दालमंडी : तरक्की के शोर में दफ़्न होती बनारस की रूह और ख़ंडहर हो रही सुरों की आख़िरी विरासत…!

विजय विनीत
उत्तर प्रदेश के वाराणसी की दालमंडी आज अपने वजूद की आख़िरी दहलीज़ पर खड़ी है। वही दालमंडी, जिसकी गलियों से जब ठुमरी उठती थी तो पूरा बनारस ठहर जाता था। जिन बालकनियों से कभी गौहर जान, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी और विद्याधरी देवी जैसी फ़नकाराओं की आवाज़ें उतरती थीं, आज उन्हीं गलियों में सुर नहीं, बुलडोज़रों की कर्कश आवाज़ गूंज रही है। जिस गली ने इस शहर को दुनिया भर में पहचान दी, तरक़्क़ी के शोर में आज उसी की रूह दफ़्न होती जा रही है। ऐसा लगता है जैसे बनारस अपनी आख़िरी सांस्कृतिक विरासत को अपनी ही आंखों के सामने खो रहा हो।
दालमंडी में अब कोई ठुमरी नहीं गूंजती। न कजरी की भीगी हुई तान सुनाई देती है, न दादरा की नरम कसक, न किसी महफ़िल की धीमी सरगोशियां। यहां अगर कुछ बचा है तो टूटती हुई दीवारों का दर्द, उजड़ती दुकानों की चीख और अपने आशियाने बचाने की जद्दोजहद करते लोग। सुबह होते ही गलियों में मशीनों की आवाज़ उतर आती है। कहीं हथौड़े चल रहे हैं, कहीं दीवारों पर लाल निशान बने हैं, कहीं लोग अपने पुश्तैनी मकानों के बाहर खड़े बस इतना पूछ रहे हैं, “क्या यही विकास है?”
मलबे में दफ्न होती महफ़िलों विरासत
सरकार ने दालमंडी इलाके में सड़क चौड़ीकरण की योजना को मंज़ूरी दी है। इसी योजना के तहत सदियों पुराने मकान, दुकानें और कई ऐतिहासिक ढांचे तोड़े जा रहे हैं। प्रशासन इसे शहर के विकास का नाम दे रहा है, लेकिन दालमंडी के लोग इसे अपनी तहज़ीब के जनाज़े की तरह देख रहे हैं। यहां रहने वाले कई परिवारों की आंखों में सिर्फ़ धूल नहीं, एक गहरा ख़ौफ़ भी दिखाई देता है-कहीं यह शहर अपनी पहचान ही न खो दे।

दालमंडी सिर्फ़ ईंट, चूने और पत्थरों का इलाक़ा नहीं है। यह बनारस की वह जीवित विरासत है, जहां कभी ठुमरी में शहर की रूह सांस लेती थी। जहां रातें सिर्फ़ रातें नहीं होती थीं, बल्कि सुरों, अदब, रियाज़ और एहसास की महफ़िलें सजा करती थीं। जहां हर गली का अपना एक राग था, हर कोठे की अपनी एक तान, हर खिड़की से उतरती आवाज़ में गंगा की नमी और बनारस की मिट्टी की महक घुली रहती थी।
गौहर जान से लेकर विद्याधरी देवी तक, रसूलन बाई से सिद्धेश्वरी देवी तक-ये सिर्फ़ नाम नहीं हैं। ये उस भूले हुए इतिहास की आवाज़ें हैं, जिनमें बनारस की सदियों पुरानी तहज़ीब सांस लेती है। कभी इन्हीं गलियों से जब ठुमरी उठती थी तो समूचा शहर ठहर जाता था। कहीं कजरी की उदास मिठास थी, कहीं चैती की पुकार, कहीं दादरा की नरम टीस। उन बालकनियों पर सिर्फ़ औरतें नहीं बैठती थीं, वहां पूरा एक सांस्कृतिक दौर ज़िंदा रहता था।
विडंबना देखिए, जिन्होंने इस शहर को सुर दिए, जिन्होंने बनारस को दुनिया भर में पहचान दिलाई, वही अपने हिस्से में तिरस्कार और तन्हाई लेकर जीती रहीं। समाज ने उनकी कला को तो सिर आंखों पर बिठाया, लेकिन उन्हें कभी सम्मान से नहीं देखा। उनकी आवाज़ें महफ़िलों में सराही जाती रहीं, लेकिन उनकी ज़िंदगी हमेशा हाशिए पर धकेली जाती रही। उन्होंने अपने टूटे हुए दिलों, अधूरी मोहब्बतों और तन्हा रातों को सुरों में ढालकर इस शहर की रूह को ज़िंदा रखा।
आज उन्हीं दालानों और उन्हीं खिड़कियों पर विकास के हथौड़े चल रहे हैं। गलियां चौड़ी हो रही हैं, लेकिन शहर की स्मृतियां सिकुड़ती जा रही हैं। जिन झरोखों से कभी रातभर ठुमरियां बहा करती थीं, वहां अब सन्नाटा जमा हुआ है। ऐसा लगता है मानो कोई धीरे-धीरे बनारस की याददाश्त मिटा रहा हो।
एक वक़्त था जब दालमंडी में कदम रखते ही हवा का मिज़ाज बदल जाता था। कहीं चैता-ठुमरी की मीठी टीस दिल में उतरती थी, कहीं कजरी की भीगी हुई तान कानों में घुल जाती थी। किसी कोठे से सारंगी की आवाज़ उठती थी तो कहीं तबले की थाप रात के सन्नाटे को चीरती हुई गंगा किनारे तक चली जाती थी। घुंघरुओं की झनकार, पान की महक, इत्र की ख़ुशबू और उर्दू अदब की नरम ज़बान मिलकर ऐसा समां बांधती थीं कि पूरा इलाक़ा किसी जीवित सांस्कृतिक दरबार में तब्दील हो जाता था।
तहज़ीब की आख़िरी पाठशाला
दालमंडी की तवायफ़ें सिर्फ़ नाचने-गाने वाली औरतें नहीं थीं। वे इस शहर की सांस्कृतिक संरक्षक थीं। उनके यहां सिर्फ़ संगीत नहीं सीखा जाता था, बल्कि बैठने का सलीका, बात करने की तहज़ीब, शेरो-शायरी की समझ और इंसानी रिश्तों की नफ़ासत भी सिखाई जाती थी। नवाबों और रईसों के बेटों को वहां अदब सीखने भेजा जाता था। वह जगह सिर्फ़ मनोरंजन का अड्डा नहीं थी, बल्कि कला, भाषा और संस्कृति की एक जीवित पाठशाला थी।
दालमंडी में कहीं ठुमरी उठती थी, कहीं दादरा की मीठी टीस बहती थी, कहीं कजरी की उदासी गंगा के पानी में उतर आती थी। हज़ारों लोग उन आवाज़ों को सुनने के लिए घाटों पर उमड़ पड़ते थे। लोग सिर्फ़ संगीत सुनने नहीं आते थे, बल्कि उस रूहानी एहसास का हिस्सा बनने आते थे, जो बनारस को बना-रस बनाता था। वह सिर्फ़ एक आयोजन नहीं था, बल्कि इस शहर की सामूहिक आत्मा का उत्सव हुआ करता था। गंगा बहती रहती थी, दीप कांपते रहते थे और दालमंडी की आवाज़ें रात के सीने पर हौले-हौले उतरती रहती थीं।

