दृष्टि नहीं, दृष्टिकोण से बनती है काशी की तस्वीर : मनीष खत्री
‘कोरस–2026’
सोशल मीडिया पर छाप छोड़नी है तो सीखें तकनीक व संवेदना के गुर
संवाद और आवाज़ में चित्र रचने की प्रस्तुति का संतुलन महत्वपूर्ण
विशेष संवाददाता
वाराणसी। काशी को कैमरे में कैद करना केवल तकनीक का खेल नहीं, बल्कि संवेदना और दृष्टिकोण का विषय है। यह बात ख्यातिलब्ध फोटोग्राफर एवं चित्रकार मनीष खत्री ने सोमवार को मड़ौली स्थित मेहता आर्ट गैलरी में ‘कोरस–2026’ के तहत आयोजित सोशल मीडिया कार्यशाला में कही। उन्होंने कहा कि तकनीक आपको एक अच्छी तस्वीर दे सकती है, लेकिन संवेदनशीलता ही उसे महान बनाती है। काशी में फोटोग्राफी केवल फ्रेम कैद करना नहीं, बल्कि उस क्षण की आत्मा को समझना है।
उन्होंने कहा कि यह शहर जीवन और मृत्यु के दर्शन का अनूठा चित्रण है, जिसे देखने के लिए एक अलग नजरिया और सोच की जरूरत होती है। काशी की धुंध भरी सुबह, सुनहरी शाम और घाटों पर परछाइयों का खेल फोटोग्राफी के लिए अद्भुत अवसर प्रदान करता है। यहां के लोगों की आस्था, मुस्कान और दैनिक जीवन को करीब से चित्रित करना आसान नहीं है, इसके लिए अनुभव और कैमरे की बारीक समझ जरूरी है।

मनीष खत्री ने यह भी कहा कि वाराणसी जैसे शहर को केवल महसूस करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे तकनीकी रूप से समझना भी उतना ही जरूरी है। यहां की रोशनी स्थिर नहीं होती, हर पल बदलती रहती है। ऐसे में कैमरे की सेटिंग्स पर पूरा नियंत्रण होना चाहिए। घाटों पर शूट करते समय प्राकृतिक रोशनी का अधिकतम उपयोग करना चाहिए। सुबह के समय आईएसओ 100–200 और चौड़े अपर्चर (f/1.8–f/2.8) से नरम और स्वाभाविक टोन मिलते हैं, जबकि शाम की गंगा आरती के दौरान कम रोशनी और तेज मूवमेंट को कैद करने के लिए आईएसओ 800–1600 तक बढ़ाना और शटर स्पीड संतुलित रखना आवश्यक होता है।
उन्होंने कहा कि फोटोग्राफी में फ्रेमिंग सबसे अहम कला है। काशी का हर दृश्य पहले से ही एक कहानी है, जिसे सही एंगल से पकड़ना होता है। संकरी गलियों में लीडिंग लाइन्स और प्राकृतिक फ्रेम-जैसे दरवाजे और खिड़कियां, तस्वीरों को अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। रंगों को अत्यधिक चमकदार बनाने के बजाय हल्के कॉन्ट्रास्ट और वार्म टोन के साथ तस्वीरों की मौलिकता बनाए रखना बेहतर होता है, ताकि गंगा किनारे की वास्तविक अनुभूति बनी रहे।

आकाशवाणी में लंबे समय तक उद्घोषक रहे अशोक आनंद ने कहा कि बोलने की कला ‘आवाज’ के माध्यम से ‘तस्वीर’ बनाने की कला है। जब आप बोलते हैं तो श्रोता के मन में दृश्य जीवंत हो उठते हैं। उन्होंने कहा कि रेडियो या खबरिया माध्यमों में बोलते समय ऐसा लगना चाहिए कि आप किसी एक व्यक्ति से उसके घर के कमरे में बैठकर बात कर रहे हों। शब्दों का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। भाषा न बहुत कठिन हो, न बहुत अनौपचारिक, बल्कि सहज और ग्राह्य होनी चाहिए। एक ही टोन में बोलने से श्रोता ऊब सकते हैं, इसलिए विषय के अनुसार आवाज में उतार-चढ़ाव जरूरी है।
