‘मुसाफ़िर हूं यारो’ : सफ़र, तजुर्बे और रूहानी गिरहों का अदबी दस्तावेज़…!

सुधीर मिश्र साहब नवभारत टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं। मुंबई में देश के प्रमुख पत्रकारों के एक कार्यक्रम में उन्होंने मुझे अपनी किताब ‘मुसाफ़िर हूं यारो’ उपहार में दी। पिछले महीने वह हमारे घर भी आए थे। हमारे बीच एक गहरा अपनापन और विश्वास का रिश्ता है, जो हर मुलाक़ात में महसूस होता है। रोज़मर्रा की व्यस्तता के कारण यह पुस्तक समीक्षा थोड़ा देर से लिख रहा हूं, लेकिन किताब पढ़ने का असर दिल पर अब भी ताज़ा है।
विजय विनीत
सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो,
हर एक सफ़र में छुपा है, ख़ुद को नया सा पाना।
सफ़र, हुज़ूर, सिर्फ़ फ़ासलों का नाम नहीं होता। सफ़र तो कभी-कभी दिल की उन तहों तक पहुंच जाता है जहां हम बरसों से झांकना भी भूल जाते हैं। इंसान जितनी दुनिया आंखों से देखता है, उससे कहीं ज़्यादा दुनिया वह अपने अंदर महसूस करता है। सुधीर मिश्र साहब की किताब ‘मुसाफ़िर हूं यारो’ उसी अहसास की तफ़सील है। एक ऐसा रूहानी सफ़रनामा जिसमें तजुर्बे, तहज़ीब, रिश्ता-ए-इंसानियत और दुनिया-दारी के रंग कुछ यूं मिलते चले जाते हैं कि पाठक को लगता है जैसे वह खुद लेखक के साथ उसी राहगुज़र पर चल रहा है, उन्हीं मोड़ों से गुज़र रहा है और उन्हीं हवाओं की खुशबू को महसूस कर रहा है जिनसे लेखक का दिल भर आया था।
लखनऊ की चौपटिया की ख़स्ता-पूरी की महक, पुराने शहर की गलियों की नरम-सी आहट, अमीनाबाद की चहल-पहल, गोमतीनगर की महफ़िलों की नफ़ासत और फिर दुनिया के नक़्शे पर दर्ज उन दूर-दराज़ शहरों की रूहानी फिज़ा, जिनमें लेखक ने अपने क़दमों की दस्तक छोड़ी, अपनी आँखों का उजाला समेटा। यह सब कुछ इस किताब की रगों में किसी कशिश की तरह बहता है। लखनवी नरमी का जो सूफ़ियाना लहजा है। वह यहां हर सफ़े पर महसूस होता है। यह महज़ बयान नहीं; यह एक एहसास है, एक सौग़ात है, एक ऐसा सफ़र है जिसमें क़िस्सागोई अपनी सीमा से उठकर हमसफ़री में बदल जाती है। ऐसा लगता है जैसे लेखक आपका हाथ पकड़कर कह रहा हो, “आईए हुज़ूर, इस मोड़ से आगे दुनिया कुछ और हसीन है।”

रूह की गलियों में चलता एक सफ़रनामा
लेखक जब अपने ही बारे में यह लिखते हैं, “एक लोअर मिडिल क्लास का लड़का…”, तो यह महज़ इज़हार नहीं, बल्कि एक सादा-सी लेकिन बेहद असरदार सच्चाई है जिसमें हर जद्दोजहद झेलने वाला इंसान अपना अक्स देख लेता है। ट्यूशन पढ़ाने से लेकर साइकिल पर बैठकर लॉटरी बेचना, फिर खस्ता-पूरी का ठेला-यह सब उस लड़के के सब्र, हिम्मत और कर्मठता की दास्तान है। यही वह खामोश तालीम थी जिसने उसे दुनिया भर के जलसों में हिंदी का परचम लहराने की क़ाबिलियत दी। यह कहानी किसी फ़िल्मी चमक-दमक से भरी मोहब्बत नहीं, बल्कि सच्चाई की वही हल्की-सी रौशन किरण है जो दिल पर धीमी-धीमी दस्तक देती है।
किताब का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि लेखक कभी “ऊंचाई” पर बैठकर अपनी कहानी नहीं सुनाते। वह पाठक को बराबर में बिठाते हैं, उसके कंधे पर हाथ रखते हैं और हर मोड़, हर मुसीबत, हर मुस्कुराहट और हर उलझन की दास्तान उसी अपनापन से बयान करते हैं जैसे कोई हमनवा सर्द शाम में चाय के साथ अपनी कहानी कह रहा हो। उनकी ज़बान में किसी तकल्लुफ़ की दीवार नहीं, बल्कि एक खुली हवेली-सी गुफ़्तगू है जिसमें हर मेहमान को जगह मिल जाती है।
जहाज़ में आने वाले वे हिचकोले, जिनमें इंसान अनायास ही ख़ुदा को याद कर लेता है; टोरंटो की इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंस का वह वाक़या जहाँ मशहूर शख़्सियत रिचर्ड गेयर ने अचानक बुलाकर कहा, “Peter, we should have one photograph with Sudhir”। ऐसे लम्हात इस किताब में चमकते हुए सितारों की तरह हैं। वह लम्हा सिर्फ़ तस्वीर का नहीं, बल्कि इज़्ज़त, पहचान और इंसानियत का लम्हा है।

