रूह-ए-बनारस की जीवंत तस्वीर : मनीष खत्री की कूंची में संकट मोचन मंदिर, स्मृति और श्रद्धा
जहां रंग बोलते हैं, रेखाएं गुनगुनाती हैं और हर दृश्य बनारस की आत्मा को धीरे-धीरे खोलता है….!
विजय विनीत
बनारस को अगर शब्दों में बांधना आसान होता तो शायद उसकी पहचान इतनी गहरी न होती। यह शहर सिर्फ जगह नहीं, एक एहसास है जहां समय ठहरकर सांस लेता है, जहां हर सुबह एक नई शुरुआत लगती है और हर शाम एक पुरानी याद। इसी बनारस को अपनी कला में जीवंत करने वाले चित्रकार और फोटोग्राफर मनीष खत्री ने इस पेंटिंग में जो रचा है वह एक साधारण चित्र नहीं, बल्कि भावनाओं की एक पूरी दुनिया है।
यह पेंटिंग तीन मुख्य रूपों को साथ लेकर चलती है-संकट मोचन मंदिर, पवन पुत्र हनुमान और पंडित स्वर्गीय वीरभद्र मिश्र। पहली नज़र में यह एक संयोजन लगता है, लेकिन ध्यान से देखने पर यह एक कहानी बन जाता है-भक्ति, परंपरा और संगीत की कहानी। इस चित्र में समय के तीन आयाम भी छुपे हैं-अतीत (मंदिर), आदर्श (हनुमान) और वर्तमान से जुड़ी स्मृति (पंडित वीरभद्र मिश्र)।
मनीष खत्री की कला की खासियत यह है कि वह चीजों को ज्यों का त्यों नहीं उतारते, बल्कि उन्हें अपने अनुभव और संवेदना के साथ प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि इस पेंटिंग को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे हम किसी दृश्य को नहीं, बल्कि एक एहसास को देख रहे हों।
मनीष खत्री का नाम बनारस की कला दुनिया में एक भरोसे के साथ लिया जाता है। वह फोटोग्राफी और पेंटिंग दोनों माध्यमों में काम कर रहे हैं। दोनों में ही एक समान गहराई दिखाई देती है। उनका काम यह दिखाता है कि वह बनारस को बाहर से नहीं, भीतर से जानते हैं।
उनकी नजर आम चीजों में भी खासियत ढूंढ लेती है-चाहे वह किसी मंदिर की पुरानी दीवार हो, घाट पर बैठा कोई साधु हो या फिर किसी बुजुर्ग का शांत चेहरा। यही दृष्टि इस पेंटिंग में भी दिखाई देती है। उन्होंने संकट मोचन मंदिर को सिर्फ एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा के रूप में दिखाया है।
महसूस होता है कि कलाकार का इस विषय से एक भावनात्मक जुड़ाव है। पंडित वीरभद्र मिश्र का चित्रण बहुत सम्मान और अपनत्व के साथ किया गया है-जैसे कोई अपने प्रिय व्यक्ति को याद कर रहा हो।
रंग, रेखा और संतुलन
इस पेंटिंग में रंगों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया गया है। मंदिर के हिस्से में हल्के हरे, भूरे और मिट्टी जैसे रंग हैं जो उसकी पुरानी बनावट और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाते हैं। ऐसा लगता है जैसे समय ने खुद इन दीवारों पर अपने निशान छोड़ दिए हों।
हनुमान के चित्र में सुनहरे, केसरिया और हल्के लाल रंगों का उपयोग उन्हें एक दिव्य आभा देता है। उनके चारों ओर का प्रकाश उन्हें इस पूरे चित्र का केंद्र बना देता है। उनकी मुद्रा, उनके वस्त्र और उनके चेहरे की शांति-सब कुछ बहुत संतुलित और प्रभावशाली है।
पंडित वीरभद्र मिश्र का चित्र सबसे शांत और सरल है। हल्के नीले और सफेद रंगों में उनका बैठा हुआ स्वरूप एक स्थिरता और सुकून का एहसास देता है। ऐसा लगता है जैसे वह इस पूरे दृश्य को चुपचाप देख रहे हों-बिना कुछ कहे, लेकिन बहुत कुछ कह देते हुए। तीनों हिस्सों का संतुलन भी बहुत खूबसूरती से बनाया गया है। कहीं भी कोई हिस्सा दूसरे पर हावी नहीं होता, बल्कि सब मिलकर एक पूरी कहानी बनाते हैं।
पेंटिंग की तकनीक इसकी आत्मा को और मजबूत बनाती है। मनीष खत्री ने इसमें वॉटरकलर और ऐक्रेलिक का मिश्रण किया है जिससे चित्र में पारदर्शिता और गहराई दोनों आती हैं।
मंदिर के हिस्से में जो टेक्सचर दिखाई देता है वह खास तौर पर ध्यान खींचता है। दीवारों की खुरदरी सतह, सीढ़ियों की घिसावट और दरवाजे की बनावट-सब कुछ बहुत वास्तविक लगता है। इसके लिए कलाकार ने ड्राई ब्रश तकनीक और लेयरिंग का इस्तेमाल किया है।
भगवान राम के चित्र में ब्रश का काम बहुत नियंत्रित और साफ है। यहां रंगों की परतें एकदम संतुलित हैं, जिससे उनका चेहरा और शरीर स्पष्ट और आकर्षक दिखाई देता है।
