वाघा बॉर्डर : जहां खामोश होती है सरहद, बोलती हैं सिर्फ आखें
संस्मरण : शब्द नहीं, निगाहें बनाती हैं रिश्ते और पीछे छूट जाता है मुल्क
विजय विनीत
कुछ तस्वीरें महज़ तस्वीरें नहीं होतीं, वे वक्त के किसी बंद संदूक की चाबी बन जाती हैं। बरसों बाद जब उन पर नज़र पड़ती है तो धूल से ढकी यादें फिर से सांस लेने लगती हैं। मेरे पास भी ऐसी ही एक तस्वीर है-भारत-पाकिस्तान की वाघा सीमा पर उतारी गई। तस्वीर में मैं हूं, मेरे साथ ‘अमर उजाला’ डिजिटल के वर्तमान संपादक राजीव सिंह और भड़ास मीडिया के संपादक यशवंत सिंह और डिज़ाइनर राजेश जेटली हैं। तस्वीर में जितनी मुस्कानें दिखाई देती हैं, उसके पीछे उससे कहीं अधिक कहानियां छिपी हुई हैं।
जब भी मैं उस तस्वीर को देखता हूं, मेरी स्मृतियां सीधे सन् 1999 की ओर लौट जाती हैं। वह दौर भारतीय पत्रकारिता में बदलाव का दौर था। हिंदी पत्रकारिता अपने नए भूगोल तलाश रही थी। अख़बार अपने पारंपरिक इलाकों से निकलकर नई ज़मीनों पर दस्तक दे रहे थे। उन्हीं दिनों ‘अमर उजाला’ ने पंजाब के हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपना विस्तार करने का फैसला किया था। जालंधर संस्करण का शुभारंभ होना था और इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी का हिस्सा बनने का अवसर हमें मिला।
अगस्त 1999 की उमस भरी दोपहरों और बारिश से धुली शाम के बीच हम पंजाब पहुंचे। कानपुर से राजीव सिंह और यशवंत सिंह आए थे। मेरठ से मैं और श्रीकांत अस्थाना पहुंचे थे। पूरी टीम का नेतृत्व कर रहे थे वरिष्ठ पत्रकार और संपादक रामेश्वर पांडेय जी। उनके व्यक्तित्व में संपादकीय कठोरता और पारिवारिक आत्मीयता का अद्भुत संगम था। वे जहां अख़बार के लिए बेहद अनुशासित थे, वहीं साथियों के लिए भाई की तरह स्नेहिल भी।
जालंधर में हमारा ठिकाना एक साधारण-सा गेस्ट हाउस था। सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन सपने असीमित। दिनभर अख़बार की योजनाओं, रिपोर्टिंग और प्रसार की रणनीतियों पर चर्चा होती और रात को वही गेस्ट हाउस किसी परिवार का घर बन जाता। उस दौर में पत्रकारिता केवल दफ्तर तक सीमित नहीं थी। वह जीवन-शैली थी। हम साथ रहते थे, साथ खाते थे और साथ सपने देखते थे। गेस्ट हाउस का छोटा-सा रसोईघर हमारी दोस्ती का सबसे बड़ा साक्षी था।
यशवंत सिंह की एक अलग ही दुनिया थी। आज लोग उन्हें निर्भीक पत्रकार और भड़ास मीडिया के संस्थापक के रूप में जानते हैं, लेकिन उस समय उनका एक और रूप देखने को मिलता था। वे भोजन बनाने में उस्ताद थे। पूड़ियां बेलने और उन्हें सुनहरा तलने की उनकी कला देखते ही बनती थी। खाना बनाते हुए वे कभी कोई लोकगीत छेड़ देते, कभी कोई पुराना फिल्मी नग़मा। रसोई में घुलती पूड़ियों की खुशबू और उनके गीतों की लय आज भी मेरी स्मृतियों में ताजा है।
सब्जी बनाने की जिम्मेदारी प्रायः रामेश्वर पांडेय जी संभालते थे। उनके हाथों में जैसे मसालों का भी अनुशासन था। वे जिस गंभीरता से संपादकीय पन्ना देखते थे, लगभग उसी गंभीरता से कड़ाही में सब्जी भी चलाते थे। इनका साथ देते थे वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत अस्थाना जी।
राजीव सिंह का स्वभाव अपेक्षाकृत शांत था। वे कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे तो बात सीधे मुद्दे पर होती थी। अख़बार की प्रस्तुति, कंटेंट की गुणवत्ता और पाठकों की मनोवृत्ति पर उनकी गहरी पकड़ थी। उनमें एक अनुभवी संपादक की दृष्टि साफ दिखाई देती थी। वे अक्सर कहा करते थे कि अख़बार केवल खबरों का पुलिंदा नहीं होता, वह अपने समय का दस्तावेज़ होता है।
हौसलों की राजधानी था जालंधर
जालंधर मेरे लिए केवल एक शहर नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा पड़ाव था जहां मैंने पत्रकारिता को किताबों और कक्षाओं से बाहर निकलकर जीवन के बीचोंबीच धड़कते हुए देखा। वह समय संघर्ष का था, लेकिन उसी संघर्ष ने हमें गढ़ा, संवारा और आगे बढ़ने की ताकत दी।
‘अमर उजाला’ के जालंधर संस्करण की शुरुआत आसान नहीं थी। हम एक नए प्रदेश में थे, नई चुनौतियों के बीच थे और हमारे सामने एक स्थापित मीडिया परिदृश्य था। ऐसे समय में हम सबके भीतर केवल एक चीज़ समान थी-कुछ नया करने का जुनून और सफल होने का अटूट विश्वास।
उन दिनों संपादकीय विभाग में मेरी एक अतिरिक्त भूमिका भी थी। मैं साथियों को भाषा, वर्तनी और कंप्यूटर संचालन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दिया करता था। हिंदी पत्रकारिता तेजी से कंप्यूटर की ओर बढ़ रही थी और बहुत से साथी अभी भी इस बदलाव के दौर से गुजर रहे थे। कई बार देर रात तक बैठकर हम लोग कंपोजिंग, फॉन्ट, प्रूफ रीडिंग और पेज निर्माण की बारीकियों पर काम करते थे। किसी की वर्तनी सुधारनी होती, किसी को शीर्षक लेखन की तकनीक समझानी होती और किसी को कंप्यूटर के नए शॉर्टकट बताने होते थे।
