कुशवाहा कांत की विरासत और बिखरता लफ़्ज़ों का कारवां…!
जिस कलम ने लाखों दिलों को छुआ, वही आज वक्त की गर्द में कहीं दबती हुई, ख़ामोश सी महसूस होती है
@ विजय विनीत
एक वक़्त था जब किताबें सिर्फ कागज़ पर छपे अक्षर नहीं, बल्कि दिलों की धड़कन हुआ करती थीं। हर नया उपन्यास एक त्योहार की तरह आता था और पाठक उसे पाने के लिए बेताब रहते थे। आज वही किताबें ख़ामोशी की चादर ओढ़े किसी कोने में सिसक रही हैं। कुशवाहा कांत की विरासत इस बदलते दौर की सबसे दर्दनाक दास्तान सुनाती है। जहां कभी लफ़्ज़ों का कारवां रौशन था, वहीं अब पढ़ने की रौशनी धीरे-धीरे बुझती नजर आ रही है।
बनारस के कुशवाहा कांत हिंदी उपन्यास जगत के वो नाम हैं, जिनकी शख्सियत में बग़ावत, रुमानियत और समाज की सच्चाई एक साथ धड़कती थी। 9 दिसंबर 1918 को मिर्जापुर के महुवरिया में जन्मे इस लेखक ने महज 25 साल की उम्र में साहित्य की दुनिया में ऐसा मुकाम हासिल कर लिया था, जहां पाठकों की दीवानगी अपने चरम पर थी। 1940 से 1950 के दशक के बीच उनके उपन्यासों ने पूरे उत्तर भारत में धूम मचा दी थी।
उनकी चर्चित कृतियां ‘लाल रेखा’, ‘विद्रोही सुभाष’, ‘परदेशी’, ‘जंजीर’ और ‘लाल किले की ओर’ जैसी रचनाएं न सिर्फ बेस्टसेलर थीं, बल्कि उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। ‘लाल रेखा’ की लोकप्रियता का आलम यह था कि कई गैर-हिंदी भाषी लोगों ने सिर्फ इस उपन्यास को पढ़ने के लिए हिंदी सीखी। बनारस के जालपा स्थित चिनगारी प्रकाशन के बाहर उनकी किताबें खरीदने के लिए भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस तक लगानी पड़ती थी।
उम्र 33 बरस, 36 उपन्यास
कुशवाहा कांत ने महज 33 साल की उम्र तक करीब 36 उपन्यास लिख डाले। उनकी रचनाओं में रोमांस, रहस्य, राष्ट्रवाद और सामाजिक सरोकारों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। वे सिर्फ उपन्यासकार ही नहीं, बल्कि विचारक भी थे जिन्होंने अपनी लेखनी से सामाजिक कुरीतियों और जातीय भेदभाव पर भी प्रहार किया।
यह वो दौर था जब किताबें सिर्फ पढ़ी नहीं जाती थीं, जी ली जाती थीं। वही दौर था जब उपन्यास सम्राट कुशवाहा कांत का नाम हर पाठक की ज़ुबान पर था। उनके उपन्यास और कहानियां घर-घर में पहुंचती थीं और उनके किरदार लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाते थे। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो वह समय किसी सुनहरे ख़्वाब की तरह लगता है जो धीरे धीरे हमारी पकड़ से फिसलता चला गया।
29 फरवरी को हमला, 12 मार्च को मौत
कुशवाहा कांत की जिंदगी जितनी रोशन थी, उनका अंत उतना ही रहस्यमय और दर्दनाक रहा। 29 फरवरी 1952 को रामकटोरा स्थित रामकुंड के पास उन पर जानलेवा हमला किया गया और 12 मार्च 1952 में कबीरचौर स्थित अस्पताल में उनकी असमय मौत हो गई। होली के दिन उन्होंने अंतिम सांस ली। यह मर्डर मिस्ट्री आज भी अनसुलझी है और बनारस की फिजा में एक ख़ामोश सवाल की तरह तैरती रहती है।
कुशवाहा कांत की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनके निधन के बाद भी लगभग तीन दशकों तक उनके उपन्यासों की धूम बनी रही। यह कोई साधारण बात नहीं थी। एक लेखक के दिवंगत होने के बाद भी उसकी लेखनी का जीवित रहना इस बात का प्रमाण है कि उसने अपने समय को नहीं, बल्कि समय से परे कुछ रचा था।