जिन्होंने बनारस को पहचान दी
हुस्नाबाई, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, गौहर जान-ये सिर्फ़ नाम नहीं हैं। ये उस तहज़ीब के आख़िरी उजाले हैं, जिसने बनारस को दुनिया भर में पहचान दी। इन आवाज़ों में सिर्फ़ संगीत नहीं था, बल्कि एक पूरा दौर सांस लेता था। उनमें गंगा की नमी थी, बनारस की मिट्टी की ख़ुशबू थी और उन औरतों का दर्द भी था जिन्हें समाज ने कभी पूरी इज़्ज़त से स्वीकार नहीं किया।
हुस्नाबाई और भारतेंदु हरिश्चंद्र एक-दूसरे को ख़त लिखा करते थे। यह रिश्ता सिर्फ़ मोहब्बत का नहीं था, बल्कि कला और एहसास की साझेदारी का रिश्ता था। वहीं गौहर जान की आवाज़ बनारस की गलियों से निकलकर यूरोप तक गूंजी। जब भारत में पहली बार किसी गायिका की आवाज़ ग्रामोफोन डिस्क पर रिकॉर्ड हुई, तो वह गौहर जान थीं। उनकी आवाज़ के साथ इतिहास में दर्ज हुआ, “माय नेम इज़ गौहर जान…।”
रसूलन बाई के गीत रेडियो पर बजते थे। उनकी आवाज़ पूरे मुल्क में पहचानी जाती थी। विडंबना देखिए, वही महान कलाकार एक वक़्त रेडियो स्टेशन के बाहर फुटपाथ पर रहने को मजबूर थीं। यह सिर्फ़ एक कलाकार की त्रासदी नहीं थी, बल्कि उस समाज की बेरुख़ी की कहानी थी, जो कला से मोहब्बत तो करता है, लेकिन कलाकारों को तन्हा छोड़ देता है।
दालमंडी की तवायफ़ें शायद इस शहर की पहली ऐसी औरतें थीं, जिन्होंने अपने होने को किसी की दया का मोहताज नहीं बनने दिया। उनके भीतर एक ऐसी आज़ादी थी, जो उस दौर की तथाकथित शरीफ़ दुनिया में भी कम दिखाई देती थी। उन्होंने सिर्फ़ गाना नहीं सीखा था, बल्कि अपने वजूद को पूरी गरिमा के साथ जीना सीखा था। वे शेरो-शायरी समझती थीं, राजनीति पर बात करती थीं, दर्शन और अध्यात्म की महफ़िलों में शरीक होती थीं। उनकी महफ़िलों में सिर्फ़ राग नहीं गूंजते थे, बल्कि विचार भी जन्म लेते थे।
दालमंडी को समझने के लिए सिर्फ़ इतिहास पढ़ना काफ़ी नहीं है, उसके लिए दिल चाहिए। यह जगह सिर्फ़ जिस्म का बाज़ार नहीं थी, बल्कि टूटे हुए वक़्त में कला, मोहब्बत, पीड़ा और तहज़ीब को बचाए रखने की आख़िरी पनाहगाह थी। यहां संगीत सिर्फ़ गाया नहीं जाता था, जिया जाता था। यहां शब्द सिर्फ़ बोले नहीं जाते थे, महसूस किए जाते थे।
अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ ख़ामोश बग़ावत

दालमंडी की कहानी सिर्फ़ संगीत और रक़्स की कहानी नहीं है। यह उन औरतों की कहानी भी है जिन्होंने अपने दौर से समझौता नहीं किया। जिन्होंने समाज की परवाह कम और अपने फ़न, अपने वजूद और अपने मुल्क की ज़्यादा परवाह की।
महात्मा गांधी भी शायद इस सच को समझते थे। उन्होंने तवायफ़ों को समाज का दुश्मन नहीं माना। वे उन्हें परिस्थितियों का शिकार समझते थे। इसलिए उन्होंने उन्हें मिटाने की नहीं, आत्मसम्मान और आत्मसुधार के साथ खड़े होने की राह दिखाई।
गांधी जी की प्रेरणा से बनारस में “तवायफ़ सभा” बनी। हुस्नाबाई उसकी अध्यक्ष चुनी गईं और विद्याधरी बाई ने इस सभा को संगठित करने में बड़ी भूमिका निभाई। यह सिर्फ़ सामाजिक सुधार की घटना नहीं थी, बल्कि उन स्त्रियों के जागरण की कहानी थी जिन्हें समाज ने हमेशा किनारे पर धकेलकर रखा। विद्याधरी बाई ने अपने संस्मरणों में लिखा था कि गांधी जी ने उनसे कहा था, “जहां भी महफ़िल हो, वहां राष्ट्रीय गीत गाइए।” और उन्होंने वही किया।
कोतवालों और पुलिस की निगाहों के बावजूद वे हर महफ़िल में देशभक्ति के गीत गाती रहीं। सोचिए कैसी विडंबना थी-जिन औरतों को समाज अक्सर हेय दृष्टि से देखता था, वही औरतें अपनी आवाज़ से लोगों के भीतर आज़ादी का जज़्बा जगा रही थीं। दालमंडी की महफ़िलों में तब सिर्फ़ इश्क़ और विरह नहीं गूंजता था, वहां मुल्क की आज़ादी की धड़कन भी सुनाई देती थी।
महात्मा गांधी की अहिंसा को मानने वाली विद्याधरी देवी ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई में दालमंडी की तवायफ़ों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई। उसी दालमंडी में तवायफ़ संघ बना, जिसे समाज ने हमेशा हाशिए पर रखा, लेकिन जब मुल्क को ज़रूरत पड़ी तो वही औरतें आज़ादी की लड़ाई में भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी दिखाई दीं। इतिहास अक्सर इन बातों को बहुत धीमी आवाज़ में लिखता है, लेकिन बनारस की गलियां आज भी इन्हें याद रखे हुए हैं।
दालमंडी का इतिहास इसलिए भी अहम है क्योंकि उसने हमेशा समाज की बनाई हुई सरहदों को चुनौती दी। महात्मा गांधी के कहने पर यहां ‘तवायफ़ संघ” बना था। यह अपने आप में एक असाधारण घटना थी। जिन औरतों को समाज ने हमेशा हाशिए पर रखा, वही औरतें अपने दौर की सबसे जागरूक, संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध स्त्रियां थीं।