पाठक का हाथ थामने की कला
अमेरिका के होटल में फ्रीज़र का बिल देखकर जो हैरानी हुई। वह वाक़या सिर्फ़ हंसी का बहाना नहीं, बल्कि यह भी बताता है कि दुनिया कितनी जुदा है और हर जगह की तहज़ीब किस क़दर अपनी-अपनी है। सुधीर मिश्र इन तजुर्बों को जिस नरमी, सादगी और दिल की साफ़गोई से बयान करते हैं। वह पाठक को लगातार अपनी तरफ़ खींचती रहती है। यही इस किताब की रूह है-हमसफ़री, हमदर्दी और हमअहंगी।
लेखक अपने सफ़र का बिस्मिल्लाह बचपन की उस उन्मुक्त जिज्ञासा से करते हैं, जब जुग़राफ़िया और दुनिया का नक़्शा उनके लिए किसी जादुई किताब की तरह था। क्लास में एटलस खोलकर दुनिया भर की जगहों को ढूंढने का शौक़, हर अनजान शहर का नाम देखकर आंखों का चमक उठना-यही वह शुरुआती लौ थी जिसने आगे चलकर इस बड़े सफ़र की मशाल जलाई। वह लिखते हैं कि जहां चाह, वहां राह और यह राह उन्हें पत्रकारिता की दुनिया में ले आई जहां घूमने, देखने, समझने और तजुर्बा हासिल करने के बेपनाह मौक़े मिले।
बचपन के सवाल, childhood curiosity (बाल-जिज्ञासा), दुनिया की गलियों में जाकर जवाब तलाश करने का जज़्बा-यह सब किताब में कहीं दबा-छुपा नहीं, बल्कि पूरी वज़ाहत से चमकता है। ऐसा लगता है मानो लेखक अपने तजुर्बों के आईने से दुनिया का नक़्शा पाठक के सामने फैला रहा हो और कह रहा हो, “जो देखा, वही लिखा; जो जिया, वही बताया।”
हिन्दी पत्रकारिता की जो जुझारू और पथरीली राह है-जहां मेहनत हर कदम पर अपना इम्तिहान लेती है, वहीं से कुछ सबसे रोशन रास्ते भी निकलते हैं। यही रास्ते सुधीर मिश्र को यूनाइटेड नेशन की सात बड़ी इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंसों तक लेकर गए। यह मौका उन्हें स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में मिली दो अहम फैलोशिप्स की वजह से मिला। एक एचआईवी-एड्स पर काइज़र फ़ाउंडेशन (अमेरिका) की और दूसरी सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की।
यह सिर्फ़ उपलब्धियां नहीं, बल्कि इस बात की तस्दीक़ हैं कि मेहनत का रास्ता लंबा ज़रूर होता है, लेकिन बेनतीजा नहीं।
घुमक्कड़ी पर विचारकों ने बहुत कुछ कहा है, लेकिन लेखक का अपना तजुर्बा इस बात की गवाही देता है कि किताबें ज़रूरी हैं। किताबें दिल में तलाश का शौक़ जगाती हैं, लेकिन असली तसल्ली, असली इत्तिला, असली राहदारी-वह तो चलने से, देखने से और सफ़र में मिलने वाली उस अनकही दुनिया से मिलती है जो किताबों के दायरे में क़ैद नहीं होती। वह साफ़ कहते हैं कि पत्रकार को चाहिए कि अपने ठौर-ठिकाने से बाहर निकलने के हर मौक़े को ग़नीमत समझे, क्योंकि नई दुनिया, नया अनुभव और नई समझ-यह सब बाहर मिलता है, भीतर बैठकर नहीं।
मुसाफ़िर होने का मतलब-तलाश और तजुर्बा
आदिकाल से इंसान मुसाफ़िर रहा है। जिन क़ौमों के लोग जितने ज़्यादा सफ़र-परस्त थे-आज वही मुल्क उतने ही तरक़्क़ी-याफ़्ता और खुशहाल हैं। सफ़र इंसान को सिर्फ़ मंज़िल नहीं देता, बल्कि सोच का विस्तार, नज़र की साफ़गोई और दुनिया देखने की नई राहें भी देता है।
किताब का जज़्बाती आसमान बेहद ख़ूबसूरत है। विज्ञान अगर सत्य की क़सम खाता है, धर्म आस्था की और साहित्य संवेदनाओं की तो इस किताब में तीनों का एक नफ़ीस संगम मिलता है। इस किताब में वह नरमी है जो दिल पर दस्तक देती है, वह अपनापन जो अजनबी शहरों को भी अपना-सा बना देता है, वह मुस्कुराहट जो कठिन सफ़र को भी आसान कर देती है और वह सादगी जो सबसे बड़े अनुभवों को भी घरेलू, बिल्कुल आम इंसान के क़ाबिल बना देती है।