आज यह सब सामान्य बात लग सकती है, लेकिन उस दौर में यह एक बड़ी चुनौती थी। इंटरनेट का विस्तार नहीं हुआ था, तकनीकी संसाधन सीमित थे और सीखने के अवसर भी कम थे। ऐसे में हम एक-दूसरे के शिक्षक भी थे और विद्यार्थी भी।
मुझे याद है, कई बार अखबार के पन्ने अंतिम समय में बदलने पड़ते थे। कई बार कंप्यूटर अचानक जवाब दे दिया करते थे। फाइलें गायब हो जाती थीं। हम देर रात तक जागते, समस्या का समाधान खोजते और अगले दिन फिर उसी ऊर्जा के साथ काम में जुट जाते। हमारे पास सुविधाएं कम थीं, लेकिन हिम्मत बहुत थी। हमारे पास संसाधन सीमित थे, लेकिन सपने असीमित थे।
जालंधर में रहते हुए मैंने पंजाब को बहुत करीब से देखा। बाद में यह प्रदेश मेरे लिए केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं रहा। वह एक जीवित सामाजिक-सांस्कृतिक पाठशाला बन गया, जहां हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता था। पंजाब की मिट्टी में एक अजीब-सी गर्माहट है। यहां का किसान कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराना जानता है। यहां का मजदूर संघर्ष के बीच भी गीत गाना नहीं भूलता। यहां के लोग दर्द को भी जिंदादिली में बदल देने की कला जानते हैं।
सरसों के खेतों के बीच से गुजरते हुए, गांवों की चौपालों में बैठते हुए और लोगों से बातचीत करते हुए मैंने महसूस किया कि पंजाब केवल खुशहाली की कहानी नहीं है। उसके भीतर संघर्ष की लंबी दास्तान भी छिपी हुई है।
यह वह धरती है जिसने आतंकवाद के कठिन दौर को देखा था। यह वह भूमि है जिसने विभाजन की सबसे गहरी चोट झेली थी। यहां ऐसे हजारों परिवार थे जिनकी जड़ें आज भी लाहौर, गुजरांवाला, रावलपिंडी और मुल्तान से जुड़ी हुई थीं। उनके पास यादों का एक ऐसा खजाना था जिसे कोई सीमा रेखा कभी मिटा नहीं सकती थी।
कई बार किसी बुजुर्ग की आंखों में अपने छूटे हुए गांव की तस्वीर तैर जाती थी। वे बताते थे कि कैसे एक रात में सब कुछ बदल गया था। कैसे लोग घर, खेत, दुकानें और रिश्ते पीछे छोड़कर नई जिंदगी की तलाश में निकल पड़े थे। उनकी बातें सुनकर महसूस होता था कि इतिहास केवल किताबों में नहीं बसता, वह लोगों की स्मृतियों में भी जीवित रहता है।
पंजाब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसने अपने अथाह दर्द को अपनी नियति नहीं बनने दिया। उसने संघर्षों के बीच भी जीवन का उत्सव मनाना नहीं छोड़ा। शायद इसी कारण यहां की फिजाओं में संगीत घुला हुआ महसूस होता है। गुरुद्वारों से आती गुरुबाणी की स्वर लहरियां मन को एक अलग ही शांति से भर देती थीं। ऐसा लगता था मानो यह प्रदेश अपने घावों को भी सुरों में बदल देना जानता है।
इन सबके बीच हम भी अपनी लड़ाई लड़ रहे थे। एक नए अखबार को स्थापित करने की लड़ाई। पाठकों का विश्वास जीतने की लड़ाई। बेहतर पत्रकारिता करने की लड़ाई और सबसे बढ़कर खुद को साबित करने की लड़ाई। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि जालंधर ने हमें केवल जुझारू पत्रकार नहीं बनाया, बल्कि जीवन के कठिन समय में टिके रहने का साहस भी सिखाया। उसने सिखाया कि संसाधनों से अधिक महत्वपूर्ण संकल्प होता है। उसने सिखाया कि बड़ी उपलब्धियां आरामगाहों में नहीं, संघर्षों की भट्ठी में तैयार होती हैं। उसने यह भी सिखाया कि यदि साथियों का साथ, मार्गदर्शकों का विश्वास और अपने काम के प्रति समर्पण हो, तो कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।
जालंधर की याद आते ही मुझे केवल अखबार का दफ्तर नहीं याद आता। मुझे याद आते हैं वे दिन, जब हम अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए दिन-रात एक कर रहे थे। मुझे याद आती है वह टीम, जिसके पास साधन कम थे, लेकिन हौसले आसमान से भी ऊंचे थे। वास्तव में, जालंधर हमारे जीवन का एक अध्याय नहीं था। वह हमारे हौसलों की राजधानी था।
करीब दो-तीन महीने हम सबने उसी गेस्ट हाउस में एक साथ बिताए। धीरे-धीरे जालंधर संस्करण ने अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। अख़बार पाठकों तक पहुंचने लगा और फिर शुरू हुआ पंजाब को समझने और अख़बार को जन-जन तक पहुंचाने का अभियान।
हम अलग-अलग शहरों, कस्बों और बाजारों में जाते। पाठकों से मिलते। वितरकों से बात करते। स्थानीय समाज की नब्ज़ टटोलते। यह केवल अख़बार का विस्तार नहीं था, बल्कि एक प्रदेश को करीब से जानने की प्रक्रिया भी थी।
इसी क्रम में एक दिन योजना बनी कि अमृतसर चला जाए। वो अमृतसर जहां इतिहास हर मोड़ पर सांस लेता है। जहां स्वर्ण मंदिर की रूहानी रोशनी है, जहां जलियांवाला बाग़ का मौन अब भी चीखता है और जहां से कुछ ही दूरी पर वह सरहद है जिसने उपमहाद्वीप के इतिहास को दो हिस्सों में बांट दिया।
मैं, राजीव सिंह, यशवंत सिंह और राजेश जेटली अमृतसर के लिए रवाना हुए। यात्रा के दौरान रास्ते भर बातचीत का सिलसिला चलता रहा। पत्रकारिता, साहित्य, राजनीति, पंजाब और देश। कोई विषय ऐसा नहीं था जो चर्चा में न आया हो।