महात्मा गांधी जब स्वराज फंड के लिए मुल्कभर से मदद जुटा रहे थे, तब उनकी नज़र दालमंडी की उन औरतों पर भी गई, जिन्हें समाज ने हमेशा हाशिए पर रखा, मगर जिनके भीतर अपने मुल्क के लिए एक सच्ची बेचैनी थी। कहा जाता है कि जब गांधी जी ने सहयोग मांगा, तो दालमंडी की फ़नकाराओं ने मदद देने से इनकार नहीं किया, लेकिन एक शर्त रख दी-गांधी जी खुद महफ़िल में आएंगे।
यह घटना सिर्फ़ दिलचस्प नहीं है, बल्कि दालमंडी की औरतों की शख़्सियत को समझने की कुंजी है। वे किसी के सामने झुककर नहीं जीती थीं। उनके भीतर एक अजीब-सी खुद्दारी थी। समाज उन्हें चाहे जिस नज़र से देखता रहा हो, मगर वे अपने फ़न, अपने वजूद और अपनी शर्तों पर जीने का साहस रखती थीं।
दालमंडी की औरतों ने सिर्फ़ गाना नहीं गाया, उन्होंने अपने दौर से लड़ना भी सीखा था। यही वजह थी कि अंग्रेज़ी हुकूमत की निगाहें हमेशा उन पर टिकी रहती थीं। जद्दन बाई भी उन्हीं औरतों में थीं, जिन्होंने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक ख़ामोश मगर मज़बूत मोर्चा खोले रखा।
कहा जाता है कि उनके घर पर बार-बार छापे पड़ते थे। अंग्रेज़ी हुकूमत उन्हें शक़ की निगाह से देखती थी। दबाव इतना बड़ा कि आख़िरकार उन्हें दालमंडी की गलियां छोड़नी पड़ीं, लेकिन कुछ लोग सिर्फ़ जगह छोड़ते हैं, अपनी पहचान नहीं।
वो आवाज़ जिसे राजाओं ने सलाम किया

चौक से दालमंडी की तरफ़ बढ़ते हुए जो गलियां खुलती हैं, उनमें सिर्फ़ मकान नहीं हैं, वहां इतिहास सांस लेता है। इन्हीं गलियों में हुस्नाबाई रहती थीं। उनका जलवा ऐसा था कि काशी नरेश प्रभु नारायण सिंह के दरबार में उन्हें बाक़ायदा जगह मिली हुई थी। उन्हें राजगायिका का ओहदा दिया गया था। यह सिर्फ़ एक कलाकार का सम्मान नहीं था, बल्कि उस पूरी कला परंपरा का सम्मान था जिसे दालमंडी ने जन्म दिया।
हुस्नाबाई सिर्फ़ संगीत तक सीमित नहीं थीं। बनारस में साहित्य, अध्यात्म और दर्शन पर होने वाली महफ़िलों में वे बराबरी से बैठती थीं। उस दौर में जब औरतों की मौजूदगी को दीवारों के भीतर क़ैद कर दिया गया था, तब दालमंडी की एक तवायफ़ पुरुषों के बीच बैठकर विचारों पर बहस करती थी। यह सिर्फ़ साहस नहीं था, बल्कि अपने अस्तित्व को पूरी गरिमा के साथ जीने का ऐलान था। उन्होंने बनारस में कैंट पर एक कृष्णा धर्मशाला बनवाई, जो आज भी उनके होने की गवाही देती है। मगर अफ़सोस, इतिहास ने उनके नाम को उतनी जगह नहीं दी जितनी दी जानी चाहिए थी।
दालमंडी की गलियों से ही एक और आवाज़ उठी थी-गौहर जान की आवाज़। वह आवाज़ जिसने बनारस से निकलकर पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया। गौहर जान सिर्फ़ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि अपने दौर की सबसे आत्मनिर्भर और असरदार महिलाओं में थीं। उनकी ठुमरी, दादरा और ख़याल ने संगीत को नई बुलंदियां दीं। उनकी महफ़िलें सिर्फ़ महफ़िलें नहीं होती थीं, बल्कि एक पूरे दौर की शान हुआ करती थीं। कहते हैं कि वह सोने की गिन्नियां लिए बिना गाने के लिए हामी नहीं भरती थीं। यह उनके घमंड की निशानी नहीं थी, बल्कि अपनी कला की कीमत पहचानने का ऐलान था।
लोकगायिका मालिनी अवस्थी कहती हैं, “जब मैं मंच पर इसे गाती हूं, तो मानो हर सुर में गौहर की हूक होती है, हर ताल में असलम की मुस्कराहट। कचौड़ी गली की वीरानी, दालमण्डी की उजास, सब एक साथ सामने आ खड़े होते हैं। उस विरह, उस इंतज़ार और उस अधूरी मोहब्बत को गाए बिना इस गीत को गाना मेरे लिए संभव नहीं। आज जब मैं यह कजरी गाती हूं, तो मेरी आंखें बंद हो जाती हैं-मानो मैं खुद उस पल की साक्षी हूं। चौक पर खड़ा असलम, पालकी में लिपटी गौहर जान, और कचौड़ी गली का वह वीरान कोना, जहां अब भी वह इंतज़ार गूंजता है।”
मालिनी बताती हैं, “गौहर जान स्वयं एक क्रांतिकारी महिला थीं। देश को आज़ाद कराने के लिए उन्होंने भारी-भरकम चंदा जुटाया और अंग्रेजी हुकूमत से मुकाबले के लिए महात्मा गांधी को दे दिया। गौहर जान-वह कोई नाम नहीं, बल्कि एक आवाज़ थीं। कोई साधारण तवायफ नहीं थीं वह; वह सुरों की देवी थीं, जिनकी ठुमरी और कजरी सुनकर लोग वक्त को भूल जाया करते थे। कहते हैं, जब वह गाती थीं, तो राग में उनकी आत्मा उतर आती थी। उनकी एक कजरी आज भी बनारस की फिज़ाओं में तैरती है।”
लोकगायिका मालिनी अवस्थी अपनी पुस्तक ‘चंदन किवाड़’ में लिखती हैं, “उस दौर की बात और थी। आजकल वैसी आशिकी कौन करता है? इश्क तो उस दौर में हुआ करता था। नर्म दिल बस किसी का हो जाना चाहता था और इस हो जाने में ही दुनिया की तमाम खुशियां न्योछावर थीं। कभी किसी का ज़िक्र सुनकर इश्क हो गया, तो कभी किसी की शायरी से और कभी किसी की आवाज़ सुनकर इश्क हो गया। इस इश्क में मुलाकात कोई शर्त नहीं थी। इसमें कुछ पाने की हसरत नहीं, सिर्फ सच्ची आशिकी में खाक हो जाने की तड़प होती थी। दीदार होना तो फिर भी बड़ी बात थी-उस दौर में आंखें मिल जाना ही प्यार था। आशिक का इंतज़ार, दीदार और फिर दीदार का इंतज़ार। इसी में न जाने कितनी ठुमरियों की बंदिशें रच दी गईं। दालमंडी में सुर, साज और आत्मा का संगीत सब यादें बनकर रह गया है।…।”

