चित्र नहीं, आंदोलन रचती हैं बनारस की पूनम राय

चित्र नहीं, आंदोलन रचती हैं बनारस की पूनम राय

सिहरन भर देते हैं, सोचने को मजबूर करते हैं और बदलाव की नींव रखते हैं पूनम के चित्र

विजय विनीत

हर चित्र एक कहानी कहता है, लेकिन कुछ चित्र ऐसे होते हैं जो सिहरन भर देते हैं, सोचने को मजबूर करते हैं और बदलाव की नींव रखते हैं। बनारस की पूनम राय का हर ब्रश स्ट्रोक, हर रंग, हर आकृति सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि समाज के खिलाफ उठी एक आवाज है—एक आंदोलन है, जो उन तमाम लोगों के लिए रोशनी की किरण है, जो संघर्षों के अंधकार में घिरे हैं।

एक दौर था, जब पूनम राय का जीवन हँसी-ठिठोली से भरा था। एक ऐसी लड़की, जो सपनों को अपनी हथेलियों पर सहेजती थी। पर नियति ने उसे ऐसी अग्निपरीक्षा में झोंक दिया, जहाँ से लौट पाना असंभव था। वर्ष 1997 में, दहेज के दानवों ने उन्हें तीसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया। रीढ़ की हड्डी टूट गई, पैर हमेशा के लिए बेकार हो गए। डॉक्टरों ने कहा—अब यह लड़की कभी चल नहीं पाएगी। लेकिन कोई डॉक्टर यह नहीं जानता था कि यह लड़की केवल पैरों से नहीं, बल्कि अपने हौसले से चलती है।

पूनम का जीवन वहीं समाप्त हो सकता था। वह बस एक और संख्या बन सकती थीं, उन असंख्य महिलाओं की, जो दहेज की बलि चढ़ जाती हैं। लेकिन पूनम ने ठान लिया—वह हार नहीं मानेंगी। उनके लिए ब्रश और रंग किसी औजार से कम नहीं थे। जिस दुनिया ने उन्हें ठुकरा दिया, उसी दुनिया को अपने चित्रों के माध्यम से जवाब देना था।

पूनम के चित्र किसी कैनवास तक सीमित नहीं हैं। उनके चित्रों में हर रंग एक संदेश है, हर चेहरा एक चीख है, हर रेखा एक आंदोलन है। उनके बनाए चित्र सिर्फ अतीत की पीड़ा नहीं दिखाते, वे भविष्य की उम्मीद भी जगाते हैं। उनके ब्रश से निकली हर आकृति अपने भीतर एक कथा समेटे हुए है—एक ऐसी कथा, जो अंधकार से उजाले तक की यात्रा को दर्शाती है।

उनकी इसी विलक्षण प्रतिभा को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड और वर्ल्ड रिकॉर्ड इंडिया ने पहचाना। 2016 में उन्हें “ऑफिशियल अटेम्प्ट मेडल” से सम्मानित किया गया, और 2017 में “मोस्ट यूनिक फेस क्रिएट” का खिताब मिला। लेकिन असली सम्मान तब मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी कला और संघर्ष की सराहना की, और उन्हें प्रेरणा का प्रतीक बताया।

कलाकार की आत्मा से झांकती अनकही कहानियाँ

पूनम के चित्रों की दुनिया में झाँकेंगे, तो वहाँ सिर्फ रंग नहीं मिलेंगे, वहाँ समाज के अनगिनत सवाल टंगे मिलेंगे। उनकी कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि विचार भी है। यह एक खिड़की खोलती है, जहाँ से हम अपने समय की सच्चाइयों को देख सकते हैं।

उनकी कला यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं रही। यह यात्रा उस दिन शुरू हो गई थी, जब उन्होंने दर्द को अपनी ताकत बना लिया। उनके चित्रों में स्त्रियों की आँखों में छिपी कहानियाँ हैं—कभी पीड़ा, कभी संघर्ष, कभी विद्रोह। उनके बनाए चेहरे चुप नहीं रहते, वे बोलते हैं, चीखते हैं और बदलाव की माँग करते हैं।

पूनम राय की कला उनके जीवन के अनुभवों से उपजी है—एक ऐसी यात्रा, जिसमें हर मोड़ पर कुछ नया, कुछ अद्भुत और कुछ अनकहा उभरता है। उनके चित्रों में प्रकृति, अध्यात्म और सामाजिक चेतना का अद्भुत समावेश दिखता है। वे न केवल रंगों से चित्र बनाती हैं, बल्कि विचारों की एक पूरी दुनिया रचती हैं, जहाँ हर रेखा का एक अर्थ होता है, हर रंग का एक संदेश।

उनकी कला में कबीर की साखियाँ गूंजती हैं, तो गुरुनानक की करुणा झलकती है। बुद्ध का मौन वहाँ न केवल शांति का प्रतीक है, बल्कि आत्मविश्लेषण और जागरण का भी प्रतीक बन जाता है। उनके बनाए चित्रों में हर तत्व आपस में गूँथा हुआ लगता है—पेड़, हवा, बारिश, आकाश, सूर्य की किरणें—सभी एक-दूसरे से संवाद करते दिखते हैं। यही कारण है कि उनकी पेंटिंग्स केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि आत्मा के स्तर पर संवाद करने वाली प्रतीत होती हैं।