राजेश जेटली अपनी रचनात्मक दृष्टि के लिए जाने जाते थे। वे किसी भी दृश्य को केवल देखते नहीं थे, उसे महसूस भी करते थे। सड़क किनारे खड़े पेड़, खेतों में झूमती फसलें और गुजरते गांव। उनकी निगाह में सब किसी डिजाइन की तरह जीवित थे। अमृतसर पहुंचने के बाद हमें कई लोगों ने एक ही सलाह दी, “अगर अमृतसर आए हैं तो वाघा बॉर्डर देखे बिना मत जाइए।”
वाघा भारत-पाक की केवल एक सीमा नहीं है। वह इतिहास का वह पन्ना है जिस पर विभाजन की स्याही अब भी पूरी तरह सूखी नहीं है। वह वह जगह है जहां दो मुल्क आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन हवा, मौसम और मिट्टी आज भी एक-दूसरे से बेखबर नहीं हुए। हमें बताया गया कि हर शाम सूर्यास्त के समय यहां ध्वज अवतरण समारोह आयोजित होता है। हजारों लोग दोनों ओर बैठते हैं। सैनिक अपने-अपने राष्ट्रध्वज को सम्मानपूर्वक उतारते हैं और फिर विशाल लोहे के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। यह सुनकर हमारी उत्सुकता और बढ़ गई।
हमें तब नहीं मालूम था कि अगले दिन हम जिस सरहद पर खड़े होंगे, वहां केवल दो देशों की सीमाएं नहीं दिखेंगी, बल्कि इतिहास, राजनीति, बिछड़न, उम्मीद और इंसानी रिश्तों की अनगिनत परतें भी हमारे सामने खुलेंगी। अमृतसर की उस शाम हम सबके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी और उत्साह था।
अगले दिन हमें उस सरहद तक पहुंचना था, जिसके बारे में हमने किताबों में पढ़ा था, अख़बारों में लिखा था और जिसके नाम के साथ विभाजन की असंख्य कहानियां जुड़ी हुई थीं। वाघा की ओर बढ़ते हुए हमें यह एहसास होने लगा था कि यह यात्रा केवल एक पर्यटन यात्रा नहीं रहने वाली। यह हमारे भीतर बसे इतिहास से मुलाकात की यात्रा बनने जा रही थी।

शब्द नहीं, यहां निगाहें बनाती हैं रिश्ते
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि वाघा बॉर्डर से लौटने के बाद भाई यशवंत ने एक बेहद शानदार और संवेदनशील रिपोर्ट लिखी थी। उसका शीर्षक था, “जहां आंखों से बात करते हैं दो मुल्कों के लोग”। उस दौर में यह रिपोर्ट खूब चर्चित हुई थी और पाठकों ने उसे बहुत सराहा था। दरअसल, यह शीर्षक केवल एक पत्रकार की कल्पना नहीं था, बल्कि वाघा की धरती पर महसूस की गई उस सच्चाई का बयान था, जहां सरहदें भले ही देशों को अलग कर देती हों, लेकिन इंसानी जज़्बात अब भी एक-दूसरे को पहचान लेते हैं।
वाघा की सीमा पर खड़े होकर यह एहसास बार-बार होता है कि इतिहास ने भले ही दो मुल्क बना दिए हों, मगर यादों, रिश्तों और भावनाओं की कोई सरहद नहीं होती। सीमा के दोनों ओर बैठे लोग एक-दूसरे को देखते हैं, हाथ हिलाते हैं, मुस्कुराते हैं और कभी-कभी आंखों ही आंखों में वह सब कह जाते हैं, जिसे शब्दों में कहना संभव नहीं होता।
उस समय भी हजारों लोग प्रतिदिन वाघा-अटारी सीमा पर आयोजित होने वाले समारोह को देखने पहुंचते थे। भारत की ओर से ही नहीं, पाकिस्तान की ओर से भी बड़ी संख्या में लोग वहां मौजूद रहते थे। यह आयोजन राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक तो है ही, साथ ही आम नागरिकों के लिए एक अद्भुत सांस्कृतिक अनुभव और मनोरंजन का माध्यम भी बन चुका है।
वाघा बॉर्डर ऐतिहासिक ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है। यह वही मार्ग है जिसने सदियों से सभ्यताओं, संस्कृतियों और व्यापारिक कारवां को एक-दूसरे से जोड़ा है। पाकिस्तान का वाघा गांव लाहौर जाने वाले मार्ग पर पड़ता है, जबकि भारतीय सीमा की ओर अटारी गांव स्थित है। अमृतसर से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह सीमा आज भी उपमहाद्वीप के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में गिनी जाती है।
जब हम वहां पहुंचे तो माहौल किसी मेले से कम नहीं था। दूर-दूर तक लोगों की भीड़ दिखाई दे रही थी। देशभक्ति के गीत गूंज रहे थे। तिरंगे लहरा रहे थे और लोगों के चेहरों पर उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। ऐसा लगता था मानो पूरा देश उस शाम कुछ घंटों के लिए वाघा में सिमट आया हो।
वाघा बॉर्डर का प्रसिद्ध बीटिंग रिट्रीट समारोह किसी भव्य नाट्य प्रस्तुति से कम नहीं लगता। सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स के जवान अपने विशिष्ट अंदाज में कदमताल करते हुए आगे बढ़ते हैं। उनकी ऊंची उठती टांगें, तेज़ कदमों की गूंज और अनुशासित गतिविधियां दर्शकों को रोमांचित कर देती हैं। सूर्यास्त के समय दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज पूरे सम्मान और निर्धारित विधि के साथ नीचे उतारे जाते हैं। यह दृश्य जितना अनुशासन का प्रतीक है, उतना ही राष्ट्रीय अस्मिता का भी।