खामोश हो रही नरगिस की दालमंडी
जद्दन बाई की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्हें सिर्फ़ नरगिस की मां या संजय दत्त की नानी कह देना, उनके पूरे व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफ़ी होगी। वे अपने दौर की बड़ी फ़नकार थीं। उनके रिकॉर्ड्स ग्रामोफोन कंपनियों से निकलते थे। रेडियो पर उनकी आवाज़ गूंजती थी। संगीत के जानकार उनका नाम बड़े अदब से लेते थे। उनकी कहानी सिर्फ़ संगीत तक सीमित नहीं थी। वह उस औरत की कहानी थी, जिसने अपने समय की बंदिशों को तोड़कर अपने लिए रास्ता बनाया।
दालमंडी की औरतों ने हमेशा अपने हिस्से की तकलीफ़ को कला में बदल दिया। समाज ने उन्हें नाम दिए, ताने दिए, मगर उन्होंने उसी समाज को संगीत, तहज़ीब और संस्कृति लौटाई। उन्होंने अपने आंसुओं को सुर बना दिया, अपनी तन्हाई को ठुमरी और अपने दर्द को दादरा…।
आज जब दालमंडी की गलियों से वह पुरानी गूंज धीरे-धीरे ख़ामोश हो रही है, तब यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है, क्या हम सिर्फ़ इमारतें बचाना चाहते हैं या अपनी सांस्कृतिक स्मृतियां भी? दालमंडी सिर्फ़ एक जगह नहीं है। वह बनारस की वह धड़कन है, जिसे अगर भुला दिया गया, तो शायद इस शहर की रूह का एक हिस्सा हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाएगा।
जद्दन बाई ने भी यही किया। दालमंडी से निकलकर उन्होंने मुंबई में अपने लिए एक नई दुनिया खड़ी की। वह सिर्फ़ गायिका बनकर नहीं रहीं, बल्कि संगीतकार, अभिनेत्री, लेखिका और फ़िल्म निर्माता के रूप में अपने समय की सबसे मज़बूत और आत्मनिर्भर महिलाओं में शुमार हुईं।
भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री की पहली महिला संगीत निर्देशक होने का सम्मान भी उन्हें ही मिला। उन्होंने “संगीत मूवीटोन” जैसी प्रोडक्शन कंपनी खड़ी की। यह वह दौर था जब औरतों को सिर्फ़ पर्दे के पीछे रहने की इजाज़त थी, मगर जद्दन बाई ने पर्दे के आगे और पीछे दोनों जगह अपना नाम दर्ज कराया।
उन्होंने फ़िल्में बनाईं, उनकी कहानी लिखी, संगीत तैयार किया, संवाद लिखे और अभिनय भी किया। उनकी कहानी सिर्फ़ एक कलाकार की कहानी नहीं लगती, बल्कि उस औरत की कहानी लगती है, जिसने हर बंद दरवाज़े पर अपनी दस्तक छोड़ी। उन्हीं की बेटी आगे चलकर नरगिस बनीं-हिंदी सिनेमा का एक बड़ा नाम। यह सिर्फ़ एक मां की परवरिश नहीं थी, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता थी, जो दालमंडी की गलियों से निकलकर मुंबई के स्टूडियो तक पहुंची थी।

दालमंडी की रूह ने नया घर तलाशा
फिर कहानी लौटती है कबीर चौरा की तरफ़। जहां दालमंडी की पुरानी रूह धीरे-धीरे एक नए वक़्त में सांस लेने की कोशिश कर रही थी। सिद्धेश्वरी देवी ने दालमंडी छोड़कर कबीरचौरा में घर बनाया। वजह सिर्फ़ जगह बदलना नहीं था। वह अपनी बेटियों को एक अलग भविष्य देना चाहती थीं। शायद वह समझ चुकी थीं कि समाज कला का सम्मान तो करता है, लेकिन कलाकार औरत का नहीं।
सिद्धेश्वरी देवी की पूरी ज़िंदगी संगीत में डूबी हुई थी। उनके खानदान में कई पीढ़ियों से संगीत बहता चला आ रहा था। रतिबाई, मैनाबाई, राजेश्वरी देवी-ये सिर्फ़ नाम नहीं थे, बल्कि बनारस की संगीत परंपरा की वे आवाज़ें थीं, जिन्होंने ठुमरी, दादरा और ख़याल को नई बुलंदियां दीं।
राजेश्वरी देवी ने सिद्धेश्वरी देवी को सिर्फ़ पाला नहीं, बल्कि उन्हें उस विरासत से भी जोड़ा जिसमें सुर इबादत की तरह होते थे। जब सिद्धेश्वरी देवी अपने उस्ताद सुमेरू जी को याद करती थीं, तो उनकी आवाज़ में वही अकीदत सुनाई देती थी, जो किसी सच्चे शागिर्द के भीतर अपने गुरु के लिए होती है। बाद में उन्होंने कई बड़े उस्तादों से संगीत सीखा, मगर उनकी जड़ें हमेशा बनारस की मिट्टी में ही रहीं।
वे कहा करती थीं कि हिंदुस्तान की शायद ही कोई रियासत रही हो जहां उन्होंने महफ़िल न सजाई हो। इसके बावजूद उनके भीतर बनारस कभी नहीं छूटा। वह मानती थीं कि बनारस की ठुमरी में जो लोच है, जो मिठास है, जो टूटे हुए दिल की कसक है-वह कहीं और नहीं मिलती। बनारस में सुर सिर्फ़ सीखे नहीं जाते… जिए जाते हैं।

विद्याधरी की गीतों पर उतरती थी गंगा
विद्याधरी देवी का नाम आते ही पूरा संगीत संसार जैसे एक पल के लिए ठहर जाता है। “गीत गोविंद” गाते हुए उनकी आवाज़ लोगों को भीतर तक भिगो देती थी। उनकी महफ़िलों में इतनी भीड़ उमड़ती थी कि लोगों को घंटों खड़े होकर सुनना पड़ता था। जब बनारस की होरी, चैती और ठुमरी उनकी आवाज़ में उतरती थी, तो लगता था जैसे ख़ुद गंगा गा रही हो।
उनकी गायकी में सिर्फ़ सुर नहीं थे, बल्कि विरह था, भक्ति थी, प्रेम था और वह अनकहा दर्द भी था जिसे बनारस सदियों से अपने भीतर छुपाए हुए है। उनकी आवाज़ में ऐसी लोच थी कि सुनने वाला सिर्फ़ सुनता नहीं था, उसमें डूबता चला जाता था। महफ़िल ख़त्म हो जाती थी, लेकिन उनकी तान देर तक लोगों के भीतर गूंजती रहती थी।
