फाग, फगुआ,फगुनहटा, फुहार, फब्तियां और फक्कड़ कबीरा…!

फाग, फगुआ,फगुनहटा, फुहार, फब्तियां और फक्कड़ कबीरा…!

मनोज कुमार सिंह

अंग्रेजी महीने से इतर भारतीय जनमानस में विशेष रूप से हिन्दी हृदय क्षेत्र में प्रचलित फाल्गुन मास को हिन्दी पंचांग का आखिरी महीना माना जाता है। अलबेला, अल्हड़, मनभावन और जन-जन के मन, मस्तिष्क और हृदय को मदमस्त तथा बसंती बयार से रोम-रोम रोमांचित कर देने वाला फागुन का महीना हर बार नयी उमंग, नयी तरंग, नयी आशा, नया विश्वास और नयी उम्मीद लेकर आता है। धरती से अम्बर तक नूतन परिवेश निर्मित करने का हुनर और हौसला लिए फागुन का महीना बेहतर सामाजिक जन-जीवन के लिए प्यार-मुहब्बत की आगोश में लिपटे बेहतर संदेश लेकर आता है।

फाल्गुन का महीना अपनी आदत, फितरत और हरकतों के अनुरूप बाग-बगीचे में अमराई, लोकजीवन में अंगड़ाई, तन बदन को गुदगुदाने वाली हवा-बयार में फगुनाहट और घर-आंगन में अपनों के आने की आहट के साथ रसभरी शरारत, अल्हड़पन के साथ अपनापन और प्यासे बिछड़े दिलों में मिलन की आस लेकर आता है। बहुरंगी आनंद से पूरी तरह सराबोर इस नवरंगी मौसम वाले बसंत को ऋतुराज कहा जाता है। श्रीकृष्ण ने कुरूक्षेत्र में खड़े होकर उद्घोष किया था कि – मैं ऋतुओं में बसंत हूँ।

साहित्यकारों ने भी सबसे अधिक रचनाएँ वसंत ऋतु को समर्पित की हैं। समृद्ध भारतीय साहित्य परंपरा में भारत की लगभग समस्त भाषाओं में अनगिनत साहित्य सरिताएँ मनोहारी वसंत ऋतु की गंगोत्री से निकल कर भारतीय लोकमानस को अभिसिंचित कर रही हैं। साहित्य रस के प्यासे हृदयों को वसंत ऋतु से प्रवाहित सरिताएँ सदियों से तृप्त कर रही हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास में छक कर लगभग एक माह तक वसंतोत्सव मनाने का उल्लेख मिलता है।

“ॠतुराज बसंत के शुभागमन से ही बसुंधरा का प्राकृतिक श्रृंगार और सौंदर्य अपनी पराकाष्ठा पर होता है। सम्पूर्ण लोक-जीवन बसंत की मादक बयारों के मधुर स्पर्श से गहरे रूप से स्पन्दित होने लगता है। प्रकृति के अद्भुत श्रृंगार और सतरंगी सौंदर्य में हर चंचल मन रंगने लगता है। सृष्टि और प्रकृति का स्वर, व्यंजन और व्याकरण पूरी तरह नवलता के कलेवर में ढल जाता है। बाग-बगीचे, खेत खलिहानों में चहकते पक्षियों, और महकते फूलों से मधुर संगीत झंकरित होने लगता है। पेड़-पौधों की लचकती, बहकती और झूलतीं डालियों में मन मस्तिष्क को उमंगित करने वाला नृत्य प्रस्फुटित होने लगता है। बच्चे, बुढ़े, जवान, अनपढ़, गंवार बुद्धिमान, शहरी, देहाती, और लगभग हर नर-नारी अपना शाफ़ाई चोला ताखा पटनी पर रख देते हैं तथा सादगी और भलमनसाहत को खूंटी पर टांग देते हैं। चेहरे पर झुर्रियाँ और मुंह में दांत नहीं, पर हमारे अपने घर-घराने, कुटुंब, कबीले, कुल-खानदान के बूढ़े बुजुर्ग, दादा, परदादा, काका, चाचा भी अपने हम-उम्र हमजोली, आस-पड़ोस, गाँव-देहात, टोला मुहल्ला की काकी, दादी, परदादी और अपने समकक्ष वृद्ध महिलाओं को देखकर फब्तियाँ कसें बिना नहीं रहते हैं। अपने पारिवारिक गवैया, रिश्तों-नातों की बुनियाद पर बोलीं-टिबोली बोलना पारंपरिक हक़ है। इस अल्हड़, अलबेले, और मदमस्त मौसम का मिजाज उम्र-दराज बुढ़े-बुजुर्गों में बुढ़ापे की सिहरन तथा थकन को अचानक आश्चर्यजनक तरीके से मिटा देता है। इस बसंती बयार और फागुनी बहार में हर नर-नारी के अंदर हम-उम्र और हमजोली संग छिछोरापन करने का अद्भुत जोश और जुनून आ जाता है। ऋतुओं और मौसमों को ध्यान में रखकर बनाये गए हर तीज-त्योहारों और उत्सवों को आम हिन्दुस्तानी पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं।