समारोह शुरू होने से पहले महिलाओं और बच्चों द्वारा देशभक्ति गीतों पर प्रस्तुत किए जाने वाले नृत्य पूरे वातावरण को जीवंत बना देते हैं। बच्चे तिरंगा लेकर दौड़ते हैं, महिलाएं राष्ट्रगीतों की धुन पर झूमती हैं और दर्शक पूरे जोश के साथ “भारत माता की जय” तथा “वंदे मातरम्” के उद्घोष करते हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान की सीमा पर भी लगभग वैसा ही उत्साह दिखाई देता है। दोनों देशों की जनता अपने-अपने राष्ट्र के प्रति गर्व से भरी होती है, लेकिन उस गर्व के बीच कहीं न कहीं एक साझा सांस्कृतिक विरासत की झलक भी दिखाई देती है।
वाघा सीमा का इतिहास स्वयं भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन की कहानी से जुड़ा हुआ है। सन् 1947 में जब ब्रिटिश शासन समाप्त हुआ और देश का विभाजन हुआ, तब यह सीमा अस्तित्व में आई। एक ओर हिंदू-बहुल भारत था और दूसरी ओर मुस्लिम-बहुल पाकिस्तान। उस विभाजन ने लाखों लोगों को विस्थापित किया, अनगिनत परिवारों को बिछड़ने पर मजबूर किया और असंख्य ऐसी कहानियां छोड़ गया, जिनकी टीस आज भी दोनों देशों की सामूहिक स्मृति में मौजूद है।
शायद यही कारण है कि वाघा केवल एक सैन्य चौकी नहीं है। यह इतिहास, राजनीति, भावनाओं और स्मृतियों का संगम भी है। यहां खड़े होकर लगता है कि सरहदें भले ही जमीन को बांट सकती हैं, लेकिन इंसानी दिलों में बसने वाली यादों को नहीं।
वाघा की यात्रा के दौरान हमने एक और महत्वपूर्ण स्थल का भी भ्रमण किया। यह स्थान पंजाब के गौरवशाली इतिहास और उसके वीर योद्धाओं की स्मृतियों को समर्पित है। यहां विभिन्न युद्धों में पंजाब के योगदान को चित्रों, कलाकृतियों और ऐतिहासिक हथियारों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय की दीवारों पर अंकित इतिहास मानो स्वयं बोलता हुआ प्रतीत होता है।
सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करती है शहीद सिख सैनिकों की स्मृति में स्थापित लगभग 45 मीटर लंबी स्टेनलेस स्टील की विशाल तलवार। सूर्य की किरणें जब उस पर पड़ती हैं तो वह केवल धातु का एक स्मारक नहीं लगती, बल्कि शौर्य, बलिदान और राष्ट्रभक्ति की एक चमकती हुई प्रतीक बन जाती है।
वाघा की उस यात्रा ने मुझे यह सिखाया कि इतिहास केवल किताबों में नहीं मिलता। कभी-कभी वह सरहदों पर खड़ा मिल जाता है, जहां दो देशों के लोग एक-दूसरे को देखते हैं और बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाते हैं। शायद इसी एहसास ने यशवंत सिंह को वह शीर्षक लिखने के लिए प्रेरित किया था, “जहां आंखों से बात करते हैं दो मुल्कों के लोग।” आज वर्षों बाद भी मुझे लगता है कि उस रिपोर्ट का शीर्षक वाघा की आत्मा को सबसे सटीक ढंग से अभिव्यक्त करता है।

परेड से अधिक बोलती हैं भावनाएं
भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों का इतिहास हमेशा उतार-चढ़ाव, तनाव और अविश्वास से भरा रहा है। दोनों देशों ने युद्ध भी देखे हैं, कूटनीतिक टकराव भी और शांति की अनेक कोशिशें भी। लेकिन इन सबके बीच एक परंपरा ऐसी है, जो छह दशकों से अधिक समय से निरंतर चली आ रही है। अटारी-वाघा सीमा पर आयोजित होने वाला दैनिक बीटिंग रिट्रीट समारोह केवल सैन्य अनुशासन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि इतिहास और वर्तमान के बीच एक जीवंत संवाद भी है।
कहा जाता है कि वर्ष 1959 से यह समारोह नियमित रूप से आयोजित किया जा रहा है। दोनों देशों के बीच चाहे कितनी भी तल्खियां रही हों, लेकिन सूर्यास्त के समय सरहद पर होने वाला यह आयोजन कभी पूरी तरह थमा नहीं। शायद इसलिए कि यह केवल सैनिकों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि दोनों देशों की जनता की भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है।
जब हम वहां पहुंचे तो विशाल दर्शक दीर्घा देशभक्त भारतीयों से खचाखच भरी हुई थी। लोग दूर-दूर से इस समारोह को देखने आए थे। कोई अपने बच्चों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने लाया था, तो कोई वर्षों से सुनी हुई इस परेड को अपनी आंखों से देखने की इच्छा पूरी करने आया था।
हम लोग भी सामने फैली उस सरहद को निहारने लगे, जिसके उस पार पाकिस्तान था। कुछ ही देर बाद देशभक्ति गीतों की धुनें वातावरण में गूंजने लगीं। बच्चे हाथों में तिरंगा लिए दौड़ रहे थे। महिलाएं राष्ट्रगान और देशभक्ति के गीतों पर थिरक रही थीं। पूरा वातावरण किसी उत्सव जैसा प्रतीत हो रहा था। फिर वह क्षण आया, जिसका सभी को इंतजार था।
सीमा सुरक्षा बल के जवान अपने विशिष्ट अंदाज में मैदान में उतरे। उनके कदमों की गूंज दूर तक सुनाई दे रही थी। दूसरी ओर पाकिस्तानी रेंजर्स भी समान जोश और अनुशासन के साथ अपनी तैयारियों में जुटे थे। सैनिक अपने पैरों को असाधारण ऊंचाई तक उठाकर मार्च करते हैं। उनकी वर्दी, उनका आत्मविश्वास और उनके चेहरे का भाव यह बताने के लिए पर्याप्त होता है कि वे केवल अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे, बल्कि उसकी अस्मिता और सम्मान के प्रतीक भी हैं।