उन्होंने यह भी कहा कि आवाज में आत्मविश्वास होना चाहिए, लेकिन बनावटीपन से बचना जरूरी है। आवाज स्वाभाविक होनी चाहिए, जैसे आप स्वयं को सुन रहे हों। बोलते समय यह कल्पना करें कि श्रोता सामने बैठा है, इससे संवाद में आत्मीयता आती है। लिखी गई स्क्रिप्ट पढ़ने के लिए नहीं, बोलने के लिए होती है, इसलिए वाक्य छोटे और सरल होने चाहिए। कई बार बिना तैयारी के भी बोलना पड़ता है, ऐसे समय में शांत रहकर तुरंत सही शब्दों का चयन करना जरूरी होता है। सोशल मीडिया पर बोलते समय भाषा में शिष्टता, संयम और आदर का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रभाशंकर मिश्र ने कहा कि “बोलना” और “अपनी बात कहना” एक जैसे नहीं होते। खासकर सोशल मीडिया पर काम करने वालों के लिए यह अंतर समझना बेहद जरूरी है। बोलना केवल शब्दों का उच्चारण है, जबकि अपनी बात कहना एक सजग, स्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें तथ्य, सटीक आंकड़े, भावनाएं और समझ शामिल होती है। जब व्यक्ति सचेत होकर अपनी बात रखता है तो उसमें स्पष्टता, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी दिखाई देती है।
शिक्षाविद डॉ. (मेजर) अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि बोलना एक क्रिया है, जबकि अपनी बात कहना एक कला है। इसमें शब्दों के साथ भाव, समय और श्रोता के प्रति सम्मान का संतुलन संवाद को प्रभावी और सार्थक बनाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्वाभाविक आवाज विकसित करने के लिए व्यक्ति को खुद को सुनना चाहिए। किसी बातचीत को रिकॉर्ड कर अपनी ऑन-एयर आवाज से तुलना करने पर अपनी कमियों का विश्लेषण किया जा सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत ने कहा कि सोशल मीडिया पर सफल प्रस्तुति के लिए आत्मविश्वास बनाए रखते हुए घबराहट पर नियंत्रण जरूरी है। विषय की पूर्व तैयारी और उसे बुलेट प्वाइंट्स में व्यवस्थित करना मददगार होता है। आवाज को प्रभावी बनाने के लिए गहरी सांस लेना, उपयुक्त वातावरण में अभ्यास करना और जोर से बोलकर अभ्यास करना चाहिए। साथ ही श्रोताओं की समझ, तात्कालिक बोलने की क्षमता और स्पष्ट व स्वाभाविक आवाज बनाए रखना भी जरूरी है। अभ्यास, तैयारी और आत्म-नियंत्रण से कोई भी व्यक्ति बेहतर प्रसारण कौशल विकसित कर सकता है।
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी ने कहा कि मीडिया कोई भी हो, बोलते समय संतुलित गति, सही स्थान पर विराम और सांसों पर नियंत्रण संचार को अधिक प्रभावी बनाते हैं। उन्होंने कहा कि स्क्रिप्ट में आवश्यकता अनुसार बदलाव, तनावपूर्ण परिस्थितियों में शांत रहना और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुति को सशक्त बनाता है।
कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ चित्रकार अमित कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया और सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष सीबी तिवारी, राजकुमार, एक्टिविस्ट श्रुति नागवंशी, वरिष्ठ चित्रकार धीरेंद्र सिसौदिया, छाया, अंजली मौर्य, शिवांगिनी समेत बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। मेहता आर्ट गैलरी को अब दर्शकों के लिए खोल दिया गया है, जहां प्रतिदिन सुबह से शाम तक अमित कुमार के चित्रों का अवलोकन किया जा सकता है।