रसूलन बाई, बड़ी मोतीबाई, टामी बाई, काशीबाई-ये सारे नाम आज धीरे-धीरे इतिहास की धूल में दबते जा रहे हैं। कभी यही नाम बनारस की पहचान हुआ करते थे। उनकी आवाज़ें सिर्फ़ कोठों और महफ़िलों तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने पूरे हिंदुस्तानी संगीत को आकार दिया। ठुमरी, दादरा, चैती और कजरी को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया गया, उसमें दालमंडी की इन औरतों का सबसे बड़ा हाथ था।
दालमंडी को मिला सिर्फ तिरस्कार
दालमंडी की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि उसने इस मुल्क को इतना कुछ दिया, लेकिन बदले में उसे सिर्फ़ तिरस्कार मिला। जिन औरतों ने संगीत बचाया, तहज़ीब बचाई, भाषा और संस्कृति को जीवित रखा-समाज ने उन्हें हमेशा एक संकुचित नज़र से देखा।
उनकी महफ़िलों में बैठे लोग उनकी आवाज़ पर फ़िदा होते थे, उनकी शायरी पर वाह-वाह करते थे, मगर वही समाज दिन के उजाले में उन्हें इज़्ज़त देने से कतराता था। यह बनारस की सबसे गहरी विडंबनाओं में से एक है कि जिसने इस शहर को उसकी सबसे खूबसूरत पहचान दी, उसी को सबसे ज़्यादा ग़लत समझा गया।
आज जब दालमंडी की गलियों में पुरानी ठुमरियों की आवाज़ें बहुत धीमी हो चुकी हैं, तब लगता है कि यह सिर्फ़ एक मोहल्ले का ख़ामोश होना नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति का धीरे-धीरे बुझना है। दालमंडी सिर्फ़ एक जगह नहीं थी-वह बनारस का धड़कता हुआ दिल थी, जहां दर्द भी सुर में ढल जाता था।

शोहरत से तन्हाई तक का सफ़र
दालमंडी की दुनिया जितनी रौशन दिखाई देती थी, उसके भीतर उतना ही गहरा अंधेरा भी छिपा था। जिन आवाज़ों पर कभी महफ़िलें ठहर जाया करती थीं, वही आवाज़ें उम्र ढलने के साथ धीरे-धीरे अकेली पड़ती चली गईं। बड़ी मोतीबाई की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
कहा जाता है कि उनकी ठुमरी सुनने के लिए बड़े-बड़े रईस इंतज़ार किया करते थे। हर कोई उनकी महफ़िल तक पहुंच नहीं सकता था। दरवाज़ों पर पहरेदार बैठे रहते थे। उनकी गायकी का जलवा ऐसा था कि लोग उन्हें तौलकर पैसे देते थे। उनकी एक झलक पाने के लिए लोग बेचैन रहते थे। यही बनारस था, जहां शोहरत और तन्हाई के बीच सिर्फ़ थोड़ा-सा फ़ासला हुआ करता था।
वक़्त बदला, महफ़िलें कम होती गईं और वही मोतीबाई मुफ़लिसी में घिर गईं। आख़िरकार गुज़र-बसर के लिए उन्हें सरकारी पेंशन का सहारा लेना पड़ा। यह सिर्फ़ एक कलाकार की बदक़िस्मती नहीं थी, बल्कि उस समाज की बेरुख़ी थी, जिसने अपने सबसे बड़े फ़नकारों को भुला दिया।
मोतीबाई के परिवार की कहानी भी बनारस की सांस्कृतिक यात्रा का अहम हिस्सा है। उनके पुरखे गोरखपुर से बनारस आए और कबीरचौरा में बस गए। वहीं से संगीत की वह परंपरा शुरू हुई, जिसने आगे चलकर कई बड़े नाम पैदा किए। राजेश्वरी बाई का नाम उन दिनों बड़े सम्मान से लिया जाता था। कहा जाता है कि जब उन्हें बाबा कीनाराम के स्थल पर ले जाया गया, तो वहां के गुरु ने उन्हें देखते ही कहा, “अरे, यह तो रानी है।”
यह सिर्फ़ एक वाक्य नहीं था, बल्कि उस दौर में कला और कलाकार के प्रति सम्मान का प्रमाण था। बाद में राजेश्वरी बाई दरभंगा पहुंचीं और वहां भी अपने सुरों से लोगों को मोह लिया। फिर पूरा परिवार वहीं बस गया। मगर बनारस का रिश्ता कभी टूटा नहीं। मोतीबाई जब छोटी थीं, तब परिवार फिर बनारस लौट आया और यहीं उन्होंने संगीत की तालीम हासिल की। बाद में उनका नाम इतना बड़ा हो गया कि उनकी महफ़िलें बनारस की शान बन गईं। उस दौर में बनारस के व्यापारी, महाजन और रईस लोग ख़ास मौकों पर महफ़िलें सजवाते थे। यह सिर्फ़ मनोरंजन नहीं था, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा का हिस्सा था।
एक तवायफ़, जो अदब की मिसाल थी
भारतेंदु हरिश्चंद्र जैसे लोग भी इन महफ़िलों के बड़े कद्रदान थे। कहा जाता है कि उनका दालमंडी की हुस्नाबाई से पत्र व्यवहार था। हुस्नाबाई सिर्फ़ अच्छी गायिका ही नहीं थीं, बल्कि बेहद पढ़ी-लिखी और ख़ूबसूरत लिखावट वाली महिला भी थीं। यह बात बार-बार याद दिलाती है कि दालमंडी की तवायफ़ों को सिर्फ़ उनके पेशे से समझना, उनके पूरे व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफ़ी है। वे संगीत जानती थीं, साहित्य समझती थीं, शायरी करती थीं और अदब की ऐसी भाषा बोलती थीं, जो आज धीरे-धीरे बनारस से गायब होती जा रही है। मगर उनकी ज़िंदगी में दर्द भी कम नहीं था।
हुस्नाबाई की बेटी की शादी के बाद मौत हो गई। इस हादसे ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपना मानसिक संतुलन खो दिया। यह बनारस की उन कहानियों में से एक है, जहां महफ़िलों की चमकती रोशनी के पीछे बहुत गहरी उदासी छिपी रहती थी।
उन दिनों महफ़िलों का भी अपना एक पूरा संसार हुआ करता था। गजरा, झूमर और दंगल-हर शैली का अपना रंग था। कहीं दो तवायफ़ें आमने-सामने बैठकर गाती थीं, कहीं चार-पांच आवाज़ें मिलकर समां बांधती थीं और कहीं बाक़ायदा सुरों के मुकाबले होते थे। यह सिर्फ़ गायन नहीं था, बल्कि कला की एक ऊंची परंपरा थी।