यह जानकर आश्चर्य होता है कि इस परेड में शामिल होने वाले सैनिकों का चयन अत्यंत सावधानी से किया जाता है। उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है और उनके हर कदम, हर इशारे और हर गतिविधि में एक अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उनके लिए यह केवल एक दैनिक ड्यूटी नहीं, बल्कि राष्ट्र के सम्मान से जुड़ा दायित्व होता है।
इस पूरे आयोजन का सबसे भावुक क्षण वह होता है, जब दोनों देशों के राष्ट्रीय ध्वज एक साथ नीचे उतारे जाते हैं। सैनिक पूरी सावधानी और सम्मान के साथ झंडों को मोड़ते हैं। उस समय दर्शकों के बीच एक अनोखा मौन छा जाता है। कुछ क्षण पहले तक जो वातावरण नारों से गूंज रहा था, वह अचानक गंभीर और गरिमामय हो उठता है।
फिर सीमा द्वार खोला जाता है। दोनों देशों के सैनिक औपचारिक रूप से एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं, हाथ मिलाते हैं और अपने-अपने क्षेत्र में लौट जाते हैं। यह हाथ मिलाना भले ही कुछ सेकंड का होता है, लेकिन उसके भीतर वर्षों का इतिहास, संघर्ष और शांति की आकांक्षा समाई होती है।
इसके बाद विशाल लोहे के द्वार बंद हो जाते हैं और सूर्योदय तक सीमा औपचारिक रूप से बंद घोषित कर दी जाती है। दर्शक अपनी जगह खड़े होकर राष्ट्रगान गाते हैं। सैनिकों के सम्मान में तालियां बजती हैं। वातावरण में गर्व, सम्मान और भावुकता का ऐसा मिश्रण घुल जाता है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है।
हम लोगों ने उस दिन बीटिंग रिट्रीट समारोह को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे महसूस भी किया। सच कहूं तो जीवन में कुछ अनुभव ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी सूची में दर्ज नहीं किया जा सकता। वाघा बॉर्डर का यह समारोह मेरे लिए उन्हीं अनुभवों में से एक है।
उस दिन लौटते समय हमने खालसा कॉलेज की भव्य इमारत को भी देखा। ब्रिटिश, मुगल और सिख स्थापत्य कला का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती यह इमारत पंजाब की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक प्रतीत होती है। दूर से देखने पर ही उसकी भव्यता मन को आकर्षित कर लेती है।
इसके अलावा पुल कंजारी का ऐतिहासिक क्षेत्र भी इस मार्ग की विशेष पहचान है। महाराजा रणजीत सिंह के समय की स्मृतियों को संजोए यह स्थान आज भी पंजाब के गौरवशाली इतिहास का साक्षी बना खड़ा है। हरे-भरे खेतों के बीच स्थित यह क्षेत्र इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यहां खड़े होकर दूर तक फैली सीमा की बाड़ दिखाई देती है और महसूस होता है कि इतिहास कभी पूरी तरह अतीत नहीं होता, वह वर्तमान के साथ-साथ चलता रहता है।
समारोह के बाद हमने एक स्थानीय ढाबे पर पंजाबी भोजन का भी आनंद लिया। सरसों के साग की खुशबू, तंदूरी रोटियों की गर्माहट और पंजाबी मेहमाननवाजी की आत्मीयता ने पूरे दिन की थकान दूर कर दी। शायद पंजाब की मिट्टी की यही खूबी है कि वह अपने पास आने वाले हर व्यक्ति को अपनापन दे देती है।
उस रात अमृतसर लौटते समय हमारी बातचीत का विषय केवल परेड नहीं थी। हम इतिहास, विभाजन, राष्ट्रवाद, पत्रकारिता और इंसानी रिश्तों पर चर्चा कर रहे थे। सड़क के दोनों ओर फैले खेत अंधेरे में खोते जा रहे थे, लेकिन मन के भीतर वाघा की वह शाम लगातार उजली होती जा रही थी।
आज इतने वर्षों बाद भी जब उस यात्रा को याद करता हूं, तो सैनिकों के ऊंचे उठते कदमों से अधिक मुझे वह क्षण याद आता है, जब दोनों देशों के झंडे एक साथ नीचे उतारे जा रहे थे। उस क्षण ऐसा लगा था मानो सरहदें अपनी जगह मौजूद हैं, लेकिन आसमान अब भी दोनों देशों के ऊपर एक ही है।
वाघा की उस शाम को बीते वर्षों हो गए, लेकिन स्मृतियों के पन्नों पर वह आज भी उतनी ही ताज़ा है। सरहद पर लहराते झंडे, सैनिकों के दृढ़ कदम, दर्शकों का उत्साह और उस पार बैठे अनजान चेहरों की खामोश निगाहें-सब कुछ आज भी मन के किसी कोने में जीवित है।
यह यात्रा केवल अमृतसर से वाघा तक की दूरी तय करने की यात्रा नहीं थी, बल्कि इतिहास, पत्रकारिता, दोस्ती और मानवीय भावनाओं के कई अनछुए आयामों से साक्षात्कार की यात्रा भी थी। शायद यही वजह है कि वाघा की वह शाम एक घटना नहीं, बल्कि एक ऐसी याद बन गई है, जो समय के साथ और अधिक अर्थपूर्ण होती चली गई।
अमृतसर की गलियां, पत्रकारिता के वे सुनहरे दिन
वाघा बॉर्डर की रोमांचक और भावनात्मक यात्रा के बाद जब हम अमृतसर लौटे तो मन अभी भी सरहद के दृश्यों में उलझा हुआ था। अमृतसर केवल सीमा का शहर नहीं है। यह इतिहास, आस्था, संघर्ष और इंसानी जज़्बातों का ऐसा नगर है, जहां हर गली अपने भीतर एक कहानी समेटे हुए है।