इधर कुछ वर्षों से आम जनमानस में यह धारणा तेजी से प्रचलित होती जा रही है कि – फगुआ का त्योहार पूरी तरह से मौज-मस्ती और आनंद का त्योहार है। बढ़ती उच्चरणता के दौर में लोगों के मन-मस्तिष्क में यह धारणा घर बनती जा रही है कि इसमें किसी के साथ किसी भी तरह का व्यवहार और वर्तन करने की पूरी आजादी है। जनमानस में व्याप्त इस धारणा के कारण फगुआ का असली उद्देश्य और संदेश हमारे लोकमानस के मन-मस्तिष्क और मानसिक चिंतन और विचार-विमर्श से कोसों दूर हो गया है। फगुआ नाचने, गाने, झूमने, मौज-मस्ती और आनंद लेने के साथ-साथ हिरण्यकश्यप, होलिका जैसे दुराचारियों, दम्भियों, और अहंकारियों की दूषित, प्रदूषित और कलुषित व्यक्तित्वों के नाश की भी प्रेरणा है। भारतीय परंपरा में होली, होलिका, और हिरण्यकश्यप जैसे अनगिनत दुष्कर्मियों के अन्दर विविध प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों के नाश की कामना तथा भारतीय लोकविचार में महिमामण्डित भक्त प्रह्लाद जैसे भक्ति भावना रखने वाले दृढ़निश्चयी, सत्यवादी, और सच्चरित्र व्यक्तित्वों को स्मरण करते हुए और उनसे प्रेरित और प्रेरित होने का पवित्र-पावन त्योहार है।

होलिका दहन के साथ-साथ हमें अपने मन-मस्तिष्क और हृदय में घर बना चुके ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, अहंकार, और क्रूरता जैसे मनोविकारों को जलाकर भस्म कर देना चाहिए और हमारे आचरण, व्यवहार, और आदतों में समाहित दुर्व्यसनों और दुर्व्यवहारों को जड़मूल से समाप्त कर देना चाहिए। और यही होलिका दहन का मौलिक और वास्तविक निहितार्थ और निष्कर्ष है। आग में न जलने का वरदान प्राप्त होलिका हिरण्यकश्यप द्वारा प्रह्लाद को जलाने के लिए सजाई गई अग्नि चीता में जलकर खाक हो गई और भक्त प्रह्लाद सकुशल बच गया। वस्तुतः सच्चाई, सत्यवादी, नैतिकता, पवित्रता, और निर्मलता कभी किसी आग से नहीं जलती और झूठ, फरेब, छल, कपट, मक्कारी, धूर्तता, और ढोंग की उम्र हर सभ्य और सुसंस्कृत समाज में बहुत कम होती है। और इस तरह की मानसिकताएं अंततः जलकर खाक ही जाती हैं।

होली की पूर्व संध्या पर होलिका दहन का चलन-कलन इसलिए प्रचलित हुआ कि-हर्ष उल्लास उमंग आशा और विश्वास जैसे विविध रंगों से परिपूर्ण रंगों का त्यौहार होली ईर्ष्या द्वेष घृणा अहंकार क्रूरता जैसे समस्त मनोविकारों को पूरी तरह मिटाकर विविध प्रकार के रिश्तों नातों में अंतर्निहित मधुरता का एहसास करने और हर किसी को एहसास कराने के साथ मनाया जाय। फगुआ का त्यौहार टूटे छूटे भूले भटके सभी रिश्तों नातों को याद करते हुए सबसे गले मिलने का त्यौहार है। इसलिए  होली के एक दिन पूर्व  होलिका दहन के अग्नि कुंड में हम अपने समस्त मनोविकारों दुर्गुणो दुर्व्यसनो को जला देते हैं तथा किसी भी प्रकार दुश्मनी को भुलाकर और किसी भी तरह की  दुर्भावना मिटाकर हर्षित हृदय से होली  मनाते हैं। किसी के जीवन में मस्ती और आनंद जरूरी है परन्तु सबके जीवन में मस्ती और आनंद तभी आयेगा जब हंसी ठिठोली और मौज मस्ती का तौर-तरीका अनुशासित मर्यादित और हमारी संस्कृति और सभ्यता के दायरे में हो। यह सर्वविदित है कि-हमारा देश पूरी दुनिया में उत्सवधर्मी देश के रूप में जाना जाता रहा है और लोग-बाग यहाँ हर उत्सव छक कर मनाते हैं परन्तु अश्लीलता और फूहडता हमारे तीज त्यौहारों और उत्सवों का हिस्सा कभी नहीं रहें । हमारे पुरबिया माटी में मस्ती के साथ- साथ लोग-लुगाई अपने अपने मीठे रिश्तो नातों को याद करते हैं। पुरबिया माटी के गाँवो और अर्द्ध ग्रामींण और अर्द्ध शहरी संस्कृति वाले  कस्बों में ढोल झाल करताल मृदंग मंजीरा के साथ लगभग एक महीना मस्ती के फाग और चौताल गाते हैं।