तवायफ़ों को उस दौर में केवल कलाकार नहीं माना जाता था। उन्हें तहज़ीब और संस्कृति का संरक्षक समझा जाता था। शरीफ़ घरानों के लड़कों को उनके पास अदब, बातचीत का सलीका, शेरो-शायरी की समझ और महफ़िल में बैठने का तौर-तरीक़ा सीखने भेजा जाता था। यह वही दालमंडी थी, जिसे आज समाज सिर्फ़ एक ग़लत नज़र से याद करता है… जबकि सच यह है कि बनारस की रूह को अगर कहीं सबसे ज़्यादा महसूस किया जा सकता था, तो वह इन्हीं गलियों में था।
वो देवी हो गईं… मैं सिर्फ़ बाई रह गई…
रसूलन बाई की कहानी तो और भी ज़्यादा कलेजा चीर देती है। बेहद ग़रीब परिवार में जन्मी रसूलन बाई के हिस्से विरासत में कोई ज़मीन-जायदाद नहीं आई थी। अगर कुछ मिला था, तो सिर्फ़ संगीत। मगर वही संगीत आगे चलकर उनकी पहचान बना, उनका सहारा बना और आख़िर में शायद उनकी सबसे बड़ी तन्हाई भी।
उनकी आवाज़ में ऐसा दर्द था, ऐसी टूटन थी कि सुनने वाले भीतर तक भीग जाते थे। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान तक उन्हें “ईश्वरी आवाज़” कहा करते थे। यह कोई मामूली बात नहीं थी। बिस्मिल्लाह ख़ान जैसे फ़नकार के मुंह से निकला यह वाक्य, दरअसल उस पूरी सांगीतिक परंपरा का सम्मान था जिसे दालमंडी की औरतों ने अपने जीवन से सींचा था।
बिस्मिल्लाह ख़ान अक्सर कहा करते थे, “अगर तवायफ़ें न होतीं, तो बिस्मिल्लाह भी न होता।” इस एक वाक्य में बनारस की पूरी संगीत परंपरा छिपी हुई है। सच यही है कि जिन औरतों को समाज ने हमेशा हाशिए पर रखा, उन्हीं ने हिंदुस्तानी संगीत की सबसे नफ़ीस परंपराओं को अपने रियाज़, अपने दर्द और अपनी पूरी ज़िंदगी से बचाकर रखा। वक़्त ने रसूलन बाई के साथ भी वही बेरहमी की, जो अक्सर बड़े कलाकारों के हिस्से आती है।
बंटवारे के बाद उनके पति पाकिस्तान चले गए, लेकिन रसूलन बाई ने हिंदुस्तान छोड़ने से इनकार कर दिया। शायद इसलिए कि बनारस सिर्फ़ एक शहर नहीं था, वह उनकी रूह था। वह उन गलियों को कैसे छोड़ देतीं, जिनमें उनकी आवाज़ बसी हुई थी? धीरे-धीरे उनकी ज़िंदगी में ग़ुरबत उतरती चली गई। महफ़िलें कम हो गईं, लोग बदल गए, संगीत का मिज़ाज बदल गया और वही रसूलन बाई, जिनकी आवाज़ कभी रेडियो पर पूरे मुल्क में सुनी जाती थी, आख़िरी दिनों में इलाहाबाद के उसी रेडियो स्टेशन के बाहर छोटी-मोटी चीज़ें बेचने को मजबूर हो गईं, जहां कभी उनके गीत प्रसारित हुआ करते थे।
शायद उनकी ज़िंदगी का सबसे दर्दनाक लम्हा वह था, जब उन्होंने रेडियो स्टेशन में लगी तस्वीरों को देखते हुए धीमे से कहा, “बाकी सब बाई देवी बन गईं… एक मैं ही बाई रह गई…” यह दालमंडी की सदियों पुरानी पीड़ा थी, जो उनके होंठों से निकलकर इतिहास में दर्ज हो गई। समाज ने उनकी कला को तो रख लिया, मगर उनके नाम से हमेशा फ़ासला बनाए रखा। उनकी आवाज़ को सम्मान मिला, मगर उन्हें नहीं।
दरअसल दालमंडी की तवायफ़ों ने इस मुल्क को सिर्फ़ संगीत नहीं दिया। उन्होंने भाषा दी, तहज़ीब दी, अदब दिया, सुरों की वह मिठास दी जिसने बनारस को दुनिया भर में पहचान दी।उन्होंने इस शहर की रूह को आकार दिया। बदले में उन्हें मिला-तिरस्कार, अकेलापन और धीरे-धीरे भुला दिया जाना।
आज जब दालमंडी की पुरानी गलियों से गुज़रते हैं, तो लगता है जैसे उन दीवारों में अब भी कोई धीमी ठुमरी अटकी हुई है। जैसे कोई भूली हुई आवाज़ अब भी कह रही हो कि इतिहास सिर्फ़ राजाओं और नवाबों का नहीं होता… उन औरतों का भी होता है, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी सुरों में गलाकर एक शहर की आत्मा बना दी।
दालमंडी की कहानी गिरजा देवी के बिना पूरी हो ही नहीं सकती। ठुमरी की महारानी कही जाने वाली गिरजा देवी का रिश्ता भी उसी मिट्टी से था, जहां सुरों को सिर्फ़ सीखा नहीं जाता थ-जिया जाता था। कहते हैं रियाज़ का मतलब सिर्फ़ अभ्यास नहीं होता। रियाज़ यानी संयम, समर्पण, अनुशासन और अपने हुनर के सामने पूरी तरह झुक जाना। गिरजा देवी ने इस शब्द को अपनी पूरी ज़िंदगी में उतार लिया था।
शायद यही वजह थी कि लोग उन्हें सिर्फ़ कलाकार नहीं मानते थे। लोग उन्हें “अप्पा” कहकर बुलाते थे-एक सम्मान, एक अपनापन और एक श्रद्धा के साथ। उन्होंने ठुमरी को सिर्फ़ गाया नहीं, उसे नई प्रतिष्ठा दी। दादरा, चैती, कजरी, होरी, टप्पा, छोटा ख़या-हिंदुस्तानी संगीत का शायद ही कोई रंग हो जिसे गिरजा देवी ने अपनी आवाज़ में अमर न किया हो। उनकी आवाज़ में बनारस की मिट्टी की वही नमी थी, जिसमें गंगा की लहरें भी सुनाई देती थीं और पुराने बनारस की गलियों की उदासी भी।

जब सावन आवाज़ बन जाता था
दालमंडी की दुनिया सिर्फ़ गिरजा देवी तक सीमित नहीं थी। वहाँ हर गली में कोई न कोई आवाज़ इतिहास बन रही थी। बड़ी मैना बाई उन्हीं आवाज़ों में से एक थीं। कहा जाता है कि उनकी कजरी और ठुमरियों का जवाब नहीं था। बुढ़वा मंगल पर जब वह रामनगर में गाती थीं, तो इस पार घाटों पर हज़ारों लोग सिर्फ़ उनकी आवाज़ सुनने के लिए ठहर जाते थे। उनकी गायकी में पूरा बनारसी मिज़ाज उतर आता था। वह गाती थीं तो लगता था जैसे सावन ख़ुद आवाज़ बनकर धरती पर उतर आया हो। घंटों रियाज़ करना उनके लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। वह इबादत थी।