आज हालात बदल चुके हैं। जिस चिनगारी प्रेस से कभी बेस्टसेलर उपन्यासों की खुशबू निकलती थी, आज वही प्रेस तंगहाली और संघर्ष की दास्तान सुना रहा है। चार मशीनों की गूंज अब दो मशीनों की थकी हुई आवाज़ में सिमट गई है।
यह केवल एक चिनगारी प्रेस की कहानी नहीं, उस बदलते समाज का आईना है, जिसमें शब्दों की जगह स्क्रीन ने ले ली है। जहां कभी एक उपन्यास लाखों में बिकता था, वहीं आज तीन सौ प्रतियां छपवाना भी किसी जंग जीतने जैसा हो गया है।
बुझती लौ के आखिरी चिराग
इसी विरासत के बीच सजल कुशवाहा का नाम उभरता है जो इस बुझती हुई लौ के आखिरी चिराग नजर आते हैं। उन्होंने अपने युवा काल में लगभग बाईस उपन्यास लिखे। यह संख्या अपने आप में एक जुनून की कहानी कहती है। उनके लेखन में रुमानियत की नरमी भी थी और देशभक्ति की तपिश भी। जैसे किसी शाम के आसमान में सूरज की लालिमा और चांद की ठंडक एक साथ उतर आए हों।
सजल कुशवाहा केवल एक लेखक नहीं हैं, वे उस परंपरा के उत्तराधिकारी हैं जिसमें शब्दों को साधना की तरह जिया जाता था। उनके बड़े पिता कुशवाहा कांत और उनके पिता जयंत कुशवाहा दोनों ही साहित्य के साधक थे। ऐसे परिवेश में पले बढ़े सजल के लिए लेखन कोई सीखी हुई कला नहीं, बल्कि सांस लेने जैसा स्वाभाविक अनुभव था। मुलाकात हुई तो वो कई मुद्दों पर खुलकर बोले, लेकिन उनकी मौत की मिस्ट्री पर उनकी जुबान बंद रही।
सजल सिर्फ इतना कहते हैं, “यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक युग का अंत था। एक ऐसा युग, जिसमें शब्दों की कद्र थी, किताबों की महक थी और पढ़ने का एक अलग ही आनंद था। आज जब हम इस बदलते समय के बीच खड़े हैं तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं या कहीं कुछ पीछे छूट रहा है। तकनीक ने हमें बहुत कुछ दिया है, लेकिन क्या उसने हमसे कुछ छीन भी लिया है?”
उनका लेखन कल्पना की उड़ान भरता था, लेकिन उसकी जड़ें ज़मीन में गहराई तक धंसी होती थीं। उन्होंने जीवन को केवल देखा नहीं, जिया था। और यही कारण है कि उनके उपन्यासों में जो सच्चाई दिखती है वह पाठक को भीतर तक छू जाती है।
इंसान वही लिख सकता है जो उसने महसूस किया हो। यह बात सुनने में जितनी सरल लगती है उतनी ही गहरी है। आज के समय में हम बहुत कुछ देखते हैं, लेकिन बहुत कम महसूस करते हैं। शायद यही वजह है कि आज के साहित्य में वह गहराई कम होती जा रही है जो पहले सहज रूप से मिल जाती थी।
पेश है बनारस के पुराने उपन्यासकार सजल कुशवाहा से बातचीत के प्रमुख अंशः

प्रश्न: जब कुशवाहा कांत जी ने उपन्यास लिखना शुरू किया तब उनकी उम्र क्या रही होगी? उन्हें उपन्यास लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?
उत्तर: पिता और परिवार का संस्कार उनके लेखन की नींव बना। जीवन के करीब 33 साल तक उन्होंने समाज के अनुभवों को गहराई से आत्मसात किया और उसे ही अपने लेखन का आधार बनाया।
प्रश्न: यानी उनके लेखन में काफी हद तक वास्तविकता झलकती है?
उत्तर: बिल्कुल। इंसान वही लिख सकता है जो उसने खुद जिया हो। हमने तो सिर्फ सुना है, लेकिन जो उन्होंने जिया, वही उनकी रचनाओं में दिखता है।
प्रश्न: आपके परिवार में आपके पिता और उनके भाई-दोनों ही उपन्यासकार थे, लेकिन कुशवाहा कांत जी में लेखन का जो जुनून था, वैसा दूसरे में क्यों नहीं दिखा?
उत्तर: यह स्वभाव की बात होती है। जैसे मछली को तैरना सिखाना नहीं पड़ता, वैसे ही कुछ गुण जन्मजात होते हैं। हर किसी में वही लगन हो, यह जरूरी नहीं।
प्रश्न: आपकी पीढ़ी में लेखन का सिलसिला कितना आगे बढ़ा?
