“कान का कच्चा” शहर है बनारस
बनारस के ‘गप’ में जो मजा है, वह दुनिया के सच में भी नहीं है
@विजय विनीत
बनारस को समझना कभी आसान नहीं रहा। यह शहर किसी किताब की तरह नहीं है जिसे पन्ने पलटकर पढ़ लिया जाए। यह तो धुएं में घुली हुई एक कहानी है, पान की पीक में डूबी हुई एक स्मृति है, घाटों की सीढ़ियों पर बैठी एक चुप कविता है। इसी बनारस को जब कोई कह देता है, “कान का कच्चा शहर है बनारस,” तो यह वाक्य सुनने में जितना सरल लगता है, भीतर उतना ही गहरा और तल्ख़ सच लिए हुए है।
बनारस दरअसल वह मिट्टी है जो सुनने को देखने से ज़्यादा महत्व देती है। यहां आवाज़ें इतनी पुरानी हैं कि सिर्फ़ सुनकर ही लोग कहानी बुन लेते हैं। किसी ने चाय की दुकान पर आधी बात कही, तो दूसरी दुकान पर पहुंचते-पहुंचते वह परंपरा बन जाती है। किसी ने गलियों में चलते-चलते किसी नाम का ज़िक्र कर दिया, तो अगली सुबह वही नाम घाटों की सीढ़ियों पर चर्चा का केंद्र बन जाता है। यहां खबरें अख़बारों से नहीं-अहाते, चौक, पान की दुकानों और सुगंधित धुएं के बीच पैदा होती हैं। यही वजह है कि बनारस को ‘कान का कच्चा’ कहना उसके स्वभाव को बारीक़ी से पकड़ना है।
इस ‘कच्चेपन’ में एक मासूमियत भी छिपी है। यह शहर धोखा देने वाला नहीं है; यह तो बस जल्दी भरोसा करने वाला शहर है। यहां लोग कान से ज्यादा दिल से सुनते हैं। उनके भीतर दुनिया को जैसा है, वैसा देखने की चाह से ज्यादा दुनिया को वैसा महसूस करने की चाह रहती है। यही भावुकता कभी-कभी उन्हें ऐसी बातों पर भी यकीन करा देती है जिन्हें शहर का शोर बढ़ाकर सच का चेहरा पहना देता है। बनारस की गलियों की एक अनकही नीति है। बात अगर कही गई है तो वह आधी सच है और आधी उस सुनने वाले के अनुभवों की परत है।
बनारस के लोग किसी घटना पर राय बाद में बनाते हैं, उसकी कहानी पहले गढ़ लेते हैं। किसी ने कहा कि फलां आदमी ने यह कहा, तो बनारस तुरंत मान लेता है, “हां, उसने ऐसा ही कहा होगा। बनारस को कोई बात सुनाई दे जाए, तो वह बिना छानबीन के उसे अपनी स्मृति में जमा कर लेता है।” शायद इसी वजह से दुनिया कहती है कि बनारस कान का कच्चा है। पर यह ‘कच्चापन’ उसकी कमजोरी नहीं, उसकी आत्मा है। वह आत्मा जो किसी बात को सुनते ही उसे कहानी बना देती है, किस्सा बनाती है, अनुभव बनाती है और फिर उन अनुभवों को गंगा की धारा में बहते समय की तरह आगे बढ़ा देती है।
बनारस की यही खूबी है कि यहां लोग ‘कहानी’ सुनते हैं, ‘तथ्य’ नहीं। यही कारण है कि एक अफ़वाह भी यहां कविता बनकर फैलती है। मान लीजिए अस्सी पर बैठा कोई चायवाला कह देता है, “आज घाट पर कोई अद्भुत घटना हो गई।” चाय की भाप में उठी उस बात को पहले पवन समझता है, फिर पान की दुकान पर बैठे लोग उसे अपनी तरह से सजाते हैं और चौक तक पहुंचते-पहुंचते वही घटना आधी इतिहास और आधी मिथक बन जाती है। कोई पूछे कि सच क्या है? तो बनारस मुस्कुरा देता है, “जो तुमने सुना वही सच, जो हमने सुना वही इतिहास।”
बनारस का यही स्वभाव है। यह शहर जो सुनता है, उसे सच मान लेता है, पर यह अंधविश्वास नहीं। यह जीवन को कविता की तरह जीने का तरीका है। यहां लोग जीवन को तर्कों से नहीं, भावों से समझते हैं। वे मानते हैं कि सत्य अक्सर आवाज़ों में छिपा होता है, ठोस प्रमाणों में नहीं।
बनारस में किसी की एक फुसफुसाहट भी कभी–कभी इतिहास का मोड़ बन जाती है। अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर का चिरैया कांड इसी स्वभाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। उस समय बनारस अंग्रेज़ों के अत्याचार, पुलिसिया दमन और बेगारी से पहले ही तंग था। लोगों के भीतर अविश्वास गहरा बैठ चुका था-बस एक चिंगारी चाहिए थी। वह चिंगारी एक अफ़वाह बनकर फैली, “सरकार ने पानी में ज़हर मिला दिया है।”
बनारस की गलियों में यह खबर धुएं की तरह उठी और हवा की तरह फैल गई। यह वही शहर है जहां बात कान में नहीं, सीधे दिल में उतरती है और दिल डर जाए तो सोचने की फुर्सत नहीं देता। कुछ ही घंटे में भीड़ वाटर वर्क्स पर टूट पड़ी। किसी ने यह नहीं पूछा कि खबर कहां से आई, कैसे आई? बस यही लगा कि अंग्रेज़ अगर ज़ुल्म कर सकते हैं तो पानी में ज़हर क्यों नहीं मिलाएंगे?