उसी दौर में शिवकुंवर, हुस्ना जवाहर, छोटी मैना और राजेश्वरी जैसे नाम भी बनारस की संगीत परंपरा को नई ऊंचाइयां दे रहे थे। हर आवाज़ की अपनी पहचान थी, अपना दर्द था, अपना रंग था। यह सिर्फ़ गायिकाओं की दुनिया नहीं थी। तबले, सारंगी और पखावज के बड़े-बड़े उस्ताद भी उसी सांगीतिक माहौल का हिस्सा थे।
कंधे महाराज जैसे तबला वादक के बारे में कहा जाता था कि जब तक उंगलियों से ख़ून न निकल आए, तब तक रियाज़ नहीं छोड़ते थे। यह वह दौर था जब कला मेहनत से पैदा होती थी, शॉर्टकट से नहीं। सुरों को साधने के लिए पूरी ज़िंदगी गलानी पड़ती थी।
दालमंडी की महफ़िलों में “नन्ही पागल” का नाम भी बड़े अजीब सम्मान के साथ लिया जाता था। लोग कहते थे कि वह हर वक़्त अपनी उंगलियों पर कुछ गिनती रहती थीं। दुनिया उन्हें पागल समझती थी, मगर जब वह गाती थीं, तो बड़े-बड़े लोग ख़ामोश होकर सुनते रह जाते थे। कलाकार का असली संसार वही होता है, जिसे दुनिया पूरी तरह कभी समझ ही नहीं पाती।
समाज ने हमेशा तवायफ़ों को एक संकीर्ण नज़र से देखने की कोशिश की, मगर सच यह है कि दालमंडी की औरतें सिर्फ़ देह नहीं थीं-वे संस्कृति की संरक्षक थीं। उन्होंने उस दौर में संगीत, भाषा, अदब और इंसानी नफ़ासत को बचाकर रखा, जब समाज खुद कई तरह के विघटन से गुज़र रहा था।
यही बात बाद में कई लेखकों, इतिहासकारों और संगीत जानकारों ने भी लिखी। उन्होंने साफ़ कहा कि तवायफ़ों को सिर्फ़ वेश्यावृत्ति से जोड़कर देखना, उनके पूरे अस्तित्व और योगदान के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी है। क्योंकि अगर दालमंडी की ये औरतें न होतीं, तो शायद हिंदुस्तानी संगीत की कई परंपराएं कब की दम तोड़ चुकी होतीं। इन औरतों ने सिर्फ़ गाना नहीं सीखा था। उन्होंने बोलने का सलीका सीखा, शेरो-शायरी समझी, भाषा को तराशा, रागों को जिया और अपने टूटे हुए जीवन को कला में बदल दिया।
वे नाम जो अब इतिहास की धूल में दब रहे
दालमंडी का हर कोना आज भी उन आवाज़ों की स्मृतियों से भरा हुआ है। जानकीबाई, रसूलन बाई, कमलेश्वरी, दुर्गेशनंदिनी, गुलाब जामुन बाई, नफ़ीसा ख़ान बेगम, सरस्वती बाई-ये सिर्फ़ नाम नहीं हैं। यह उस सांस्कृतिक सभ्यता के आख़िरी उजले निशान हैं, जिसने बनारस को संगीत की राजधानी बनाया।
सरस्वती बाई जैसी ध्रुपद गायिका बड़े-बड़े पखावजियों का अहंकार तोड़ देती थीं। उनकी कला यह साबित करती थी कि प्रतिभा कभी जाति, लिंग या पेशे की मोहताज नहीं होती। जब वे गाती थीं, तो बड़े-बड़े उस्ताद चुप होकर सुनते थे। आज जब दालमंडी की पुरानी बालकनियां ख़ामोश हैं, तब लगता है जैसे पूरा बनारस धीरे-धीरे अपनी ही आवाज़ भूलता जा रहा है।
दालमंडी सिर्फ़ एक मोहल्ला नहीं था। वह वह जगह थी जहां औरतें अपने दर्द को सुरों में बदल देती थीं। जहां तिरस्कार भी ठुमरी बन जाता था। जहां टूटे हुए दिलों से सबसे खूबसूरत राग जन्म लेते थे। दालमंडी की कहानी दरअसल कभी ख़त्म नहीं होती। एक आवाज़ जाती है, तो दूसरी जन्म ले लेती है। एक महफ़िल उजड़ती है, तो दूसरी कहीं सुर साधने लगती है। यही वजह है कि उमराव जान से लेकर गिरजा देवी और शोभा गुर्टू तक यह सिलसिला टूटा हुआ नहीं दिखाई देता।
अवध की मशहूर उमराव जान ने भी अपने जीवन के आख़िरी दिनों में दालमंडी की गलियों को ही अपना ठिकाना बनाया। गोविंदपुरा की पतली और तंग गलियों में वे चुपचाप अपने रियाज़ में डूबी रहती थीं। लोग उन्हें अदब से “उमराव साहिबा” कहकर पुकारते थे।
शायद दुनिया की तमाम रौनकें देखने के बाद उन्हें आख़िर में वही जगह सुकून दे सकी, जहां संगीत सांस लेता था। कहा जाता है कि उन्होंने अपना आख़िरी रियाज़ भी दालमंडी की गलियों में ही किया। यह बात यूं ही नहीं है। दालमंडी सिर्फ़ एक मोहल्ला नहीं थी-वह कलाकारों की आख़िरी पनाहगाह थी। वहां सुरों को इबादत की तरह निभाया जाता था।
पूरब अंग की आख़िरी बड़ी आवाज़
इसी परंपरा की अगली कड़ी थीं शोभा गुर्टू। उनकी मां मेनकाबाई का रिश्ता भी दालमंडी से था। शोभा गुर्टू ने पूरब अंग की ठुमरी को जिस तरह अपने गले में उतारा, वह अपने आप में बेमिसाल था। उन्होंने सिर्फ़ परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि उसे अपनी आत्मा का रंग दिया। उनकी आवाज़ में दर्द भी था, शरारत भी, विरह भी और बनारस की मिट्टी की वही पुरानी नमी भी।
ठुमरी, दादरा, चैती, झूला, कजरी-हर शैली में उन्होंने अपने भीतर का भाव इस तरह उड़ेला कि लोग उन्हें “ठुमरी क्वीन” कहने लगे। यह सम्मान यूँ ही नहीं मिला था। इसके पीछे वर्षों का रियाज़, तपस्या और अपने फ़न के प्रति वही समर्पण था, जिसने कभी दालमंडी को संगीत का तीर्थ बनाया था। आज जब दालमंडी की गलियों में बुलडोज़रों की आवाज़ गूंजती है, तो लगता है जैसे उन्हीं सुरों की आख़िरी परछाइयाँ मलबे के नीचे दबती जा रही हैं। जैसे कोई शहर अपनी ही रूह से धीरे-धीरे बेदख़ल हो रहा हो।