मुझे याद है, अगले दिन सुबह हम लोग अमृतसर की गलियों में निकल पड़े थे। उन दिनों आज जैसी चकाचौंध नहीं थी। शहर की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी थी, लेकिन उसके भीतर एक अद्भुत आत्मा बसती थी। संकरी गलियों में चलते हुए ऐसा लगता था जैसे इतिहास हमारे साथ-साथ चल रहा हो। कहीं तंदूर पर सिकती कुल्चों की महक थी, कहीं लस्सी के बड़े-बड़े गिलास लोगों का स्वागत कर रहे थे। दुकानदारों की आवाजों में पंजाबी अपनापन था और राहगीरों के चेहरों पर एक सहज मुस्कान।
अमृतसर की असली पहचान उसकी जीवंतता है। यह शहर आपको बाहों में भर लेने की कला जानता है। यहां आने वाला व्यक्ति पर्यटक नहीं रह जाता, मेहमान बन जाता है। इन्हीं गलियों से गुजरते हुए हम पहुंचे श्री हरमंदिर साहिब, जिसे दुनिया स्वर्ण मंदिर के नाम से जानती है।
उस दिन की सुबह आज भी मेरी स्मृतियों में अक्षुण्ण है। जैसे ही हमने मंदिर परिसर में प्रवेश किया, भीतर एक अनकही शांति उतरने लगी। बाहर की दुनिया का शोर जैसे पीछे छूट गया। संगमरमर के विशाल प्रांगण में नंगे पांव चलते हुए एक अलग ही अनुभूति हो रही थी।
सरोवर के मध्य स्थित स्वर्ण मंदिर की सुनहरी आभा सूर्य की किरणों में ऐसे चमक रही थी मानो जल के ऊपर कोई स्वप्न तैर रहा हो। चारों ओर गूंजता गुरुबाणी का मधुर स्वर वातावरण को अलौकिक बना रहा था। मैंने अनेक धार्मिक स्थलों की यात्राएं की हैं, लेकिन स्वर्ण मंदिर में जो आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस हुई, वह कुछ अलग ही थी। वहां धर्म से अधिक मानवता दिखाई देती है। वहां कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। कोई अमीर-गरीब नहीं होता। सब एक ही कतार में बैठकर लंगर ग्रहण करते हैं और यही इस स्थान की सबसे बड़ी खूबी है।
राजीव सिंह लंबे समय तक सरोवर के किनारे बैठे रहे। उनकी आंखों में एक गहरी गंभीरता थी। वे कम बोलते थे, लेकिन उस दिन उन्होंने इतना अवश्य कहा था, “शायद यही वह जगह है, जहां इंसान खुद से मिल सकता है।”
यशवंत सिंह का स्वभाव हमेशा से जिज्ञासु रहा है। वे हर दृश्य के भीतर छिपी कहानी खोज लेते थे। स्वर्ण मंदिर परिसर में भी वे लोगों से बातचीत करते रहे। कोई पंजाब से आया था, कोई राजस्थान से, कोई बिहार से। हर व्यक्ति की अपनी कथा थी और यशवंत उन कथाओं को सुनने में गहरी रुचि लेते थे। शायद यही गुण उन्हें एक अलग किस्म का पत्रकार बनाता था।
पत्रकारिता दरअसल खबरों से अधिक मनुष्यों को समझने की कला है। यशवंत में यह कला स्वाभाविक रूप से मौजूद थी। उन दिनों पत्रकारिता का स्वरूप भी आज से बिल्कुल अलग था। न मोबाइल इंटरनेट था, न सोशल मीडिया का दबाव। खबरों की तलाश के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता था। लोगों से मिलना पड़ता था। धूल फांकनी पड़ती थी। कई बार पूरी रात जागकर काम करना पड़ता था।
जालंधर संस्करण के शुरुआती दिनों में हम सब एक मिशन की तरह काम कर रहे थे। सुबह निकलते तो देर रात लौटते। कभी किसी कस्बे में वितरण व्यवस्था देखनी होती, कभी किसी बाजार में पाठकों की प्रतिक्रिया जाननी होती। कई बार तो पूरा दिन यात्रा में ही बीत जाता। लेकिन उन कठिन दिनों में भी एक अद्भुत आनंद था।
शाम को जब हम गेस्ट हाउस लौटते तो दिनभर के अनुभवों का आदान-प्रदान होता। कोई नई खबर सुनाता, कोई किसी रोचक व्यक्ति से हुई मुलाकात का जिक्र करता। गीत-गवनई होती तो कभी-कभी पीने-पिलाने का दौर भी चलता। कई बार पत्रकारिता पर गंभीर बहसें होतीं और कई बार माहौल पूरी तरह मस्ती में बदल जाता।
यशवंत सिंह का गीत-संगीत प्रेम उन शामों की सबसे बड़ी पूंजी था। वे कभी लोकगीत गाने लगते तो कभी पुराने फिल्मी नगमे। उनकी आवाज में पेशेवर गायकी नहीं थी, लेकिन आत्मीयता भरपूर थी। हम सब देर रात तक सुनते रहते।
मैं स्वयं उन दिनों पंजाब को समझने की कोशिश कर रहा था। पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, सीखने का माध्यम भी थी। गांवों, कस्बों, खेतों, गुरुद्वारों और बाजारों में घूमते हुए मुझे एहसास हुआ कि पंजाब को केवल अखबारों की सुर्खियों से नहीं समझा जा सकता। उसके लिए उसकी मिट्टी की खुशबू महसूस करनी पड़ती है। अमृतसर में बिताए गए वे दिन इसी सीख का हिस्सा थे।
स्वर्ण मंदिर की शांति, वाघा बॉर्डर का उत्साह, जालंधर के संघर्षपूर्ण दिन और साथियों का स्नेह-ये सब मिलकर उस दौर को मेरी स्मृतियों का सबसे उजला अध्याय बना देते हैं। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि हम केवल अखबार नहीं निकाल रहे थे, बल्कि जीवन के विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। हर दिन एक नया पाठ था, हर यात्रा एक नया अध्याय और हर मुलाकात एक नई कहानी। शायद इसी वजह से सन् 1999 का वह पंजाब आज भी मेरी स्मृतियों में केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव की तरह मौजूद है।
