धरती की पीड़ा से उपजी शोध की रोशनी
डॉ. आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ के सफर में एक साथ मिलती है खेतों की सच्चाई, विज्ञान की गंभीरता और कविता की कोमलता
विजय विनीत
जब कोई इंसान अपने जीवन को केवल अपनी तरक्की तक सीमित नहीं रखता, बल्कि समाज, प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ सार्थक करने का संकल्प लेता है, तब उसकी यात्रा अपने आप खास बन जाती है। ऐसी ही एक प्रेरक शख्सियत हैं डॉ. आकृति विज्ञा ‘अर्पण’, जिन्होंने वनस्पति शास्त्र में पीएचडी की उपाधि हासिल कर न केवल अपने परिवार और गांव का नाम रोशन किया, बल्कि एक ऐसे विषय पर काम किया जो आज के समय की बड़ी जरूरत है।
आकृति की कहानी केवल एक छात्रा की सफलता नहीं है, यह उस सोच की कहानी है जो मिट्टी की खुशबू को पहचानती है, किसानों के दर्द को समझती है और विज्ञान के माध्यम से समाधान खोजने का साहस रखती है।
आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ का जीवन सादगी और संघर्ष के बीच आगे बढ़ा। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालयों में हुई। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके भीतर सीखने की तीव्र इच्छा थी। यही इच्छा आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बनी।
दसवीं तक की पढ़ाई गांव में पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया। गोरखपुर विश्वविद्यालय से उन्होंने बीएससी, एमएससी और बीएड की पढ़ाई पूरी की। वे शुरू से ही मेधावी छात्रा रहीं और पढ़ाई के साथ अपनी संवेदनशील दृष्टि को भी विकसित करती रहीं।
उनके जीवन में उनके दादा जी का विशेष प्रभाव रहा। दादा जी का किसानों से जुड़ाव, खेती के प्रति उनका प्रेम और प्रकृति के प्रति सम्मान ने आकृति के मन में एक गहरी समझ पैदा की। यही समझ आगे चलकर उनके शोध का आधार बनी।
शोध का विषय और उसकी जरूरत
आकृति ने अपने शोध के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण विषय चुना। उन्होंने बायो फर्टिलाइजर के अधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया।
आज खेती में उत्पादन बढ़ाने के लिए तरह तरह के उर्वरकों का उपयोग हो रहा है। शुरुआत में यह लाभदायक लगता है, लेकिन लंबे समय में इसका असर मिट्टी की सेहत पर पड़ता है। आकृति ने इसी सच्चाई को समझने और समझाने का प्रयास किया।
उनका मानना है कि धरती केवल जमीन नहीं है, बल्कि एक जीवित प्रणाली है जिसे संतुलन की जरूरत होती है। जब हम इस संतुलन को बिगाड़ते हैं, तब उसका असर धीरे धीरे सामने आता है। यही सोच उन्हें लगातार इस विषय की ओर खींचती रही।
उन्होंने बनारस के प्रतिष्ठित यूपी ऑटोनोमस कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग में डॉ विवेक सिंह के मार्गदर्शन में अपना शोध कार्य पूरा किया। यह सफर मेहनत, धैर्य और निरंतर प्रयास से भरा हुआ था।
आकृति का शोध केवल किताबों और प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने तराई क्षेत्र में अरहर और धान के खेतों में काम किया। किसानों के साथ समय बिताकर उन्होंने खेती को बहुत करीब से समझा।
खेतों में काम करते हुए उन्होंने देखा कि किसान कितनी मेहनत करते हैं और कितनी चुनौतियों का सामना करते हैं। यह अनुभव उनके लिए केवल अध्ययन नहीं, बल्कि एक गहरी सीख बना।
इसी कारण उनकी रचनाओं में प्रकृति का दर्द और किसान की पीड़ा साफ दिखाई देती है। वह केवल आंकड़ों की बात नहीं करतीं, बल्कि उस अनुभव को भी शब्द देती हैं जो उन्होंने खुद महसूस किया है।
एक शोधार्थी के रूप में आकृति ने देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में अपने शोध का प्रस्तुतिकरण किया। उन्होंने अनेक शोध पत्र प्रकाशित किए और उनके कुछ शोध कार्य अभी प्रकाशन की प्रक्रिया में हैं। उनकी लगन और मेहनत के लिए उन्हें एक्सिलेंस अवार्ड सहित कई सम्मान प्राप्त हुए। यह सम्मान उनके कार्य की गुणवत्ता और उनके समर्पण का प्रमाण है।
