सत्ता, संत और साज़िश : यूपी में धर्म का उबाल, दिल्ली तक सियासी हलचल
कौन फंसा किसके खेल में, योगी के खेल में मोदी या मोदी के खेल में योगी?
@विजय विनीत
उत्तर प्रदेश की राजनीति इन दिनों निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता के केंद्र को लेकर भीतरखाने खींचतान तेज हो चुकी है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और यूपी प्रशासन के बीच चला आ रहा विवाद अब महज धार्मिक या प्रशासनिक नहीं रह गया है, बल्कि इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती देने की एक संगठित कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि बीजेपी के कुछ शीर्ष नेता नहीं चाहते कि आगामी विधानसभा चुनाव पूरी तरह योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लड़ा जाए। योगी की सख्त, केंद्रीकृत और निर्णायक कार्यशैली पार्टी के भीतर भी एक धड़े को असहज करती रही है। ऐसे में अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद केवल एक बहाना नहीं, बल्कि नेतृत्व के संतुलन को दोबारा परिभाषित करने का औजार बनता दिख रहा है।
इसी बीच सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक वीडियो इस विवाद को और जटिल बना रहा है। कहा जा रहा है कि इस वीडियो में देश के बड़े उद्योगपति गौतम अडानी और उनके परिवार के सदस्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का वंदना करते नजर आ रहे हैं। हालांकि वीडियो की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इसके सार्वजनिक होते ही यह बहस तेज हो गई कि क्या धर्म और कॉर्पोरेट प्रभाव के सहारे यूपी की सत्ता राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है।
सूत्रों के मुताबिक, प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का हठ और प्रशासन से टकराव अब दिल्ली तक गूंजने लगा है। 19 वर्षों बाद चारों शंकराचार्यों के एक मंच पर आने की संभावनाएं केवल धार्मिक घटना नहीं मानी जा रहीं, बल्कि इसे एक सशक्त राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि धर्माचार्यों की नाराजगी संगठित रूप लेती है, तो इसका असर बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने केंद्र की राजनीति को भी असहज स्थिति में ला दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के लिए संतुलन साधना आसान नहीं दिख रहा। एक ओर योगी का मजबूत जनाधार और प्रशासनिक पकड़, दूसरी ओर पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर उठते सवाल। यही कारण है कि प्रदेश बीजेपी नेतृत्व से लेकर सरकार के शीर्ष पदों तक गतिविधियां तेज हो गई हैं। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सक्रियता को भी इसी सियासी खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकार इस पूरे घटनाक्रम की तुलना लोकसभा चुनाव के समय हुई अंदरूनी नूरा कुश्ती से कर रहे हैं, जब पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए थे और बीजेपी को उत्तर प्रदेश में इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ी थी। आज फिर वैसी ही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार धर्म और संतों का प्रभाव कहीं अधिक मुखर है।
इसी सियासी पृष्ठभूमि में बनारस से उठती एक और आवाज सरकार के लिए नई चुनौती बनती जा रही है। संकट मोचन फाउंडेशन के महंत विशंभर नाथ मिश्र मणिकर्णिका घाट, गंगा और सांस्कृतिक विरासत के मुद्दे पर सरकार पर लगातार ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं। महंत के बयानों के कई निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। कुछ इसे पर्यावरण और परंपरा की लड़ाई मानते हैं, तो कुछ इसे सत्ता के खिलाफ वैचारिक प्रतिरोध के रूप में देख रहे हैं।
इस मुद्दे को और व्यापक स्वरूप तब मिला जब संकट मोचन फाउंडेशन के सोशल मीडिया पेज पर पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ द्वारा लिया गया महंत विशंभर नाथ मिश्र जी का वीडियो इंटरव्यू अपलोड किया गया। इसके बाद देशभर के सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर और डिजिटल पत्रकार तुलसी घाट स्थित उनके आवास पर पहुंचने लगे। कोई घर के भीतर इंटरव्यू कर रहा है तो कोई गंगा में नाव पर बैठकर सवाल पूछ रहा है, जो बताता है कि यह मुद्दा अब स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुका है।

कुल मिलाकर, प्रयागराज से बनारस तक संतों की सक्रियता और उसके राजनीतिक निहितार्थ योगी सरकार के लिए बहुस्तरीय चुनौती बनते जा रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना यह है कि योगी के शिकंजे में मोदी और शाह फंसते नजर आ रहे हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस बार समय रहते आंतरिक संघर्ष को संभाल पाती है या फिर सत्ता, संत और सियासत की यह त्रिकोणीय लड़ाई एक बार फिर बीजेपी को महंगी साबित होगी?
