अजूबाः बनारस के मणिकर्णिका जाने वाली संकरी गलियों में अब अर्थियां मांगती हैं रास्ता, भीड़ में कुचल रहीं संवेदनाएं…!
जिस बनारस ने मरना सिखाया वही अब मृत्यु को नहीं दे पा रहा सम्मान-भीड़, दलाली और जाम के बीच रास्ता तलाशती हैं आत्माएं
विजय विनीत
बनारस में अब मरना भी दुरुह हो गया है। यह कोई उत्तेजक वाक्य नहीं है, न किसी क्षणिक आवेग में निकली हुई बात। यह एक थके हुए शहर की कराह है। यह उस काशी की आह है जिसे सदियों से जीवन और मृत्यु के बीच का सेतु माना गया। जहां देह का छूटना उत्सव था और अंतिम श्वास को मोक्ष की पहली सीढ़ी कहा जाता था। आज उसी काशी में मृत्यु भी असहाय हो चली है। थकी हुई, अपमानित और भीड़ में फंसी हुई।
सुबह की धूप अभी पूरी तरह फैली भी नहीं थी कि एक अर्थी नीलकंठ गली के मोड़ पर आकर रुक गई। आगे ठेलों की कतार थी। सब्जियों से लदे ठेले, फलों से भरे हाथठेले, पूजा सामग्री से सजे छोटे छोटे स्टॉल। उनके बीच से निकलने की कोई जगह नहीं। पीछे मोटरसाइकिलों का शोर, मोबाइल पर ऊंची आवाज में बातें करते लोग और बीच में चार कंधों पर रखी एक देह जो अब कुछ नहीं कह सकती थी। परिजन चुप थे। उस चुप्पी में जो चीख छिपी थी। उसे सुनने वाला कोई नहीं था। बनारस की गलियां उस दिन भी उतनी ही संकरी थीं जितनी वे हमेशा से रही हैं। फर्क बस इतना था कि अब उन गलियों में सब कुछ ठूंस दिया गया था। आस्था भी, व्यापार भी और मृत्यु भी।
कभी कहा जाता था कि काशी में मरना सौभाग्य है। यह वाक्य कभी लोगों को सांत्वना देता था। आज वही वाक्य थक कर बैठ गया है। अंतिम यात्रा भी अब अव्यवस्था की भेंट चढ़ जाती है। धक्का-मुक्की, बहस, गालियां, पुलिस की सीटी और दुकानदारों की झुंझलाहट सब कुछ एक साथ। जिस क्षण में मौन होना चाहिए, वहां शोर है। जिस पल में आंखें झुकी होनी चाहिए, वहां मोबाइल कैमरे उठे हैं। चिता की आग के पास बैठने का सुकून अब दुर्लभ हो गया है। मंत्रों की गूंज आत्मा को सहारा देने के बजाय शोर में बदल जाती है।
मणिकर्णिका की ओर जाने वाली गलियों में अक्सर जाम लग जाता है। यहां सिर्फ जाम नहीं लगता। एहसास होता है कि मृत्यु को रोक दिया गया हो। अर्थियां रुक जाती हैं। कंधों पर पसीना बहता है। लोग थक कर खड़े हो जाते हैं। परिजन आंखें चुरा लेते हैं। किससे कहें कि रास्ता दीजिए। यहां कोई अपने अंतिम घर जा रहा है। कई बार इसी अव्यवस्था को लेकर झगड़े हो जाते हैं। धक्का लगता है। आवाजें तेज होती हैं। संवेदना भीड़ में कुचल जाती है। मृत्यु जो सबको बराबर करती थी, यहां खुद असहाय खड़ी रह जाती है।
बनारस आज तीर्थाटन के शिखर पर है। हर ओर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। घाटों पर पैर रखने की जगह नहीं। मंदिरों के बाहर कतारें खत्म होने का नाम नहीं लेतीं। हवा में मोबाइल कैमरे तने हुए हैं। हर कोई बनारस को देख रहा है, लेकिन कोई बनारस को महसूस नहीं कर रहा। यह शहर अब अनुभव नहीं रहा, यह कंटेंट बन चुका है। लोग गंगा को तस्वीरों में कैद कर लेते हैं, लेकिन उसकी थकान नहीं देखते। वे घंटियों की आवाज सुनते हैं, लेकिन गलियों की कराह नहीं सुनते।