पंडित वीरभद्र मिश्र के चित्र में लाइन और रंग का मेल बहुत सुंदर है। हल्की रेखाओं के साथ रंगों की नरम परतें उन्हें एक जीवंत रूप देती हैं। रोशनी और छाया का खेल भी बहुत प्रभावी है। मंदिर के अंदर की हल्की रोशनी, भगवान राम के चारों ओर का आभामंडल और पंडित जी के चेहरे पर पड़ती नरम छाया-ये सब मिलकर एक गहराई पैदा करते हैं।
इस पेंटिंग की सबसे बड़ी ताकत इसका भाव है। यह चित्र सिर्फ देखने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए है। इसमें संकट मोचन मंदिर की वह पुरातन परंपरा भी झलकती है जहां हर साल संगीत समारोह होता है।
पंडित वीरभद्र मिश्र, जिन्होंने इस परंपरा की शुरुआत की, इस चित्र में एक स्मृति के रूप में मौजूद हैं। उनका शांत चेहरा और ध्यानमग्न मुद्रा यह दर्शाती है कि संगीत सिर्फ ध्वनि नहीं, बल्कि एक साधना है। हनुमान की उपस्थिति इस पूरे दृश्य को एक आध्यात्मिक आधार देती है। वह इस कहानी के केंद्र में हैं-जैसे सब कुछ उन्हीं के चारों ओर घूम रहा हो। मंदिर, भगवान और पंडित जी-तीनों मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं जहां भक्ति, कला और जीवन एक साथ बहते हैं।
एक जीवंत अनुभव
इस पेंटिंग को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे आप खुद उस जगह पर मौजूद हों। मंदिर की सीढ़ियां, हवा में घुली खुशबू, दूर से आती घंटियों की आवाज और कहीं पास ही बजता संगीत-सब कुछ जैसे जीवंत हो उठता है।
मनीष खत्री ने इस अनुभव को बहुत ही सादगी और ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया है। उन्होंने किसी भी चीज़ को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया, बल्कि जैसे है वैसे ही, लेकिन अपने नजरिए के साथ। उनकी पेंटिंग सिर्फ एक कला का नमूना नहीं, बल्कि एक एहसास है-एक ऐसी यात्रा, जो देखने वाले को बनारस की गलियों में ले जाती है। इसमें न सिर्फ रंग और रेखाएं हैं, बल्कि यादें, भावनाएं और एक गहरी शांति भी है।
मनीष खत्री की यह कृति यह साबित करती है कि कला तब सबसे ज्यादा सुंदर होती है जब उसमें सच्चाई और संवेदना हो। और इस पेंटिंग में यह दोनों चीजें भरपूर हैं। यह एक ऐसी पेंटिंग है जिसे जितनी बार देखो, उतनी बार कुछ नया महसूस होता है और शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।

काशी और मनीष की ख़ामोश दृष्टि
मनीष खत्री केवल एक चित्रकार और छायाचित्रकार ही नहीं हैं; वे काशी के मौन इतिहासकार हैं। उनकी तस्वीरें बोलती नहीं, फिर भी बहुत कुछ कह जाती हैं। उनमें एक ठहराव है, एक गहराई है-मानो समय स्वयं कुछ क्षणों के लिए ठिठक गया हो।
बचपन से ही कला उनके भीतर एक सहज प्रवाह की तरह थी। मात्र 16 वर्ष की आयु में जब जीवन के अर्थ अभी आकार ले ही रहे होते हैं, उन्होंने एक कार्टूनिस्ट के रूप में अपने रचनात्मक जीवन की शुरुआत की। यह शुरुआत साधारण नहीं थी-यह उस दृष्टि का संकेत थी जो आगे चलकर दुनिया को एक नए ढंग से देखने वाली थी।
वर्ष 1999 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करते हुए उन्होंने स्वर्ण पदक अर्जित किया। यह केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उनके समर्पण, अनुशासन और कला के प्रति उनकी निष्ठा का प्रमाण थी। आज वे उसी विश्वविद्यालय के व्यावहारिक कला विभाग में अतिथि प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहे हैं। वह केवल तकनीक नहीं, बल्कि देखने की संवेदना सिखाते आ रहे हैं।
एक साधक का शांत विस्तार
मनीष खत्री का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा कलाकार समय के साथ नहीं चलता, बल्कि समय से आगे सोचता है। वर्ष 1994 में, जब डिजिटल माध्यम अपनी प्रारंभिक अवस्था में था, तब उन्होंने कंप्यूटर को चित्रकला के माध्यम के रूप में प्रस्तुत कर एक नई दिशा दी। यह कदम केवल प्रयोग नहीं था-यह एक क्रांति थी, जिसने कला को नई संभावनाओं से जोड़ा।
