ख़्वाब, ख़बर और ख़ामोशियां : नौकरी, नैतिकता और न्यूज़रूम के बीच हिंदी पत्रकारिता के 200 साल

ख़्वाब, ख़बर और ख़ामोशियां : नौकरी, नैतिकता और न्यूज़रूम के बीच हिंदी पत्रकारिता के 200 साल

विजय विनीत

हिंदी पत्रकारिता ने दो सौ बरस पूरे कर लिए हैं। यह सिर्फ एक तारीख़ नहीं, बल्कि उन लाखों शब्दों की यात्रा है जो कभी सत्ता के सामने सवाल बनकर खड़े हुए, कभी जनता की आवाज़ बने और कभी इतिहास के हाशिये पर छूटे लोगों का दर्द अपने कंधों पर उठाकर चले।

30 मई को चंदौली प्रेस क्लब के एक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। मंच पर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा और बीएचयू के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी अनूप जैसे विद्वान मौजूद थे। चर्चा का विषय था-लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका, सत्ता से सवाल पूछने की परंपरा और पत्रकारिता से गायब होता विपक्ष का स्वर। मुझे बार-बार लग रहा था कि हम केवल पत्रकारिता के दो सौ साल का जश्न नहीं मना रहे, बल्कि उसकी आत्मा की तलाश भी कर रहे हैं।

खबरें पहले भी लिखी जाती थीं, आज भी लिखी जा रही हैं। अखबार पहले भी छपते थे, आज भी छप रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कभी शब्दों में प्रतिरोध की आग हुआ करती थी, आज उनमें प्रबंधन की सावधानियां अधिक दिखाई देती हैं। कभी पत्रकारिता जनता की चौपाल थी, अब कई बार वह कॉरपोरेट बोर्डरूम की प्रतिध्वनि लगने लगती है।

चर्चा के दौरान मुझे बनारस याद आता रहा। वह बनारस, जो हर साल पत्रकारिता की नई फसल तैयार करता है। आंखों में चमक लिए हुए लड़के-लड़कियां, जेब में डिग्री, दिल में उम्मीद और दिमाग में दुनिया बदल देने का सपना। उन्हें लगता है कि पत्रकारिता सच की मशाल है और वे उस मशाल के नए रखवाले हैं।

विश्वविद्यालय की चौखट पार करते ही उनका सामना उस यथार्थ से होता है, जिसका जिक्र किसी पाठ्यक्रम में नहीं मिलता। वहां नौकरी के लिए लंबी कतारें हैं, अवसरों के लिए धक्का-मुक्की है और समझौतों की एक ऐसी दुनिया है जहां आदर्श अक्सर सबसे पहले कुर्बान होते हैं।

धीरे-धीरे उनके ख्वाबों का रंग फीका पड़ने लगता है। उन्हें मालूम पड़ता है कि पत्रकारिता में जो दिखाई देता है, वह पूरा सच नहीं होता। अभिव्यक्ति की आजादी का दरवाजा खुला जरूर रहता है, लेकिन उसकी चाबी अक्सर किसी और की जेब में होती है।

सबसे बड़ा सवाल तब पैदा होता है-पत्रकार अपनी नौकरी बचाए या अपनी नैतिकता?

यह प्रश्न सुनने में जितना सीधा लगता है, भीतर से उतना ही निर्दयी है, क्योंकि नौकरी रोटी देती है और नैतिकता आत्मसम्मान। रोटी के बिना जीवन कठिन है, लेकिन आत्मसम्मान के बिना जीवन बोझ बन जाता है।

जब मैं रिपोर्टर था, तब लगता था कि सारी ताकत संपादक के हाथ में है। वही खबरों का भाग्य-विधाता है, लेकिन समय ने सिखाया कि संपादक भी इस व्यवस्था का एक थका हुआ किरदार है। उसकी कुर्सी ऊंची जरूर होती है, लेकिन उसके सिर पर बाजार, विज्ञापन, प्रबंधन और राजनीतिक दबावों की कई परतें रखी होती हैं। वह निर्णय लेता हुआ दिखाई देता है, जबकि कई बार निर्णय कहीं और लिए जा चुके होते हैं।

आज पत्रकार पर दबावों का पहाड़ है। सत्ता का भय, प्रबंधन की अपेक्षाएं, सोशल मीडिया की भीड़, वैचारिक खेमेबंदी और असुरक्षित रोजगार-इन सबके बीच उसकी कलम सांस लेती है। ऐसे में सच लिखना केवल पेशेवर जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साहस का काम हो जाता है।

दुनिया भर में पत्रकार मारे जा रहे हैं। जेलों में डाले जा रहे हैं। ट्रोल किए जा रहे हैं। अक्सर निशाने पर वही लोग होते हैं जो अपनी कलम को गिरवी रखने से इंकार करते हैं। जो सत्ता की आरती नहीं उतारते, बल्कि उसके सामने आईना रखते हैं।

शायद पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट आज बाजार नहीं है, बल्कि वह खामोशी है जो धीरे-धीरे न्यूज़रूम में उतर आई है। वह खामोशी जो सवाल पूछने से पहले डरती है। वह खामोशी जो सच जानते हुए भी कई बार उसे लिख नहीं पाती।

दो सौ साल पूरे होने पर हिंदी पत्रकारिता को अपनी उपलब्धियों पर गर्व करने का पूरा हक है। लेकिन यह अवसर आत्ममंथन का भी है। हमें यह पूछना होगा कि क्या हम अभी भी जनता की आवाज़ हैं या केवल सूचना उद्योग का एक हिस्सा बनकर रह गए हैं?

आखिर पत्रकारिता का भविष्य इमारतों, स्टूडियो और तकनीक में नहीं बसता। वह उन युवाओं की आंखों में बसता है, जो आज भी यह विश्वास लेकर पत्रकारिता में आते हैं कि सच लिखना दुनिया का सबसे जरूरी काम है। जरूरत इस बात की है कि हम उनके ख्वाब बचा लें, क्योंकि जिस दिन पत्रकारों के ख्वाब मर जाएंगे, उसी दिन खबरें तो बची रहेंगी, लेकिन पत्रकारिता नहीं…!

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)

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