आत्मा की कोई उम्र नहीं होती….!!

आत्मा की कोई उम्र नहीं होती….!!

प्रिय मित्रों, शुभचिंतकों और साथियों,

29 मार्च को मेरा जन्मदिन था। इस अवसर पर अनगिनत साथियों, मित्रों और शुभचिंतकों ने मुझे शुभकामनाएं दीं, मेरी मुहिम और कार्य को सराहा। यह आपके प्रेम, सम्मान और विश्वास का प्रतीक है, जो मेरी ऊर्जा का स्रोत बना हुआ है। मैं आप सभी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं।

वैसे तो उम्र एक संख्या भर है, जो हर साल बदलती है, लेकिन जीवन का सार इससे कहीं अधिक गहरा है। इंसानी जीवन समय के साथ रूपांतरित होता है—शरीर बूढ़ा होता है, अनुभव गहरे होते हैं, परिस्थितियां नई शक्ल में सामने आती हैं। लेकिन आत्मा? आत्मा की कोई उम्र नहीं होती। यह समय के दायरे से परे होती है, जन्म और मृत्यु के चक्र से अलग, एक अजेय और शाश्वत ऊर्जा।

हम जिस शरीर में जीते हैं, वह नश्वर है। जैसे वस्त्र पुराने हो जाते हैं और उन्हें बदलना पड़ता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर में प्रविष्ट होती है। यह विचार भारतीय दर्शन और गीता में स्पष्ट रूप से बताया गया है:

न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।”

(गीता 2.20)

अर्थात् आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यह अनादि, अविनाशी और सनातन है।

अगर हम उम्र की परिभाषा देखें तो वह केवल शरीर पर लागू होती है। बचपन में हम जिज्ञासु होते हैं, जवानी में जोश से भरे रहते हैं और बुढ़ापे में अनुभवों का खजाना होता है। लेकिन इन सभी अवस्थाओं में आत्मा वही रहती है। यही कारण है कि कुछ वृद्धजन मानसिक रूप से युवाओं जैसे ऊर्जावान होते हैं, तो कुछ युवा मानसिक रूप से थके हुए और निराश।

मनुष्य भावनाओं में जीता है, और यही उसकी आत्मा की विशेषता को उजागर करता है। प्रेम, करुणा, दया, ज्ञान—ये सभी आत्मा के लक्षण हैं, जो शरीर की उम्र से प्रभावित नहीं होते। प्रेम करने वाले के लिए उम्र मायने नहीं रखती, ज्ञान प्राप्त करने वाले के लिए कोई सीमा नहीं होती।

अगर आत्मा की कोई उम्र होती, तो वह हर जन्म में शून्य से शुरू करती। लेकिन हम देखते हैं कि कुछ बच्चे जन्म से ही अद्भुत प्रतिभा के धनी होते हैं। यूनिवर्स उन्हें ताकत देती है, जो उनके साथ आता है। आत्मा हर जन्म में नए अनुभव जोड़ती है, लेकिन उसकी प्रकृति नहीं बदलती।

अगर हम आत्मा को समय की सीमाओं में बांधें, तो उसकी अनंतता समाप्त हो जाएगी। लेकिन आत्मा तो सृष्टि से भी पुरानी है। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है। आत्मा भी एक ऊर्जा है, जो केवल शरीर बदलती है, लेकिन स्वयं अपरिवर्तनीय रहती है।

जिसे हम उम्र कहते हैं, वह शरीर का मापदंड है, आत्मा का नहीं। आत्मा शाश्वत है, मुक्त है, और हर अवस्था में समान रहती है। इसका कोई जन्म नहीं, कोई मृत्यु नहीं, कोई आरंभ नहीं, कोई अंत नहीं। इसलिए, जब भी आप उम्र को लेकर चिंतित हों, याद रखें—आपकी आत्मा हमेशा युवा, हमेशा ऊर्जावान और हमेशा स्वतंत्र है।

फिर भी, जिन लोगों ने जन्मदिन पर मुझे याद किया, सराहा, उनका तहे दिल से आभार। जीवन भर मैं आपके इस प्रेम और स्नेह का ऋणी रहूंगा, क्योंकि आप सभी की सराहना मेरी ऊर्जा का स्रोत है। यही ऊर्जा मुझे नया रचने और गढ़ने की ताकत देती है।

#स्नेह, सम्मान और स्मृतियों का संगम

29 मार्च… यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि मेरे लिए प्रेम, भावना, प्रेम और आत्मीयता से भरा एक दिन बन गया। इस दिन हमारी प्रिय बहन, प्रसिद्ध चित्रकार पूनम राय जी की संस्था बीआर फाउंडेशन का स्थापना दिवस था और संयोग से यह मेरा जन्मदिन भी। जब एक ही दिन दो खुशियां साथ आ जाएं, तो उत्सव और उल्लास का स्वरूप भी कुछ अलग ही होता है।

बीआर फाउंडेशन परिवार ने इस शुभ अवसर को एक छोटे से जलसे के रूप में मनाने का निर्णय लिया  और यह आयोजन सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मीयता का सजीव रूप था। संस्था के परिसर में सजीव मुस्कानें, आत्मीय स्नेह और प्रेम के रंग बिखरे हुए थे। यह एक ऐसा एहसास था, जिसे शब्दों में समेटना कठिन है।

https://www.instagram.com/reel/DHzuapJSowi/?igsh=MTlmaXBqbXl3YWdzbA==

इस अवसर को और भी गरिमा मिली जब श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ट्रस्ट के चेयरमैन प्रोफेसर नागेंद्र पांडेय जी, शिक्षाविद राधेश्याम जायसवाल जी, समाजसेवी राजकुमार जायसवाल जी, अनिल जायसवाल जी और शैलेंद्र जी जैसे सम्माननीय व्यक्तित्व हमारे बीच उपस्थित रहे। उनके आशीर्वचनों और शुभकामनाओं ने इस दिन को और भी यादगार बना दिया। उन्होंने जो स्नेह और अपनापन दिया, वह मेरे लिए अनमोल धरोहर है।

इस विशेष दिन को और भी खूबसूरत बनाने के लिए मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूं पूनम दी और रिचा दी का, जिन्होंने अपने प्रयास से इसे अविस्मरणीय बना दिया। उनका स्नेह, उनकी आत्मीयता और उनकी योजनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, बल्कि भावनाओं और विश्वास से भी बनते हैं।

बीआर फाउंडेशन का यह स्थापना दिवस और मेरा जन्मदिन, दोनों ही एक नई प्रेरणा और संकल्प का प्रतीक बन गए। यह दिन सिर्फ बीते हुए समय का उत्सव नहीं था, बल्कि आने वाले सुनहरे कल के लिए एक प्रेरणा भी था। मैं इस स्नेहिल संगम के लिए सभी का हृदय से आभारी हूं।

यह दिन हमेशा स्मृतियों में संजोया रहेगा, एक ऐसी अनुभूति के रूप में जिसे शब्दों में समेटना कठिन है, पर हृदय में हमेशा जीवंत रहेगा।

आप सभी के स्नेह और आशीर्वाद के लिए धन्यवाद।

सादर,
विजय विनीत

पत्रकार एवं लेखक

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