बनारस के नाम पर मुनाफे की लूट
इस तीर्थाटन के साथ पैसा भी आता है। लेकिन वह पैसा बनारस में रुकता नहीं। बनारस के नाम पर बिकने वाली साड़ियां कहीं और बनती हैं। खासतौर पर गुजरात के सूरत में। बनारसी कहलाने वाला कपड़ा मशीनों पर कहीं और तैयार होता है। नाम बनारस का, पहचान बनारस की, लेकिन मेहनत, उत्पादन और मुनाफा कहीं और का। पैसा लौट जाता है और बनारस फिर से खाली हाथ खड़ा रह जाता है। अपनी ही पहचान के नाम पर।
अगर कुछ यहीं बचता है, तो वह है दलाली। घाट से लेकर होटल तक। पूजास्थल से लेकर चिता तक। हर जगह दलाल खड़े हैं। वे रास्ता भी बताते हैं। कीमत भी तय करते हैं और लाभ भी वही उठाते हैं। नई व्यवस्था से वही खुश हैं। आम आदमी बस देखता है, सहता है और भीतर ही भीतर टूटता है। उसकी बेबसी कोई शोर नहीं करती। वह चुपचाप निगल ली जाती है।
भीड़ अब केवल असुविधा नहीं रही। वह अमानवीय हो चुकी है। खबरें आती हैं कि भीड़ में लोग गिर पड़े। कई बार लाशें तक भहरा गईं। और उसी भीड़ में कहीं कोई अर्थी फंसी हुई है। अंतिम यात्रा रुक गई है। मृत्यु इंतजार कर रही है। जैसे पूछ रही हो कि क्या मुझे भी लाइन में लगना होगा।
जिस मणिकर्णिका को जीवन और मृत्यु के गहरे दर्शन का प्रतीक माना जाता था, वह धीरे धीरे तमाशे की जगह बनती जा रही है। लोग वहां श्रद्धा से कम और जिज्ञासा से अधिक जाते हैं। चिता जलती है और कैमरा चलता है। मृत्यु का मजाक उड़ाया जाता है। मरने के बाद भी शांति नहीं मिलती। अंतिम यात्रा में शामिल लोग एक दूसरे से चिपक कर चलते हैं। जैसे संवेदना भीड़ में कुचल दी गई हो।
उधर बनारस की आत्मा उसकी स्थानीय अर्थव्यवस्था धीरे धीरे सिकुड़ती जा रही है। मेन मंडी सूनी पड़ी है। खरीदार नहीं आते। लोग डर के मारे बाजारों से दूरी बना रहे हैं। छोटे दुकानदार दिन भर इंतजार करते हैं। शाम तक उनके हाथ मायूसी के सिवा कुछ नहीं लगता। अब कारोबार केवल होटलों और उनके आसपास के इलाकों तक सिमट गया है। तीर्थाटन का लाभ कुछ गिने चुने हाथों में कैद हो गया है।
बाकी बनारस उसकी गलियां, उसके बाजार, उसके लोग हाशिए पर खड़े हैं। अब लगता है कि बनारस शहर उनका कभी रहा ही न हो। यह वही शहर है जो कभी जीवन की गति सिखाता था। धीरे चलो। ठहरो और सुनो। आज वही बनारस थक चुका है। भीड़ से दबा हुआ। शोर से घायल और भीतर से बहुत अकेला।
गंगा की लहरों में बेचैनी
गंगा अब भी बहती है, लेकिन उसकी लहरों में बेचैनी है। गलियां अब भी सांस लेती हैं, पर हर सांस भारी है। कभी कभी लगता है कि यह शहर कुछ कहना चाहता है। वह कहता नहीं, बस देखता है। देखता है कि कैसे उसकी आत्मा को टुकड़ों में बांट दिया गया है। आस्था, व्यापार और तमाशे के बीच।
उन्हीं बिखरे हुए टुकड़ों के बीच कहीं एक अर्थी अटकी हुई है। न आगे बढ़ पाने की ताकत, न पीछे लौटने का विकल्प। चार कंधे थमे हुए हैं, आंखें झुकी हुई हैं और समय जैसे ठहर गया है। यह केवल लकड़ियों और कपड़े में लिपटी एक देह नहीं है। यह बनारस की आत्मा का वह क्षण है, जो रास्ता मांग रहा है। यह याद दिला रहा है कि बनारस केवल जीवितों का शहर नहीं है। यह मृत्यु का भी उत्सव रहा है। यहां मरना डर नहीं, भरोसा था। यहां अंतिम विदाई भी जीवन की तरह सम्मान से होती थी।