उन्होंने देश का पहला “कंप्यूटर पेंटिंग इंस्टीट्यूट” स्थापित किया। वहां केवल चित्र बनाना नहीं सिखाया जाता था, बल्कि कल्पना को तकनीक के साथ जोड़ने की कला सिखाई जाती थी। 2,500 से अधिक विद्यार्थियों ने वहां से प्रशिक्षण प्राप्त किया और अपने जीवन को एक नई दिशा दी। उनकी यह पहल इस बात का प्रमाण है कि कला केवल परंपरा में ही नहीं, बल्कि नवाचार में भी जीवित रहती है।
मनीष खत्री की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विनम्रता और उनकी शांत साधना है। वे उन कलाकारों में से नहीं हैं जो अपने कार्य का शोर करते हैं। वे उन विरले लोगों में हैं, जो चुपचाप अपने कर्म में लीन रहते हैं।
इसी भाव का एक अत्यंत सुंदर रूप तब दिखाई देता है जब वे संकट मोचन संगीत समारोह से एक वैरियर (स्वयंसेवक) के रूप में जुड़े रहते हैं। यह आयोजन, जहां संगीत साधना बन जाता है और सुर भक्ति का रूप ले लेते हैं-वहां मनीष खत्री की उपस्थिति अत्यंत साधारण, फिर भी अत्यंत अर्थपूर्ण होती है।
न कोई आडंबर, न कोई प्रदर्शन। भीड़ के बीच एक शांत व्यक्ति जो अपने कर्तव्य में रमा हुआ है। जब रात्रि के अंतिम प्रहर में कोई राग मंदिर के प्रांगण में फैलता है तब वे कहीं चुपचाप खड़े उस क्षण को अपने भीतर और अपने कैमरे में समेट रहे होते हैं। उनका यह रूप बताता है कि सच्चा कलाकार केवल सृजन नहीं करता, बल्कि वह उस वातावरण का भी एक विनम्र सहभागी होता है, जहाँ कला जन्म लेती है।
दृश्य नहीं, एक जीवित अनुभूति
पिछले बारह वर्षों में मनीष खत्री ने वाराणसी के बदलते स्वरूप को जिस संवेदनशीलता के साथ अपने कैमरे में कैद किया है, वह उन्हें विश्व स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाता है। उनकी तस्वीरों में केवल दृश्य नहीं होते-उनमें जीवन होता है। गंगा के घाटों पर बैठा एक साधु, किसी गली में खेलता हुआ बच्चा, आरती के समय उठती हुई लौ या फिर किसी बूढ़े चेहरे पर उभरती हुई थकान-इन सबमें वे वह भाव पकड़ लेते हैं, जो सामान्य आंखों से छूट जाता है।
मनीष की छवियां काशी के सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक आयामों का एक जीवंत दस्तावेज़ हैं। वे उस शहर को दिखाती हैं जो बदल रहा है, फिर भी अपनी आत्मा में उतना ही स्थिर है। उनकी कृतियां देश-विदेश में प्रदर्शित हुई हैं और उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। इन सबके बीच उनकी कला की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह दिल को छूती है-धीरे, मगर गहराई से।
उनकी प्रमुख पुस्तकें, “Varanasi: The Luminous City”, “Ardhkumbh”, “The Book of Banaras” और “The Life of Banaras” में काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक अनुभव बनकर उभरती है। इन पुस्तकों के पन्नों में गंगा की नमी है, मंदिरों की ध्वनि है और उस जीवन का प्रवाह है जो निरंतर चलता रहता है।
मनीष खत्री ने ‘फोटो टूरिज्म’ की शुरुआत कर वाराणसी को एक नई पहचान दी। उन्होंने देश-विदेश से आने वाले फोटोग्राफरों के लिए कार्यशालाएं और फोटो वॉक आयोजित किए। यह पहल केवल पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नहीं थी, बल्कि लोगों को काशी को देखने की एक नई दृष्टि देने के लिए थी। उनकी इस पहल से वाराणसी एक ऐसे गंतव्य के रूप में उभरा, जहाँ कला प्रेमी और फोटोग्राफर केवल तस्वीरें लेने नहीं, बल्कि अनुभव प्राप्त करने आते हैं।
उनकी कला और सामाजिक योगदान को तब एक विशेष पहचान मिली, जब ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ अभियान के अंतर्गत एक विशेष आयोजन में उनके योगदान के लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। यह उपलब्धि उनके कौशल के साथ-साथ उनके सामाजिक सरोकारों का भी प्रमाण है।
मनीष खत्री की कला हमें यह सिखाती है कि किसी शहर को समझना केवल उसे देखना नहीं, बल्कि उसे महसूस करना होता है। उनकी तस्वीरें काशी को केवल आंखों के सामने नहीं लातीं, वे उसे हमारे भीतर आस्था का स्वर जगा देती हैं। उनकी फोटोग्राफी एक ऐसा अनुभव है जो देखने के बाद भी खत्म नहीं होती। वह हमारे भीतर कहीं लंबे समय तक गूंजता रहता है जैसे किसी दूर मंदिर की घंटी… धीमे-धीमे, मगर अनंत तक…।
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)
