामले में यह बात कुछ ज्यादा सच लगती है। यह शहर अनादि काल से इतिहास, आस्था, जीवन और मृत्यु की परतों को अपने भीतर समेटे हुए है। बाहर से देखने पर बनारस घाट, गंगा, चिताओं, मंदिरों, गलियों, साधुओं और आध्यात्मिकता का शहर दिखाई देता है, लेकिन इस दृश्य के पीछे एक ऐसा बनारस भी है, जिसे यहां रहने वाले लोग रोज जीते हैं।

बनारस को देखने की बाहरी नजर ने इसे कई तरह से परिभाषित किया है। यह अशोक का शहर है, जिसकी स्मृति पास के सारनाथ में खड़े स्तंभ से जुड़ती है। यह तुलसीदास का शहर है, जिन्होंने यहीं रामचरितमानस की रचना की। गालिब ने भी इसे अपनी कविता में प्रेम से याद किया। विदेशी पर्यटक यहां मोक्ष की तलाश में आते हैं। लेकिन इसी बनारस में गृहस्थ, दुकानदार, पुजारी, नाविक, टुकटुक चालक, धर्मशाला संचालक, शव ढोने वाले और शव जलाने वाले भी रहते हैं। उनके लिए यह किसी आध्यात्मिक यात्रा का पड़ाव नहीं, बल्कि जीवन और रोजी-रोटी का शहर है। यही फर्क बनारस को समझने की सबसे जरूरी कुंजी है।

जॉर्ज लुइस बोर्खेस ने अपनी कविता बनारस’ में शहर को एक स्वप्न की तरह आबाद जगह के रूप में देखा। बोर्खेस, एलन गिन्सबर्ग और ज्योफ डायर जैसे लेखकों के लेखन में बनारस अपनी एक खास आध्यात्मिक और कल्पनात्मक छवि के साथ सामने आता है। उस छवि के भीतर रहने वालों का अनुभव अलग हो सकता है। क्या जिस गली में बाहर से आया व्यक्ति मोक्ष खोजता है और उसी गली में रहने वाला व्यक्ति भी वही अनुभव करता है? क्या गंगा का पानी उसके लिए निर्वाण का प्रतीक है या जीवन और प्रदूषण की रोजमर्रा की वास्तविकता?

बनारस की इस दूसरी वास्तविकता को समझने में राधिका अयंगर की पुस्तक फायर ऑन द गंगा: लाइफ अमंग द डेड इन बनारस महत्वपूर्ण है। पुस्तक डोम समुदाय की जिंदगी के जरिए उस बनारस को सामने लाती है, जो शहर की आध्यात्मिक छवि के पीछे अक्सर दिखाई नहीं देता। डोम अंतिम संस्कार की चिताओं को जलाए रखते हैं और मृतकों की अंतिम यात्रा में अपनी भूमिका निभाते हैं। उनकी सेवाएं अनिवार्य हैं, लेकिन सामाजिक उपस्थिति को अदृश्य बनाए रखने की अपेक्षा भी उन्हीं से की जाती है।

यही बनारस की गहरी विडंबना है। मृत्यु यहां सार्वजनिक है, लेकिन मृत्यु के साथ जीवन बिताने वाले लोग अदृश्य हैं। अयंगर के डोम समुदाय के जीवन के वर्णन ने श्मशान में देखी एक पुरानी तस्वीर याद दिला दी। खुले में जलती चिता पर एक शव था। सिर पिघल रहा था और शरीर की चर्बी आग को और भड़का रही थी। उस दृश्य के साथ एक सवाल भी आया था कि जो लोग हर दिन शवों के बीच काम करते हैं, वे इन दृश्य के साथ कैसे जीते होंगे?

पिता की अस्थियां लेने के लिए विद्युत शवदाह गृह के बेहद गर्म गड्ढे में उतरने का अनुभव इस सवाल को और गहरा करता है। वह क्षण पाताल की यात्रा जैसा लगा था। जिस जीवन को तब तक जाना था, वह धुएं और राख में बदल चुका था। श्मशान पर काम करने वाले एक युवक ने राख से भरा पात्र हाथ में दिया। उसके चेहरे पर गर्मजोशी, उदासी और आत्मीयता से भरी मुस्कान थी। उसी क्षण किंग लियर की पंक्तियां याद आईं, मनुष्य को यहां आने की तरह ही यहां से जाने को भी सहना पड़ता है। परिपक्वता ही सब कुछ है।”

श्मशान का यह अनुभव बताता है कि बनारस को केवल मृत्यु के दृश्य से नहीं, बल्कि उन मनुष्यों के अनुभव से समझना होगा जो उस मृत्यु के सबसे करीब रहते हैं। जीवन की इसी निरंतरता में भोजन भी आता है। भोजन केवल पेट भरने की वस्तु नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवन का हिस्सा है। भोजन के नाम पर खड़ा किया गया संघर्ष, जैसे गोमांस खाने को लेकर विवाद, इसी बुनियादी मानवीय संबंध को तनाव में बदल देता है।

मानवशास्त्री डॉली किकोन ने फूड जर्नीज : स्टोरीज फ्रॉम द हार्ट की भूमिका में नागा संस्कृति में भोजन की केंद्रीयता को रेखांकित करते हुए लिखा है कि नागा भोजन करना किसी सम्मोहक शक्ति के साथ गाने जैसा है। शायद इसलिए अच्छा भोजन बनाते समय लोग गुनगुनाते और गाते हैं। डॉली किकोन और जोएल रॉड्रिग्स द्वारा संपादित यह पुस्तक भोजन के जरिए संस्कृति और जीवन को समझने की कोशिश करती है।

बनारस को देखने का सही रास्ता भी शायद यही है। उसे केवल उन प्रतीकों में न तलाशा जाए जिन्हें बाहर की दुनिया ने उसके लिए चुन लिया है। घाट और गंगा बनारस हैं, लेकिन उनके साथ रहने वाले लोग भी बनारस हैं। चिताएं बनारस हैं, लेकिन उन्हें जलाने वाले हाथ भी बनारस हैं। गलियां बनारस हैं, लेकिन उन गलियों में रोजी-रोटी तलाशते लोग भी बनारस हैं। बनारस की असली कहानी उसके दृश्यों में जितनी है, उससे कहीं ज्यादा उन लोगों के जीवन में है जो इन दृश्यों के भीतर रहते हैं।

(विजय विनीत, बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)

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