अमृतसर की यात्रा भला जलियांवाला बाग गए बिना कैसे पूरी हो सकती थी। स्वर्ण मंदिर की आध्यात्मिक शांति से निकलकर जब हम जलियांवाला बाग पहुंचे तो लगा मानो इतिहास का एक बिल्कुल अलग चेहरा हमारे सामने खड़ा हो। वहां प्रवेश करते ही सबसे पहले एक अजीब-सी खामोशी महसूस होती है। आसपास लोग होते हैं, पर्यटक होते हैं, लेकिन फिर भी वातावरण में एक ऐसा मौन पसरा रहता है, जो भीतर तक उतर जाता है। शायद इसलिए कि उस मिट्टी में हजारों अधूरी चीखें दफ्न हैं।
13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन जो कुछ यहां हुआ, वह भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक है। जब हम उन दीवारों के सामने खड़े हुए, जिन पर गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं, तो मन अनायास ही उस दौर में पहुंच गया। वह कुआं, जिसमें अपनी जान बचाने के लिए लोग कूद गए थे, केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि औपनिवेशिक क्रूरता का जीवित दस्तावेज है।
मैंने देखा कि राजीव जी और यशवंत जी काफी देर तक उन गोलियों के निशानों को निहारते रहे। शायद इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे होते हैं, जिनके सामने शब्द छोटे पड़ जाते हैं। जलियांवाला बाग से बाहर निकलने के बाद हमारी चर्चा केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रही। बात विभाजन तक पहुंच गई। आखिर पंजाब वह धरती है जिसने स्वतंत्रता का उत्सव भी देखा और विभाजन का सबसे बड़ा दर्द भी झेला।
उन दिनों पंजाब में यात्रा करते हुए अक्सर ऐसे बुजुर्ग मिल जाते थे, जिनकी आंखों में विभाजन की स्मृतियां अब भी ताजा थीं। कोई लाहौर छोड़कर आया था, कोई गुजरांवाला से, कोई रावलपिंडी से। उनके पास घरों, गलियों, दोस्तों और रिश्तेदारों की अनगिनत कहानियां थीं जो सरहद के उस पार छूट गए थे। एक शाम हम लोग अमृतसर में स्वेटर खरीदने निकले। एक बुजुर्ग सरदार जी से हमारी हुई। बातचीत के दौरान उन्होंने अचानक कहा था, “पुत्तर, साड्डा पिंड हुण पाकिस्तान विच ऐ, पर सपने अज्ज वी ओथों दे ही आउंदे ने।”
यह वाक्य आज भी मेरे मन में अंकित है। दरअसल, विभाजन केवल जमीन का बंटवारा नहीं था। वह स्मृतियों, रिश्तों और भावनाओं का भी विभाजन था। पंजाब की धरती पर घूमते हुए यह एहसास बार-बार होता था कि यहां की मिट्टी में आज भी बिछड़न की एक हल्की-सी नमी मौजूद है। इन्हीं यात्राओं के बीच हमारी पत्रकारिता की असली परीक्षा भी चल रही थी।
‘अमर उजाला” का जालंधर संस्करण उस समय एक नई शुरुआत था। पंजाब के हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाना आसान काम नहीं था। पहले से स्थापित अखबार मौजूद थे। पाठकों की अपनी पसंद थी। वितरण की चुनौतियां थीं। संसाधन सीमित थे और अपेक्षाएं बहुत बड़ी। शायद संघर्ष ही किसी नई शुरुआत की असली पूंजी होता है।
मुझे याद है कि कई बार हम किसी छोटे-से चायखाने पर रुक जाते थे। वहां स्थानीय लोगों से बातचीत करते। उनसे पूछते कि वे अखबार में क्या पढ़ना चाहते हैं? कौन-सी खबरें उन्हें आकर्षित करती हैं? किस तरह की भाषा उन्हें अपनी लगती है? आज के दौर में इसे मार्केट रिसर्च कहा जाएगा, लेकिन तब यह सब केवल संवाद और आत्मीयता के आधार पर होता था।
इन यात्राओं के दौरान रामेश्वर पांडेय जी और भाई श्रीकांत अस्थाना जी का नेतृत्व हम सबके लिए सबसे बड़ी ताकत था। वे केवल संपादकीय टीम के नेतृत्वकर्ता ही नहीं, बल्कि एक शिक्षक, मार्गदर्शक और अभिभावक भी थे। उनकी कार्यशैली बेहद अनुशासित थी। खबरों के प्रति उनकी दृष्टि स्पष्ट थी। वे अक्सर कहा करते थे कि अखबार की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। प्रसार बढ़ाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है पाठकों का विश्वास जीतना।
कई बार हम लोग थक जाते, लेकिन पांडेय जी का उत्साह कम नहीं होता था। वे हर चुनौती को अवसर की तरह देखते थे। किसी नए क्षेत्र में वितरण की समस्या हो या स्थानीय खबरों का नेटवर्क खड़ा करना हो, वे हमेशा समाधान खोजने की बात करते थे। उनके नेतृत्व में हमने सीखा कि पत्रकारिता केवल खबर लिखने का काम नहीं है। यह समाज को समझने, लोगों के बीच जाने और उनकी धड़कनों को महसूस करने की प्रक्रिया है।
गेस्ट हाउस में लौटने के बाद अक्सर देर रात तक बतकही का दौर चलता था। दिनभर के अनुभव साझा किए जाते। अगले दिन की योजना बनती। कभी किसी खबर पर बहस होती, तो कभी किसी शीर्षक को लेकर चर्चा। मैं और यशवंत सिंह अक्सर हर अनुभव में नई कहानी की तलाश किया करते थे। हम दोनों के भीतर का पत्रकार और लेखक हमेशा सक्रिय रहता था।
पंजाब के गांवों की पगडंडियां, सरसों के खेत, गुरुद्वारों की शांति, ढाबों की गर्मजोशी, विभाजन की कहानियां और पत्रकारिता के संघर्ष-सब मिलकर मेरे भीतर एक नया लेखक और पत्रकार गढ़ रहे थे। वह समय संघर्ष का था, लेकिन उसमें अपनापन था। वह समय अभाव का था, लेकिन उसमें सपने थे। वह समय मेहनत का था, लेकिन उसमें दोस्ती की गर्माहट भी थी।
