रंग, मौन और शिव : निवेक्षा रॉय के कैनवस पर काशी के बाबा विश्वनाथ
निवेक्षा की चित्रकला में है शिव का मौन स्वर और आध्यात्मिक अनुभव का एहसास
विजय विनीत
निवेक्षा रॉय का कला संसार किसी दीर्घा की सीमाओं में क़ैद नहीं रहता। वह उस ख़ामोश और विस्तृत आंतरिक विस्तार तक फैल जाता है जहां मनुष्य की अंतःचेतना अपने आप से रूबरू होती है। उनकी चित्रकला दृश्य भर नहीं रचती, वह एक भीतरी अवस्था पैदा करती है। यह अवस्था किसी शोर, किसी दावे या किसी आह्वान से नहीं बनती, बल्कि एक ठहरी हुई रोशनी की तरह धीरे धीरे भीतर उतरती चली जाती है। ऐसी रोशनी, जो आंखों को नहीं चौंकाती, बल्कि मन और रूह को सहला देती है।
निवेक्षा के कैनवास पर रंगों की मौजूदगी किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि एक तसव्वुफ़ी सन्नाटे की तरह है। न यहां रंग चिल्लाते हैं, न आकृतियां ध्यान खींचने की कोशिश करती हैं। सब कुछ अपने भीतर सिमटा हुआ, संतुलित और आत्मस्थ दिखाई देता है। यह चित्रकला देखने वाले से कुछ कहने की ज़िद नहीं करती। वह बस मौजूद रहती है, और अपनी मौजूदगी से ही असर पैदा करती है।
निवेक्षा रॉय की एक पेंटिंग होटल ताज में आयोजित वाराणसी लिटफेस्ट 0.4 में प्रदर्शित की गई है जो साहित्य प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। साहित्य और कला के इस संगम में यह पेंटिंग किसी उद्घोष की तरह नहीं, बल्कि एक शांत दीपशिखा की तरह उपस्थित है। बिना किसी दावे के, बिना किसी आग्रह के बस एक स्थिर प्रकाश जो भीतर उतरता चला जाता है।

बाबा विश्वनाथ की यह पेंटिंग उसी अवस्था का सघन दृश्य रूप है। यहां शिव किसी सिंहासन पर बैठे देवता नहीं हैं। वह चेतना की वह शाश्वत उपस्थिति हैं जो हर जीव में मौन रूप से स्पंदित होती है। यह शिव मूर्ति नहीं, अनुभूति हैं। उनके नेत्रों में ऐसी शांति है जो सवालों से परे है। वह कोई उत्तर नहीं देती, बस आश्रय देती है।
जटाओं में जैसे समय खुद ठहर गया हो। मुखमंडल पर वह दिव्य निस्तब्धता है, जिसमें सृष्टि अपनी सारी थकान उतार सकती है। यह चित्र बाहर की ओर देखने को प्रेरित नहीं करता। यह भीतर की ओर बुलाता है। मानो कोई बिना शब्दों के कह रहा हो कि तलाश यहीं समाप्त होती है।
इस कृति में शिव का रूप किसी प्रतिमात्मक कठोरता से मुक्त है। वह कंपन है, वह स्पंदन है। दिखाई कम देता है, महसूस अधिक होता है। निवेक्षा रॉय शिव को मंदिर की ऊंचाई से उतारकर इंसान के हृदय में प्रतिष्ठित करती हैं। उनकी यह पेंटिंग पूजा नहीं मांगती, वह ध्यान की ओर ले जाती है। यह आस्था को विचार से निकालकर अनुभव में बदल देती है।
निवेक्षा रॉय के कैनवास पर वाराणसी कोई भौगोलिक इकाई नहीं रह जाती। वह एक आध्यात्मिक स्थिति बन जाती है। घाटों की सीढ़ियां जैसे मौन साधना में बैठी हों। गलियां किसी पुरानी स्मृति की तरह सांस लेती हुई प्रतीत होती हैं। हवा में घुली आरती की लौ दृश्य नहीं रहती, वह ऊर्जा में बदल जाती है। यहां बनारस देखा नहीं जाता, भीतर घटित होता है।
उनकी चित्रकला में समय रेखीय नहीं चलता। वह वृत्ताकार हो जाता है। अतीत, वर्तमान और भविष्य एक ही क्षण में समा जाते हैं। भस्म की धूसरता, गंगा का स्थिर प्रवाह, संध्या की नीलिमा-सब कुछ प्रतीक बनकर उभरता है। ये प्रतीक कोई कथा नहीं कहते, बल्कि अनुभूति की भूमि तैयार करते हैं। इस पेंटिंग में काशी विश्वनाथ कोई स्थापत्य नहीं बनते, वे चेतना का केंद्र बन जाते हैं। वह बिंदु, जहां आस्था तर्क से आगे बढ़कर अनुभव में बदल जाती है।
निवेक्षा रॉय इन सबको रंगों में नहीं, ऊर्जा में बांध देती हैं। उनकी कला किसी दृश्य को पकड़ने की कोशिश नहीं करती, वह एक भीतरी अवस्था को थाम लेती है। यही कारण है कि उनकी पेंटिंग एक बार देखकर समाप्त नहीं होती। वह दर्शक के भीतर चलती रहती है स्मृति में, मौन में और कई बार अनजाने में भी।
निवेक्षा रॉय की कूची से उतरे हर स्ट्रोक में संयम दिखाई देता है। ऐसा संयम, जो अभ्यास से नहीं, साधना से उपजा हुआ लगता है। उनके रंगों में न उतावलापन है, न आक्रामकता। वे जैसे अपने समय पर सांस लेते हैं और अपने समय पर ठहरते हैं। यह कला आंखों को नहीं, चेतना को संबोधित करती है। यहां सौंदर्य कोई बाहरी सजावट नहीं, बल्कि भीतर उपजी शांति का प्रतिरूप बनकर सामने आता है।
उनकी चित्रकला भावुकता की अतिशयता से बचती है। यहां करुणा है, लेकिन आर्तनाद नहीं। यहां आस्था है, लेकिन प्रदर्शन नहीं। आध्यात्मिकता यहां किसी मत या सिद्धांत की घोषणा नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव की तरह सामने आती है। यही उनकी कला की मूल विशेषता है। यह किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाती, बल्कि एक अवस्था में ले जाकर छोड़ देती है।
निवेक्षा रॉय का कला संसार यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिकता कोई दूर की यात्रा नहीं है। वह इसी क्षण, इसी श्वास में मौजूद है। उनकी पेंटिंग्स भावुकता नहीं जगातीं, वे जागृति जगाती हैं। आंखों से होकर मन में नहीं रुकतीं, चेतना तक पहुंचती हैं।
बाबा विश्वनाथ की यह छवि रंगों में ढली वही आध्यात्मिक ऊर्जा है जो इंसान को क्षण भर के लिए ही सही, अपने सत्य के क़रीब ले आती है। यही निवेक्षा रॉय की कला का सार है। यह देखे जाने के लिए नहीं, जिये जाने के लिए है। यह दीवारों पर नहीं, दिल में टंगती है। और जब एक बार दिल में उतर जाए, तो वहां से उतरती नहीं।
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)