किताब पढ़ते हुए कहीं यह एहसास नहीं होता कि लेखक कोई आसमान पर बैठा देवता है। वह एक इंसान है। हमारी ही तरह गिरा भी है, संभला भी है और सबसे बढ़कर, हर मोड़ पर कुछ नया सीखा भी है। यही इंसानियत, यही साफ़गोई, यही बेबाकी-इस किताब को महज़ यात्रा-वृत्तांत नहीं रहने देती। यह जज़्बातों, तजुर्बों और तर्जुमानी का एक खूबसूरत संगम बन जाती है।
इस किताब में लखनऊ की मिठास भी है, संघर्ष की गर्मी भी और दुनिया की रंगीनियों का तजुर्बा भी। लेखक की ज़बान में देसीपन की सौंधी ख़ुशबू है और दुनिया देखने का एक उजला, खुला नज़रिया भी। यही वह बातें हैं जिन्होंने ‘मुसाफ़िर हूं यारो’ को पाठकों की पसंद टॉप 10 बेस्ट सेलर तक पहुंचाया।
साहित्य, सफ़र और इंसानियत
‘मुसाफ़िर हूँ यारो’ पढ़ते हुए बार-बार यही महसूस होता है कि इंसान का सफ़र कभी मुकम्मल नहीं होता। हर मोड़ एक नया सबक़ देता है, हर राह एक नया आईना दिखाती है और हर पड़ाव दिल को थोड़ा और गहराई से समझने का मौका देता है। सुधीर मिश्र का यह सफ़रनामा हमें यह भी सिखाता है कि ज़िंदगी सिर्फ़ मंज़िल तक पहुंचने का नाम नहीं, बल्कि उन रास्तों में छिपी हुई कहानियों, किरदारों और रूहानी लम्हों का भी हिसाब है जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर जाते हैं।
किताब पढ़ते हुए बार-बार यही महसूस होता है कि हम सब कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर, इसी लेखक की तरह मुसाफ़िर हैं। फर्क बस इतना है कि कोई सफ़र बयान कर पाता है और कोई ख़ामोशी से जी लेता है।
इस किताब को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि लेखक हमें यह याद दिला रहे हों कि दुनिया देखने से पहले इंसान को थोड़ा-सा खुद को भी देख लेना चाहिए, क्योंकि बहुत बार सच्चे सफ़र भीतर ही से शुरू होते हैं। यही वह जगह है जहां यह किताब पाठक के दिल में एक नरम-सी रोशनी छोड़ जाती है; एक ऐसी रोशनी जो सफ़र को हसीन भी बनाती है और इंसान को थोड़ा बेहतर भी।
और सच तो यह है….
“सफ़र की ख़ूबसूरती मंज़िल में कहां,
रास्तों में मिलने वाले एहसास में है…
चलते रहो कि शायद किसी मोड़ पर
ज़िंदगी खुद तुम्हारा इंतज़ार कर रही हो।”
‘मुसाफ़िर हूं यारो’ सिर्फ़ पढ़ी नहीं जाती, यह जी ली जाती है। शायद यही वजह है कि यह सफ़रनामा दिल में उतर जाता है, एक हल्की-सी ख़ुशबू छोड़ता हुआ,एक मुस्कान जगाता हुआ और यह एहसास बांटता हुआ कि हम सब कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर मुसाफ़िर ही तो हैं…और यारो-यह सफ़र जितना लंबा है, उतना ही हसीन भी।
‘मुसाफ़िर हूं यारो’ पढ़कर ही इसका असली लुत्फ़ आता है। यह किताब अब अमेज़न पर भी उपलब्ध है, जहां पाठक इसे आसानी से मंगाकर अपने सफ़र का हमसफ़र बना सकते हैं। सच तो यह है कि ‘मुसाफ़िर हूं यारो’ हर उस रूह को बुलाती है जो ज़िंदगी की राहों में एक सच्ची, नरम और इंसानी कहानी तलाश रही है।
लेखक के बारे में….
विजय विनीत (Vijay Vineet) : पत्रकारिता में साहस, संवेदना और सामाजिक सरोकारों के लिए पहचाने जाने वाले विजय विनीत ने अपने लेखन से बनारस की आत्मा को शब्दों में उतारा है। वे लंबे समय से जनसरोकार, संस्कृति और हाशिए के समाज पर लिखते आ रहे हैं। उनकी लेखनी में बनारस की बनावट, घाटों की रूह और इंसानी रिश्तों की नमी एक साथ महसूस की जा सकती है।
📚 लेखक की प्रमुख कृतियां:

- मैं इश्क लिखूं, तुम बनारस समझना
- जर्नलिज्म AI
- बनारस लाकडाउन
- बतकही बनारस की
- बनारसी घाट का जिद्दी इश्क
- सपनों की पगडंडियां
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