गुस्से और भय से भरी भीड़ ने पाइपलाइन तोड़ दी, टंकियां फाड़ दीं, इंजीनियरों को भगा दिया। शाम तक वाटर वर्क्स एक टूटा हुआ ढांचा बन चुका था और बनारस अपनी ही आशंका का कैदी। जब अंग्रेज़ अधिकारियों ने जांच की तो सच्चाई सामने आई। न पानी में ज़हर था, न कोई षड्यंत्र। अफवाह ही असली ज़हर थी। यह घटना आज भी बनारस को आईना दिखाती है कि उसका दिल जितना सच्चा है, कान उतने ही कच्चे। कभी-कभी एक फुसफुसाहट भी इस शहर को तूफ़ान में बदल देती है।
चिरैया कांड सिर्फ़ एक अफ़वाह की कहानी नहीं, बल्कि बनारस की भावनात्मक प्रकृति, अंग्रेज़ी दमन के भय और जनविश्वास टूटने के विनाशकारी असर का सबसे जीवंत अध्याय है। इसीलिए कहा जाता है-बनारस का दिल बड़ा साफ़ है, पर कान… थोड़े कच्चे हैं। ‘चिरैया कांड’ के बाद एक अंग्रेज अफसर ने कहा था,“बनारस में अगर किसी ने तुम्हारे बारे में एक बात कह दी, तो तुम चाहे कितना भी सफाई दो, बनारस वही मानेगा जो उसने पहले ही सुन लिया है।” इस सुन लेने की प्रवृत्ति में पीढ़ियों का अनुभव, बुजुर्गों की सीख और किस्सागोई की परंपरा बसती है।
सच कहें तो बनारस ‘कान का कच्चा’ इसलिए भी है क्योंकि यह शहर भूलता नहीं। जो सुन लेता है, उसे सहेज लेता है। जिस बात को याद रख लेता है, उसे फिर समय के साथ अपने ढंग से पालता-पोसता रहता है। यही कारण है कि यहां एक बार फैली बात सालों तक जीवित रहती है। कोई किस्सा पीढ़ियों तक चलता है, कोई घटना लोककथा बन जाती है और कोई झूठ भी सच बनकर लोगों के व्यवहार में दर्ज हो जाता है। यह शहर अपने अनुभवों को इस तरह बुनता है कि हर बात में सच की झलक मिलती है, चाहे वह बात बिल्कुल आधी-अधूरी ही क्यों न हो।
बनारस का यह ‘कच्चापन’ कहीं न कहीं उसका सौंदर्य है। वह कच्चापन जो मिट्टी की सौंधी खुशबू की तरह मोह लेता है। बनारस वह शहर है जहां लोग बातों पर भरोसा करते हैं, क्योंकि उन्हें दुनिया पर भरोसा करना आता है। वह भरोसा जो आधुनिक शहरों में खो गया है, वह बनारस की गलियों में अभी भी साबुत है। यहां भले ही कोई खबर अपूर्ण हो, लेकिन उसका भाव पूरा होता है। बनारस को भावों से ज्यादा और किसी चीज़ की परवाह भी नहीं।
कभी कोई बनारसी बुजुर्ग चाय पीते हुए कह देता है, “बाबू, बनारस में कुछ भी छिपता नहीं। जो किसी ने कहा, वही पूरा मोहल्ला जानता है।” पर इसके पीछे बदनियती नहीं है। यह शहर मन के दरवाज़े खुले रखकर जीता है। वह कहता है, “अगर तुमने कुछ कहा, तो उसे सुनने का मेरा हक है और उसे अपनी तरह से समझने का मेरा स्वभाव।”
बनारस का यही स्वभाव उसे दुनिया से अलग बनाता है। वह ‘कान का कच्चा’ इसलिए है क्योंकि उसका दिल बहुत पक्का है। वह दिल जो हर बात को गंभीरता से लेता है, हर आवाज़ में कोई अर्थ ढूंढता है और हर कहानी में कोई भाव खोज लेता है।
बनारस को समझना हो तो उसके सुनने के तरीके को समझना पड़ेगा। वह सुनते हुए हंसता है, सुनते हुए सोचता है, सुनते हुए रोता है और सुनते हुए ही इतिहास बनाता है। जब आप उसके इस स्वभाव को समझ जाते हैं, तो आपको एहसास होता है कि ‘कान का कच्चा’ होना कोई दोष नहीं। यह एक संस्कृति है, एक पुरातन आदत है, एक भावनात्मक परंपरा है जिसे सदियां बदलने के बावजूद कोई मिटा नहीं पाई।
कहानी, किस्सा, अफ़वाह, गप, दंतकथा-बनारस सबको एक से प्यार देता है। शायद इसी प्यार ने इसे ऐसा बनाया है कि यहां सुनी जा चुकी बात सच से बड़ी हो जाती है। यहां कहा नहीं जाता, “किसने कहा?” बल्कि कहा जाता है, “क्या कहा?” और यही बनारस को बनारस बनाता है। आख़िर में बस इतना ही कहा जा सकता है की बनारस के ‘गप’ में जो मजा है वह दुनिया के सच में भी नहीं है। बनारस कान का कच्चा है, लेकिन दिल का सच्चा है।