आकृति ने गोरखपुर महोत्सव के विज्ञान मेले में समन्वयक समूह सदस्य के रूप में भी योगदान दिया। इसके अलावा उन्होंने आमंत्रित व्याख्याता के रूप में कई स्थानों पर व्याख्यान भी दिए।
साहित्य की कोमल धारा
आकृति केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील लेखिका और कवयित्री भी हैं। उनकी तीन साहित्यिक पुस्तकें लोकगीत सी लड़की, सुनो बसन्ती और ललमुनिया पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं।
इन रचनाओं में उनकी भाषा सरल और भावपूर्ण है। वह प्रकृति, समाज और स्त्री जीवन के अनुभवों को बहुत सहज ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। उन्हें साहित्य में मानद डॉक्टरेट और नेचुरल थेरेपी में भी डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई है।
आकृति का जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। वह अपने गांव और समाज से लगातार जुड़ी रही हैं। समय समय पर वह गांव के बच्चों का मार्गदर्शन करती हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।
उनके गांव में उनके पीएचडी पूरा करने पर खुशी का माहौल है। गांव की पहली लड़की द्वारा यह उपलब्धि हासिल करना सभी के लिए गर्व की बात है। ग्राम प्रधान ने इसे प्रेरणादायक बताया और कहा कि यह अन्य बच्चों के लिए एक उदाहरण है। उनके शिक्षकों श्री कृष्ण मुरारी यादव और आलोक शुक्ला ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
आकृति की इस उपलब्धि पर कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने उन्हें बधाई दी। गोरखपुर विश्वविद्यालय की कुलपति पूनम टण्डन, सांसद रवि किशन, वैज्ञानिक महादेव पाण्डेय, प्रोफेसर गोविंद मिश्रा, अनिल कुमार द्विवेदी, पद्मश्री रामचेत चौधरी, वागीश शुक्ल, उदय प्रकाश सहित अनेक शिक्षाविदों और साहित्यकारों ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। यह समर्थन यह दिखाता है कि आकृति का कार्य समाज के लिए महत्वपूर्ण है और उनके प्रयासों को व्यापक स्तर पर सराहा जा रहा है।
परिवार का सहयोग
आकृति की सफलता में उनके परिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके नाना डॉ जनार्दन तिवारी ने इसे परिवार के लिए नई शुरुआत बताया। उनके दादा जी बालेश्वर नाथ दूबे ने कहा कि अब उनका जीवन समाज के लिए समर्पित होना चाहिए। उनके माता पिता श्री बशिष्ठ मुनि दूबे और माता अंजलि प्रभा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि यह केवल पहला कदम है और आगे उन्हें और भी बड़ी जिम्मेदारियां निभानी हैं।
मीडिया से बातचीत में आकृति ने कहा कि पीएचडी हमें केवल ज्ञान नहीं देती, बल्कि धैर्य और जिम्मेदारी भी सिखाती है। उन्होंने अपने शोध को अपनी स्वर्गीय दादी श्रीमती शांति देवी को समर्पित किया और इसका श्रेय देश के किसानों को दिया। यह उनकी विनम्रता और संवेदनशीलता को दर्शाता है।
डॉ आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ की यात्रा यह सिखाती है कि अगर मन में लगन और सोच में स्पष्टता हो, तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं होता। उन्होंने विज्ञान और साहित्य दोनों क्षेत्रों में संतुलन बनाकर यह दिखाया है कि संवेदनशीलता और ज्ञान साथ साथ चल सकते हैं। उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों को सच करना चाहता है। खासकर उन लड़कियों के लिए, जो छोटे गांवों से निकलकर बड़े लक्ष्य हासिल करना चाहती हैं।
आकृति ने यह साबित किया है कि सच्ची सफलता वही है जो समाज को कुछ लौटाती है। उनकी यह यात्रा आगे भी कई लोगों को प्रेरित करती रहेगी और एक नई दिशा दिखाती रहेगी। यह केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। एक ऐसा सफर जो आने वाले समय में और भी उजाला फैलाएगा।