शायद यही वजह है कि आज भी जब जालंधर, अमृतसर या वाघा का नाम सुनता हूं, तो सबसे पहले किसी शहर की नहीं, बल्कि उन लोगों की याद आती है, जिनके साथ हमने जीवन का वह खूबसूरत और संघर्षपूर्ण सफर तय किया था।
तीन महीने बाद हम मेरठ लौट गए। धीरे-धीरे परिस्थितियां बदलीं। लोगों की नियुक्तियां बदलीं। जिम्मेदारियां बदलीं। कोई दूसरे शहर चला गया, कोई किसी नए संस्करण से जुड़ गया और कोई अपने जीवन की नई दिशा तलाशने लगा। जो लोग कल तक एक ही छत के नीचे रहते थे, एक ही मेज पर खाना खाते थे और देर रात तक पत्रकारिता के सपने देखा करते थे, वे अलग-अलग दिशाओं में चले गए। जीवन का यही सबसे बड़ा सत्य है।
रास्ते साथ शुरू होते हैं, लेकिन मंजिलें अक्सर अलग-अलग हो जाती हैं। राजीव सिंह ने आगे चलकर संपादन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी गंभीरता, दृष्टि और संपादकीय समझ ने उन्हें हिंदी पत्रकारिता के प्रमुख संपादकों की कतार में ला खड़ा किया। यशवंत सिंह ने अपने स्वभाव के अनुरूप एक अलग राह चुनी। उन्होंने परंपरागत पत्रकारिता की सीमाओं से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। उनकी लेखनी में वही बेबाकी बनी रही, जिसे मैंने जालंधर के दिनों में पहली बार देखा था।
राजेश जेटली अपनी रचनात्मक दुनिया में आगे बढ़ते रहे और मैं भी अपनी पत्रकारिता तथा लेखन यात्राओं में नए-नए अनुभवों को समेटता चला गया। इन सबके बीच पत्रकारिता भी बदल रही थी। जिस दौर में हम पंजाब पहुंचे थे, तब खबरें खोजनी पड़ती थीं। रिपोर्टर सड़कों पर चलता था। गांवों की चौपालों में बैठता था। लोगों से बातचीत करता था। खबरें कंप्यूटर स्क्रीन पर नहीं, समाज की धड़कनों में मिलती थीं।
फिर समय बदला। इंटरनेट आया। डिजिटल मीडिया आया। सोशल मीडिया आया। खबरों की रफ्तार बढ़ी। तकनीक ने पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया। आज सूचना सेकंडों में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाती है। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि उस तेज़ रफ्तार में पत्रकारिता की वह आत्मीयता कहीं पीछे छूट गई, जो हमारे दौर की सबसे बड़ी पूंजी हुआ करती थी।
आज भी जब मैं किसी युवा पत्रकार को मोबाइल फोन पर पूरी दुनिया समेटे देखता हूं तो अनायास ही जालंधर के वे दिन याद आ जाते हैं, जब एक खबर के लिए कई-कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी, लेकिन शिकायत नहीं है।
हर दौर की अपनी जरूरतें होती हैं और हर पीढ़ी अपना रास्ता खुद बनाती है। फिर भी, स्मृतियों का अपना महत्व होता है। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि हम कहां से चले थे। कुछ समय पहले जब पुराने कागजों और तस्वीरों के बीच मुझे वाघा बॉर्डर वाली वह तस्वीर फिर दिखाई दी, तो मैं लंबे समय तक उसे देखता रहा।
तस्वीर में हम सब पंक्ति में खड़े थे। चेहरों में सौम्यता थी। मैं था, राजीव सिंह थे। यशवंत सिंह थे और राजेश जेटली थे। आखिर में सेना का जवान और एक इलाकाई पत्रकार। सच कहूं तो तस्वीर में केवल चार लोग नहीं थे। उसमें एक पूरा दौर मौजूद था। उसमें जालंधर का वह गेस्ट हाउस था, जहां रात को पूड़ियां बनती थीं। उसमें रामेश्वर पांडेय जी का स्नेहिल नेतृत्व था। उसमें पंजाब के गांवों की धूल थी। उसमें स्वर्ण मंदिर की शांति थी। उसमें जलियांवाला बाग की खामोशी थी। उसमें वाघा बॉर्डर का जोश था और उसमें पत्रकारिता के वे दिन थे, जब सपने तनख्वाह से बड़े हुआ करते थे।
तस्वीर को देखते-देखते मुझे लगा जैसे समय अचानक पीछे लौट गया हो। जैसे फिर वही दिन हों। वही दोस्त हों। वही यात्राएं हों और वही अंतहीन बातचीतें। लेकिन अगले ही क्षण यह एहसास भी हुआ कि समय लौटकर नहीं आता। लौटती हैं तो केवल यादें और शायद यादों की यही खूबसूरती है कि वे उम्र के किसी भी मोड़ पर हमें फिर से जवान बना देती हैं।
आज उन दिनों के अनेक साथी अलग-अलग शहरों में हैं। कई चेहरे वर्षों से नहीं मिले। रामेश्वर पांडेय जी इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन स्मृतियों की दुनिया में सब आज भी मौजूद हैं। जब भी जीवन की आपाधापी से थक जाता हूं, मैं उन दिनों की ओर लौट जाता हूं। जालंधर की गलियों में। अमृतसर की फिज़ाओं में। स्वर्ण मंदिर के सरोवर के किनारे और वाघा बॉर्डर की उस तस्वीर में… जहां चार साथी खड़े हैं, लेकिन उनके पीछे एक पूरा युग मुस्कुरा रहा है।
यह वृत्तांत केवल अमृतसर, अटारी या वाघा की यात्रा का दस्तावेज नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने पत्रकारिता को नौकरी नहीं, एक जुनून की तरह जिया। यह दोस्ती, संघर्ष, सपनों और स्मृतियों की वह दास्तान है, जो समय बीत जाने के बाद भी दिल के किसी कोने में रोशनी की तरह जलती रहती है। कुछ यात्राएं खत्म नहीं होतीं। वे जीवन भर हमारे भीतर चलती रहती हैं। जालंधर से वाघा तक की यह यात्रा भी मेरे लिए ऐसी ही एक अनंत यात्रा है।
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक है)