बनारस में जब कभी पुलिस के आला अफसर आते हैं, तो कुछ दिनों के लिए हलचल बढ़ जाती है। ट्रैफिक सुधारने के लिए हाथ पैर मारे जाते हैं। बैरिकेड लगते हैं, मीटिंग होती है, निर्देश जारी होते हैं। फिर वही अफसर थक कर बैठ जाते हैं। व्यवस्था अपनी पुरानी लय में लौट आती है। जाम फिर से गलियों में पसरा रहता है और अर्थियां फिर से इंतजार करने लगती हैं।
नए पुलिस कमिश्नर मोहित साहब की पोस्टिंग पर भी उम्मीद जगी थी। लगा था कि शायद अब कुछ बदलेगा। शायद गलियों को सांस लेने की जगह मिलेगी। लेकिन बदला कुछ भी नहीं। उलटे भीड़ कई गुना बढ़ गई। जाम अब अपवाद नहीं, रोजमर्रा की नियति बन गया है। बनारस में अब रास्ता दूरी से नहीं नापा जाता। यहां सफर समय से नहीं, जाम से तय होता है। कौन सा रास्ता कितना लंबा है, यह नहीं पूछा जाता। पूछा जाता है कि वहां जाम कितना लगता है।
इस जाम के असली कर्ताधर्ता सबको दिखते हैं, लेकिन कोई कुछ कहता नहीं। गैर लाइसेंसी टोटो और आटो हर गली में दौड़ते हैं। लाल नीले स्टीकर लगाए हुए। यह स्टीकर केवल रंग नहीं हैं, यह संरक्षण का प्रतीक हैं। आम आदमी इनके आगे असहाय है। नेता इनके आगे नतमस्तक हैं। और पुलिस के कई आला अफसरों के सामने भी जैसे शब्द खो जाते हैं। उगाही की रकम जहां पहुंचनी होती है, पहुंच जाती है। और उसके साथ ही जुबानों पर ताले लग जाते हैं।
पहचान खोता जा रहा बनारस
अगर जीवन की चहल पहल में मृत्यु की गरिमा खो गई, अगर बाजार की आवाज में अंतिम श्वास की निस्तब्धता दब गई तो यह शहर अपनी सबसे गहरी पहचान खो देगा। बनारस की असली परीक्षा यहीं होती है। मंदिरों की भीड़ में नहीं, घाटों की चमक में नहीं, बल्कि उस पल में जब कोई चुपचाप इस संसार से विदा हो रहा होता है। अगर उस पल के लिए रास्ता नहीं है, तो फिर किसी और चीज का क्या अर्थ बचता है।
गलियों में फंसी अर्थियां केवल ट्रैफिक जाम नहीं हैं। वे हमारी व्यवस्था का आईना हैं। एक कठोर और निर्मम आईना, जिसमें हमारी संवेदनहीनता, हमारी लापरवाही और हमारे समझौतों की परछाइयां साफ दिखती हैं। यह आईना पूछता है कि क्या हमने व्यवस्था को इतना कमजोर बना दिया है कि मृत्यु भी इंतजार करने को मजबूर हो जाए। अगर इस आईने में झांकने का साहस हमने नहीं किया, तो एक दिन बनारस सचमुच चुप हो जाएगा। और तब उसकी यह चुप्पी सबसे ऊंची चीख होगी। वह चीख जो किसी शोर में नहीं, बल्कि गहरी खामोशी में सुनाई देगी।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा कुचली जाती है संवेदना। वही संवेदना जो बनारस की पहचान थी। वही संवेदना जो मृत्यु को भी उत्सव बना देती थी। आज वही संवेदना ठेले और टोटो के बीच फंसी हुई है। एक अर्थी के साथ। रास्ते की प्रतीक्षा में।
(लेखक बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)