सविता देवी ने भी अपनी मां सिद्धेश्वरी देवी की परंपरा को उसी समर्पण के साथ आगे बढ़ाया। यह सिर्फ़ संगीत की विरासत नहीं थी, बल्कि उन औरतों की जिजीविषा थी जिन्होंने समाज की तमाम उपेक्षाओं, तानों और तिरस्कार के बावजूद अपने सुरों को मरने नहीं दिया। उन्होंने यह साबित किया कि दालमंडी की परंपरा सिर्फ़ अतीत की कोई धुंधली कहानी नहीं है, बल्कि वह एक जीवित धारा है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहती रही। सुर उनके लिए पेशा नहीं थे-सांस थे। शायद यही वजह थी कि उनकी आवाज़ में बनारस की वही पुरानी मिठास सुनाई देती थी, जिसमें दर्द भी होता था और ठहराव भी।
सारंगी : जब बिना शब्दों के रोता था संगीत
दालमंडी की पहचान सिर्फ़ गायिकाओं से नहीं थी। वहां सारंगी बजाने वाले उस्ताद भी कम नहीं थे। श्यामचरण उस्ताद, सियाजी उस्ताद, मिठाई लाल-ये ऐसे नाम थे जिनकी उंगलियों में जैसे संगीत बसता था। उनकी सारंगी सिर्फ़ वाद्य नहीं थी। वह रोती भी थी, हंसती भी थी और कभी-कभी इंसान के भीतर के सबसे गहरे दुख को बिना शब्दों के कह जाती थी।
पुराने लोग कहते हैं कि जब रात गहरी हो जाती थी और किसी कोठे पर सारंगी की धीमी तान उठती थी, तो पूरा माहौल बदल जाता था। ऐसा लगता था जैसे किसी ने शहर की रूह को छू लिया हो। सारंगी में वह दर्द था, जो शब्दों में नहीं आ सकता।
उस्ताद विलायत ख़ान ने बनारस को “संगीत की ख़राब मशीन” कहा था-ऐसी मशीन जहां फ़नकार की घिसाई होती है और फिर वही कलाकार तपकर निखरकर बाहर आता है। यह बात बनारस और दालमंडी दोनों पर बराबर लागू होती है। यहां कलाकार पैदा नहीं होते थे, बनाए जाते थे। रियाज़, संघर्ष, भूख, तन्हाई और लगातार साधना से। यहां सुरों को सीखने के लिए पूरी ज़िंदगी गलानी पड़ती थी।
दालमंडी की महफ़िलें सिर्फ़ मनोरंजन नहीं थीं। वे संगीत की कठिन पाठशालाएं थीं, जहां हर ग़लत सुर पर उस्ताद की निगाह पड़ती थी और हर सही तान पर पूरी महफ़िल “वाह” कह उठती थी। लेकिन अब वक़्त बदल चुका है।
आज “तवायफ़” शब्द सुनते ही लोगों की निगाहों में एक अजीब-सी तिरस्कार भरी परछाईं उतर आती है। शायद नई पीढ़ी यह सोच भी नहीं पाती कि यही औरतें कभी इस मुल्क की सांस्कृतिक धुरी थीं। वही दालमंडी जहां कला जन्म लेती थी… जहां संगीत इबादत की तरह निभाया जाता था… आज अपने आख़िरी निशानों को बचाने की लड़ाई लड़ रही है।
उसकी पुरानी बालकनियां ख़ामोश हैं। जिन खिड़कियों से कभी ठुमरियां बहा करती थीं, वहां अब सन्नाटा बैठा है। जिन गलियों में तबले की थाप गूंजती थी, वहां अब मशीनों की आवाज़ है। सरकारी हथौड़े उन इमारतों पर चल रहे हैं, मगर शहर ख़ामोश है। जैसे किसी बीमार शरीर की धड़कन मॉनिटर पर धीरे-धीरे सीधी होती चली जाती है, वैसे ही दालमंडी की सांस्कृतिक सांसें भी कम होती जा रही हैं। शायद यही सबसे बड़ा दुख है कि एक पूरा समाज अपनी ही स्मृतियों के टूटने को चुपचाप देख रहा है।

एक शहर की खोती हुई याददाश्त
साहित्यकार बच्चन सिंह ने जब “वैश्या स्तोत्र” की रचना की और उसकी भूमिका भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखी, तो यह कोई साधारण घटना नहीं थी। वह उस दौर की सांस्कृतिक स्वीकृति थी। यह इस बात का प्रमाण था कि उस समय तवायफ़ों को सिर्फ़ देह नहीं माना जाता था। उन्हें कला, सौंदर्य और तहज़ीब की साधिका समझा जाता था।
उनकी रचनाओं में जिन नामों का उल्लेख आता है- मैना, जानकी, जोहरा, हुस्ना, विद्याधरी, सरस्वती, गंगा, जमुना- वे केवल नाम नहीं हैं। वे उस भूले हुए संसार की आख़िरी परछाइयां हैं, जिसने बनारस को सुर दिया, लय दी, भाषा दी और जीने का सलीका दिया।
आज जब उन नामों को पढ़ते हैं, तो लगता है जैसे कोई पुरानी महफ़िल धीरे-धीरे फिर से सज उठी हो। कहीं दूर से सारंगी की आवाज़ आ रही हो। कोई ठुमरी आधी रात में हवा में तैर रही हो। और दालमंडी की कोई बूढ़ी बालकनी अब भी अपने बीते हुए वक़्त को याद कर रही हो।
दरअसल दालमंडी का दुख सिर्फ़ दालमंडी का दुख नहीं है। यह उस समाज का दुख है, जिसने अपनी सबसे खूबसूरत सांस्कृतिक विरासत को पहले बदनाम किया… फिर धीरे-धीरे भुला दिया। लेकिन इतिहास की एक खूबी होती है-वह पूरी तरह कभी मरता नहीं।
दालमंडी आज भी बनारस की हवा में कहीं बची हुई है। किसी पुरानी ठुमरी में। किसी बूढ़ी सारंगी की कांपती हुई तान में। किसी भूले हुए गीत की उदासी में। और उन औरतों की आवाज़ों में, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी सुरों में गलाकर इस शहर की रूह बना दी। शायद इसलिए दालमंडी को सिर्फ़ एक मोहल्ले की तरह याद नहीं किया जाना चाहिए। उसे बनारस की उस धड़कन की तरह याद किया जाना चाहिए…जो अब बहुत धीमी हो चुकी है, मगर अब भी पूरी तरह मरी नहीं है।
ये सिर्फ़ गली नहीं जो मिटेगी,
ये राग हैं, रस हैं, रूहें हैं,
जो दालमंडी के हर मोड़ पर
आज भी फुसफुसाकर कहती हैं—
“इश्क़ मिटाया नहीं जाता साहिब,
वो तो बस वक़्त के साथ सुनाई देना बंद हो जाता है…।

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं। संपर्क-7068509999)