कला की भाषा और सवालों का सिलसिला

पूनम के चित्र सवाल करते हैं। सवाल, जो समाज की रूढ़ियों को टटोलते हैं। सवाल, जो मानवता की असली परिभाषा खोजते हैं। वे स्वयं भी इन सवालों से जूझती हैं—“पूनम की रात में चाँद सबके लिए उगता है, लेकिन धरती पर हर इंसान के लिए उस चाँद का मतलब क्यों बदल जाता है?” उनकी यह चिंता सिर्फ कल्पना नहीं, बल्कि समाज के भीतर पसरी असमानता की एक गहरी पड़ताल है।

उनकी कला स्त्रियों की आज़ादी की पहचान बनती है। वह जीवन की खिड़कियाँ इस तरह खोलती हैं कि व्यक्ति मन के अभिमान के तहखानों में कैद नहीं रहता, बल्कि अपनी आत्मा और अस्तित्व के संपूर्ण स्वरूप से परिचित होता है। पूनम के चित्र जीवन की जटिलताओं और संभावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करते हैं। वे एक नई दृष्टि देते हैं—एक ऐसा दृष्टिकोण, जहाँ मनुष्य और प्रकृति, परंपरा और आधुनिकता, संघर्ष और शांति, सभी सह-अस्तित्व में रहते हैं।

कला यात्रा का आंदोलन में बदलना

पूनम राय की कला यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं है। यह एक आंदोलन है—संवेदनशीलता, जागरूकता और बदलाव का आंदोलन। वे अपने चित्रों के माध्यम से यह संदेश देना चाहती हैं कि जीवन कभी भी हारी हुई लड़ाई नहीं है। वे कहती हैं—“हमारी चिंता परिंदों के उन घोंसलों को बचाने की है, जिनके दरख़्त बेरहमी से काटे जा रहे हैं। पेड़ बचेंगे तो ही कैनवास पर हरियाली भी दिखेगी और तभी मन को सुकून मिलेगा।”

यह विचार उनकी कला में स्पष्ट रूप से दिखता है। प्रकृति, जीवन और संघर्ष को एक ही फ्रेम में बांधने की उनकी क्षमता कला को नए आयाम देती है। उनकी पेंटिंग्स में न केवल सौंदर्य, बल्कि एक सामाजिक प्रतिबद्धता भी झलकती है। वे कहती हैं“कला संसार रचने की प्रेरणा मुझे पेड़-पौधों, फूल-पत्तियों से मिलती है।”

पूनम राय की कला केवल दीर्घाओं में सजी पेंटिंग्स तक सीमित नहीं है। वे अपनी कला यात्रा को समाज के लिए उपयोगी बनाना चाहती हैं। बीआर फाउंडेशन के माध्यम से वे बच्चों को पेंटिंग, योग, नृत्य और लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए ताइक्वांडो सिखा रही हैं। यह केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास जगाने की कोशिश है। वे कहती हैं“अपने जीवन के सारे रंग उन्हीं बच्चों में देख लेती हूँ, जो हमारे हिस्से में नहीं आए।”

उनकी यह प्रतिबद्धता कला को एक नई ऊँचाई पर ले जाती है। उनके लिए चित्र केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं। उनकी कला का लक्ष्य केवल चित्र बनाना नहीं, बल्कि समाज में बदलाव की एक लहर पैदा करना है।

एक नई परिभाषाएक नई पहचान

आज भी पूनम राय अपनी कला यात्रा में आगे बढ़ रही हैं। उनके चित्रों में कोने बनते हैं, तो कभी जाले हटाए जाते हैं। वे हर पल अपने समय के साथ चलती हैं, अपनी कला में नित नए प्रयोग करती हैं। उनकी कला केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सामूहिक संवाद का माध्यम बन चुकी है।

उनकी यह यात्रा जारी है, और जब तक यह यात्रा जारी है, तब तक कला के माध्यम से समाज को देखने और समझने की खिड़कियाँ भी खुली रहेंगी।

पूनम राय ने साबित कर दिया कि कला केवल सृजन नहीं, बल्कि संघर्ष का दूसरा नाम है। उनके शब्दों में, “मैं अपने शरीर से नहीं, अपने हुनर से जीती हूँ।” यह वाक्य सिर्फ उनका नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति का घोषणापत्र है, जो समाज की रुढ़ियों के खिलाफ खड़ा है।

उनका जीवन, उनकी कला, और उनकी संघर्ष यात्रा सिर्फ बनारस की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विरासत है। पूनम राय कोई साधारण चित्रकार नहीं, वे एक आंदोलन हैं, जो हमें यह सिखाती हैं कि अगर हौसला हो, तो कोई भी ज़ख्म आपकी उड़ान को नहीं रोक सकता।

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