उत्तर: हमारी पीढ़ी में सिर्फ हमारी बहन पूनम कुशवाहा लिखती हैं। वह अपने परिवार के साथ दिल्ली रहती हैं।
प्रश्न: उनकी रचनाएं कैसी हैं?
उत्तर: उन्होंने कहानी संग्रह और कुछ उपन्यास लिखे हैं।
प्रश्न: आज भी वह लिख रही हैं?
उत्तर: हां, लेकिन अब किताबों का बाजार पहले जैसा नहीं रहा। जब किताबें बिकती नहीं, दुकानदार रखने को तैयार नहीं होते, तो लिखने का उत्साह भी कम हो जाता है।
प्रश्न: आप लोग मूल रूप से मिर्जापुर के रहने वाले हैं, फिर बनारस कैसे आए?
उत्तर: हमारे पिता बनारस आए थे, उसी के बाद यहां पहचान बनी।
प्रश्न: क्या आपको लगता है कि बनारस आने से पहचान ज्यादा मिली?
उत्तर: इस बारे में ठीक से कहना मुश्किल है, लेकिन समय के साथ बहुत कुछ बदल गया।
प्रश्न: जब कुशवाहा जी की हत्या हुई, तब आप कितने छोटे थे?
उत्तर: हम बहुत छोटे थे, करीब दो साल के।
प्रश्न: परिवार को उस घटना के बारे में क्या समझ आया?
उत्तर: हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। जो बीत गया, सो बीत गया। अब तो जमाना गुजर गया। उस वक्त की बात को हम क्या जानें।
प्रश्न: लेकिन उनकी मौत आज भी एक रहस्य बनी हुई है। क्या आपको लगता है कि यह कभी सुलझ पाएगी?
उत्तर: इतने साल बीत चुके हैं। अब यह समुद्र में खोई चीज़ जैसी है। कुछ मिल भी जाए, इसकी उम्मीद कम है।
प्रश्न: क्या आप कुशवाहा जी की मौत के रहस्य पर कुछ कहना चाहेंगे?
उत्तर: हमें इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं है। बिना तथ्य के कुछ कहना सही नहीं होगा।
प्रश्न: उस दौर में उपन्यासों की लोकप्रियता कितनी थी?
उत्तर: बहुत ज्यादा। देशभर में, खासकर नॉर्थ-ईस्ट और दक्षिण भारत में भी उनकी किताबों की भारी मांग थी। कई बार हम सप्लाई तक पूरी नहीं कर पाते थे। कुशवाहा कांत की हर पुस्तक के एक लाख संस्करण सिर्फ एक साल में बिक जाया करते थे। पहले 10 हजार पुस्तकों का संस्करण हुआ करता था और अब तीन सौ का। किताबें बेचना अब आसान काम नहीं है।
प्रश्न: क्या सच में किताबों के लिए लंबी लाइनें लगती थीं?
उत्तर: लाइन लगने वाली बात अलग है, लेकिन मांग इतनी थी कि जो भी किताब छपती थी वह तुरंत बिक जाती थी।
प्रश्न: उस समय मनोरंजन के साधन क्या थे?
उत्तर: नाटक, उपन्यास और सिनेमा-बस यही तीन बड़े माध्यम थे।
प्रश्न: आज के डिजिटल दौर में लेखक क्या करें ताकि उनकी पहुंच बढ़े?
उत्तर: सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग पढ़ना ही कम कर रहे हैं। चाहे सामग्री कितनी भी अच्छी क्यों न हो पाठक ही नहीं होंगे तो किताबें कैसे चलेंगी?
प्रश्न: आज मौलिकता की कमी की बात होती है, इस पर क्या कहेंगे?
उत्तर: मौलिकता हो या न हो असली चुनौती यह है कि लोग पढ़ने के लिए तैयार नहीं हैं। अब मोबाइल और टीवी ने सब कुछ बदल दिया है।
सजल कुशवाहा की यह बातचीत हमें सिर्फ़ एक लेखक की कहानी नहीं सुनाती, बल्कि हमें हमारे अपने वक़्त का आईना दिखाती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में तरक्की कर रहे हैं या कहीं कुछ बहुत कीमती पीछे छूटता जा रहा है।
आख़िर में यही कहा जा सकता है कि अदब सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं होता। वह दिलों की आवाज़ होता है। उपन्यास सम्राट कुशवाहा कांत, उनके छोटे भाई जयंत कुशवाहा और सजल कुशवाहा जैसे लोग हमें यह याद दिलाते हैं कि लफ़्ज़ आज भी ज़िंदा हैं। बस उन्हें महसूस करने वाले दिल कम हो गए है और शायद यही इस कहानी का सबसे गहरा दर्द है।
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं। संपर्कः 7068509999)
