बनारस की रूह में उतरी आध्यात्मिक चेतना को रंगों में ढालतीं अनुष्का

बनारस की रूह में उतरी आध्यात्मिक चेतना को रंगों में ढालतीं अनुष्का

@विजय विनीत

बनारस कोई शहर नहीं, एक कैफ़ियत है। यह वह मुक़ाम है जहां ज़िंदगी और मौत आमने–सामने बैठकर एक-दूसरे को पहचानती हैं। जहां भक्ति तर्क से नहीं लड़ती और ज्ञान अहंकार से मुक्त रहता है। गंगा की लहरों में यहां सिर्फ़ पानी नहीं बहता, सदियों की स्मृति, आस्था और आत्मबोध बहता है। घाटों की सीढ़ियों पर बैठा हर मनुष्य कोई कहानी नहीं, बल्कि एक सवाल बन जाता है-अपने होने, अपने अंत और अपने अर्थ को लेकर। इसी बनारस की रूहानी चेतना, इसी आध्यात्मिक सरज़मीं की ख़ामोश धड़कन को चित्रकार अनुष्का मौर्य ने अपनी कला में रंगों के ज़रिये ढालने की कोशिश की है।

अनुष्का की यह कृति किसी मंदिर की प्रतिमा नहीं रचती, किसी देवी–देवता का साकार रूप सामने नहीं रखती, फिर भी यह पूरी तरह धार्मिक और आध्यात्मिक है। बनारस की धार्मिकता प्रतीकों में नहीं, अनुभूति में बसती है। यह चित्र उसी अनुभूति की पैदाइश लगता है जहां शब्द थककर मौन हो जाते हैं और दृष्टि भीतर की ओर मुड़ जाती है। इसे देखते हुए लगता है कि कलाकार ने रंगों से पहले मन को साधा है और रेखाओं से पहले मौन को समझा है।

चित्र के केंद्र में स्थित शांत, नेत्रमुद्रित चेहरा किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस मनःस्थिति का रूपक है, जहां इंसान संसार में रहते हुए भी संसार से परे खड़ा हो जाता है। यह ध्यान कोई क्रिया नहीं, बल्कि एक ठहराव है। वह ठहराव, जो बनारस की भीड़ में चलते हुए भी संभव है और मणिकर्णिका की अग्नि के सामने बैठकर भी। यह वही ध्यान है जिसमें विचार समाप्त नहीं होते, मगर अपनी तीव्रता खो देते हैं। योग की भाषा में यह चित्त की स्थिरता है और सूफ़ियाना लहजे में यह दिल का सुकून।

चेहरे के पीछे बना स्वर्णिम वलय किसी सजावटी आभूषण की तरह नहीं चमकता, बल्कि चेतना के नूर की तरह भीतर से उजाला करता है। यह वही उजास है जिसे काशी में शिव की मौजूदगी के रूप में महसूस किया जाता है-बिना रूप, बिना शोर, मगर हर जगह व्याप्त। यह प्रकाश बाहर फैलकर चमत्कार नहीं करता, बल्कि भीतर टिककर आत्मबोध रचता है। चित्र के ऊपरी हिस्से से नीचे उतरती महीन रेखाएं उस ऊर्जा की ओर इशारा करती हैं, जिसे भारतीय दर्शन में प्राण कहा गया है और आध्यात्मिक परंपरा में रूह की हरकत। यह ऊर्जा किसी आकाशीय चमत्कार की तरह नहीं, बल्कि सांस की तरह स्वाभाविक है-ऊपर से नहीं, भीतर से बहती हुई।

चित्र के दाईं ओर उभरा हुआ दूसरा मुख और उसके साथ कानों की पुनरावृत्ति बनारस के उस द्वैत को सामने लाती है, जिसमें शोर और ख़ामोशी एक साथ चलते हैं। यह वह शहर है जहां घंटियों की आवाज़, मंत्रों की गूंज, आरतियों का आलाप और बाज़ारों का कोलाहल हर पल मौजूद रहता है, फिर भी इसी शोर के बीच कोई साधक आंखें मूंदे दुनिया से बेख़बर दिखाई दे जाता है। यह चित्र बिना कुछ कहे यह बात रख देता है कि सुनना केवल कानों का काम नहीं, चेतना का संस्कार है। बाहरी आवाज़ों के हंगामे में भी भीतर की सदा सुन लेना-यही बनारस की साधना है।

चित्र के निचले हिस्से में अग्नि और जल के प्रतीक बनारस की धार्मिक स्मृति को और गहरा कर देते हैं।मणिकर्णिका की अग्नि और गंगा का जल-दोनों ही यहां मोक्ष के मार्ग माने गए हैं। अग्नि यहां विनाश नहीं, शुद्धि है और जल बहाव नहीं, स्वीकार। अनुष्का मौर्य इन दोनों तत्वों को संघर्ष में नहीं, संतुलन में रखती हैं। यही योग का सार है-विरोधों को मिटाना नहीं, उन्हें हमआहंग करना। यह संतुलन ही मनुष्य को भीतर से मुक्त करता है।

रंगों के चयन में भी वही संयम और ठहराव दिखाई देता है। धूसर, काला और स्वर्ण-ये रंग आंखों को चकाचौंध नहीं करते, बल्कि दिल को ठहराते हैं। आज के तेज़, चमकीले और प्रदर्शनप्रिय कला–संसार में यह संयम अपने आप में एक रूहानी बयान है। रेखाएं बहती हैं, मगर बिखरती नहीं। यह अनुशासन अनुष्का की कला–भाषा की पहचान है। उनकी कृतियां न उपदेश देती हैं, न तमाशा रचती हैं। वे चुपचाप भीतर उतरती हैं जैसे बनारस की सुबह गंगा के पानी पर उतरती है।

अनुष्का मौर्य ने अपनी कला में किसी नए दर्शन का दावा नहीं किया। उन्होंने सदियों पुरानी आध्यात्मिक अनुभूति को समकालीन संवेदना में ढाल दिया है। उन्होंने यह खोजा है कि ध्यान को देखा जा सकता है, ऊर्जा को बिना चमत्कार बनाए महसूस कराया जा सकता है और अध्यात्म को बिना धर्म के शोर के जिया जा सकता है। उनकी कला यह नहीं बताती कि सत्य क्या है, बल्कि उस हाल में ले जाती है जहां सत्य अपने आप ज़ाहिर हो जाता है।

यह चित्र खुद बनारस की तरह है-कोई इसे देखने आता है, कोई इसमें ठहर जाता है और कोई इसमें विलीन हो जाता है। यहां कला इबादत बन जाती है और इबादत मौन। शायद यही अनुष्का की सबसे बड़ी साधना है कि उनकी कृति देखने के बाद इंसान कुछ लम्हों के लिए चुप हो जाता है। शायद, उसी ख़ामोशी में बनारस की रूह, ध्यान की शांति और ऊर्जा की धड़कन एक साथ सांस लेने लगती है।

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