हमारे गाँवों में फगुआ और फाग गाने का प्रचलन बहुत पुराना है। फाग और चौताल सहकार समन्वय साहचर्य और सहिष्णुता के साथ-साथ स्वस्थ्य मनोरंजन का साधन रहा है। हमारी देशी लोक संगीत, लोक नृत्य और लोक साहित्य की मिठास भरी परम्परा में फगुआ, फाग और चौताल को मस्ती के साथ मिलन-जुलन का लोक संगीत और लोक नृत्य माना जाता है। आजकल सिल्वर स्क्रीन द्वारा लगातार प्रसारित पॉप और रॉक संगीत के साथ, गाँवों और कस्बों में तेजी से बढ़ती आर्केस्ट्रा और डीजे संस्कृति के कारण मस्ती और मिलन की लोक संस्कृति को जीवंत रखने वाले फगुआ, फाग और चौताल पर गहरा संकट आया है। अपनी मिट्टी की महक को संभाले रखने के लिए फगुआ, फाग और चौताल को जीवंत रखने की आवश्यकता है। क्योंकि लोक संगीत और लोक साहित्य के माध्यम से लोगों का दुःख, दर्द, हर्ष, विषाद, सम्पूर्ण लोक जीवन अभिव्यक्त होता है।

मध्ययुगीन भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाएँ, कुरीतियाँ, अंधविश्वास, रूढ़ियाँ और सभी प्रकार की धूर्तता के रूप में लगे झाड़-झंखाड़ पर सबसे करारा प्रहार कबीर ने किया। कबीर ने कर्मकांडों और पाखंडों पर तार्किक, बौद्धिक और दूरदर्शितापूर्ण हमला किया। होली के दिन लोगों की टोली साज-बाज के इस मध्ययुगीन क्रांतिकारी फक्कड़ कवि कबीर का नाम लेकर कबीरा और जोगीरा गाते रहते हैं। वास्तव में, अनपढ़ कबीर अपने समय के सामाजिक संचेतना के सबसे प्रखर और उत्कट दार्शनिक थे। जिन्होंने दाकियानूसी ख्यालों और धूर्तता पर आधारित कर्म-काण्डों पर निर्भीकता से प्रहार करते हुए मानवता, मानव समाज और मानवीय जीवन की सच्चाइयों और वास्तविकताओं को लोगों के सामने प्रस्तुत किया। कबीरा गाते हुए लोग शायद अन्दर और बाहर की हकीकतों से लोगों को रूबरू कराने का प्रयास करते रहते हैं और लोक जीवन को आनंदित और आन्दोलित करते रहते हैं।

सर्वविदित सच्चाई है कि हमारा समाज अपने समाज के नैतिक मूल्यों, आदर्शों, मान्यताओं और सच्चाइयों को लेकर सर्वदा सजग, सचेत और आन्दोलित रहेगा, वही समाज वास्तव में आनंदित रहेगा। फक्कड़ कबीर का जीवन सीसे की तरह आर-पार दिखने वाला जीवन था। आज तथाकथित बाजारवादी सभ्यता और संस्कृति के दौर में लोग ढोंग, ढकोसला का जीवन जी रहे हैं। ढोंग और ढकोसला पर आधारित नकली और बहुरुपिया जीवन जीने वाले लोग तनाव और बिमारियों की चपेट में आते जा रहे हैं। स्वस्थ और प्रसन्नचित्त जीवन के लिए ज़रूरत है साफ, सुथरा, वास्तविक और फक्कड़ कबीर की तरह पारदर्शी जीवन जीने की। खैर, मेरी तरफ से आपको, सभी को और समस्त देशवासियों को कबीरा सा..रा…रा…।

(लेखक मऊ जिले के जाने-माने लेखक एवं साहित्यकार हैं)

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